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शराब तस्करी, मिलावटखोरी पर सख्त कानून समय की जरूरत

हरियाणा की गठनबंधन सरकार अगर शराब तस्करी और गांवों में ठेके बंद कराने के प्रति संजीदा है, तो इसकी सराहना होनी चाहिए। प्रदेश में शराब हमेशा से उत्तेजक मुद्दा रही है, हालांकि शराबबंदी का वादा करके भी एक पार्टी सत्ता में आई थी, लेकिन फिर हालात ऐसे बने कि मजबूरी में उसे शराबबंदी का फरमान वापस लेना पड़ा। उसके बाद से प्रत्येक सरकार इस संबंध में गंभीर तो होती है, लेकिन शराब तस्करी को गैर जमानती अपराध बनाने और इसके दोषी को तीन साल कैद की सजा जैसे प्रावधान वाला विधेयक तैयार करने का श्रेय मौजूदा भाजपा-जजपा गठबंधन सरकार को ही जाता है। गांवों की पंचायतों के द्वारा प्रस्ताव भेजे जाने पर वहां ठेका खोलने पर रोक जैसा नियम भी यही सरकार लेकर आई है। गांवों में हालात ऐसे होते हैं कि ठेके की वजह से महिलाओं, युवतियों और अन्य ग्रामीणों का जीवन दूभर हो जाता है। असामाजिक तत्व इन ठेकों के पास जमा रहते हैं, आते-जाते महिलाओं पर टिप्पणी करते हैं। मौजूदा सरकार के बीते कार्यकाल में प्रदेश से लगातार ऐसी रिपोर्ट आ रही थी, जब गांवों में महिलाएं शराब ठेकों को आग लगा देती थी, रोड जाम करके प्रदर्शन करती थी, इसके बाद जननायक जनता पार्टी ने इसे अपने चुनाव घोषणा पत्र में शुमार किया था। सत्ता में आने के बाद उसने अपने वादे को पूरा भी कराया है, हालांकि उसमें कुछ सुराख बाकी हैं।

बहरहाल, शराब तस्करी को गैर जमानती अपराध बनाए जाने से राजस्व की हानि रोकी जा सकेगी। दोषी को तीन साल की कैद, दस लाख रुपये का जुर्माना, तस्करी में शामिल वाहन को जब्त करना ऐसी सजा हैं, जिनके संबंध में ऐसी हरकत करने से पहले अपराधी कई बार सोचेगा। इसके अलावा राज्य में अब शराब में मिलावट करने वालों पर भी शिकंजे की तैयारी है। अकसर ऐसी खबरें आती हैं, जब मिलावटी शराब की फैक्ट्री आदि पकडऩे की बात सामने आती है, प्रदेश में पिछले कुछ समय से मिलावटी शराब के मामले तेजी से बढ़े हैं, दूसरे कई प्रदेशों में जब यह महामारी की तरह एक समस्या बन चुकी है, तब हरियाणा सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इस संबंध में सरकार की ओर से तैयार आबकारी संशोधन विधेयक पर राज्यपाल ने अपनी मुहर लगा दी है। इसके तहत शराब में मिलावटखोरी साबित होने पर दस लाख रुपये तक के जुर्माने के अलावा फांसी या आजीवन कारावास तक की सजा हो सकेगी। पूरे देश में संभव है, हरियाणा सरकार ही ऐसी कड़ी सजा का प्रावधान करने वाली पहली सरकार है। यह जरूरी भी है, क्योंकि शराब में मिलावट जहां जनस्वास्थ्य को प्रभावित करती है, इससे लोगों की जान जाती हैं, वहीं राजस्व की भी बड़ी हानि होती है। अगर शराब पीने का कोई शौक रखता है तो वैधानिक तरीके से अपने शौक को पूरा कर सकता है, लेकिन सरकार का यह दायित्व बनता है कि उसे गुणवत्तापूर्ण उत्पाद ही मुहैया कराया जाए।

सरकार ने संशोधित विधेयक में अवैध रूप से नशीले पदार्थ के निर्माण या शराब की 12 या इससे अधिक बोतलें पकड़े जाने पर न्यूनतम दो साल की कैद या दो लाख रुपये का जुर्माना भी प्रस्तावित किया है। इसके अलावा अब सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने वालों पर पांच हजार रुपये का जुर्माना हो सकेगा, नशा करके अगर उपद्रव किया गया तो तीन महीने की कैद के अलावा दस हजार रुपये का जुर्माना भी होगा। प्रस्तावित कानून में अहातों में असामाजिक तत्वों को जुटने देने पर अब अहाता मालिक भी शिकंजे में आएंगे, संचालक को जहां छह महीने की कैद होगी वहीं पचास हजार रुपये का जुर्माना भी उस पर ठोका जाएगा। जाहिर है, यह सभी कानून तभी अमल में आ सकेंगे जब इन्हें लागू करने के लिए आबकारी विभाग और पुलिस को मुस्तैद किया जाएगा। अब बदले दौर में पंचायतों की भूमिका भी बदल गई है। उनसे भी भारी अपेक्षा की जा रही है कि ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए वे कदम उठाएंगी। मालूम हो, प्रदेश में पहली अप्रैल से 430 गांवों में शराब बिकने पर रोक लग जाएगी, हालांकि 469 ऐसे भी गांव हैं, जहां की पंचायत ने इसका आवेदन सरकार के पास किया था, उनके यहां शराब ठेका बंद हो, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। जिन ग्राम पंचायतों ने इसकी मांग की थी, उनके प्रयास की सराहना होनी चाहिए, हालांकि सरकार को उन पंचायतों की मांग पर फिर से विचार करना चाहिए, जिनकी मांग खारिज कर दी गई। शराब का सेवन अगर कानून के दायरे में रहकर होगा तो इस पर किसी को भी आपत्ति नहीं होगी। वहीं राजस्व के लिए गांवों की जनता को शराबखोरी का शिकार होने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है, ग्राम पंचातयों को पुरजोर तरीके से अपने यहां ठेके बंद कराने के लिए काम करना चाहिए और नए सिरे से सरकार से इसकी फरियाद करनी चाहिए।

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