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पिता और पुत्र के अनोखे मिलन को दर्शाता है मकर संक्रांति पर्व: पं. बीरेन्द्र नारायण

Special of Makar Sankranti : हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति का विशेष महत्व होता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है जो कि अत्यंत शुभ माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन को नई फसल और नई ऋतु के आगमन के लिए मनाया जाता है। भृगु ज्योतिष केंद्र सेक्टर 30, चंडीगढ़ के ज्योतिषाचार्य पं बीरेन्द्र नारायण मिश्रा ने बताया कि इस वर्ष 2021 में मकर संक्रांति 14 जनवरी 2021, दिन गुरुवार को मनायी जाएगी। मकर संक्रांति का पुण्य काल प्रात: 08:15 से से प्रारम्भ होकर पूरे दिन रहेगा। इस दिन सूर्य बृहस्पति के साथ शनि की राशि मकर में प्रवेश कर रहे हैं। यह अवधिकाल ऐसे जातकों जिनकी कुंडली में सूर्य या शनि नीच का हो, सूर्य की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो या शनि की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो, के लिए शुभ नहीं है।

इस कालावधि में उन्हें राजपक्ष से कष्ट, नौकरी में उन्नति में अवरोध अथवा व्यापर में हानि का सामना करना पड़ सकता है। अत: मकर संक्रांति के दिन ऐसे जातकों को सूर्य और शनि का पूजन, इनसे सम्बंधित दान व जप कर हवन करें। सामान्यत: यह समय जनसाधारण के लिए उत्तम है।

मकर संक्रांति का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बताते हुए पं बीरेन्द्र नारायण मिश्रा कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव दिन धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं और शनिदेव को मकर और कुंभ राशि का स्वामी माना जाता है। इस कारण से यह दिन पिता और पुत्र के अनोखे मिलन को दर्शाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की असुरों पर विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस मौके पर लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान – धर्म करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर चलता है, इस दौरान सूर्य की किरणों को खराब माना गया है, लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की ओर गमन करने लगता है, तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं। इस वजह से साधु-संत और वे लोग जो आध्यात्मिक क्रियाओं से जुड़े हैं उन्हें शांति और सिद्धि प्राप्त होती है। इस समय नेत्र अथवा चर्म रोगों से पीडि़त व्यकितयों को चाक्षुषोपनिषद का पथ शुभ एवं लाभकारी माना गया है।

मकर संक्रांति का महत्व बताते हुए अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा चंडीगढ़ के स्थानीय प्रवक्ता पं मुनीश तिवारी कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से खिचड़ी बनाने, खाने और दान करने का विशेष महत्व है। इसलिए बहुत सी जगहों पर इस पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में मकर संक्रांति को लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति पोंगल के तौर पर मनाई जाती है। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी पर्व के नाम से मकर संक्रांति को मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन गर्म वस्त्र, तिल की मिठाईयां, खिचड़ी के साथ धन आदि दान देने से शनि त्रस्त व्यक्ति को कष्टों से मुक्ति मिलती है। गरीब तथा अपाहिज और मजदूर वर्ग के सभी लोग शनि के प्रतिनिधि माने जाते हैं।

इन्हें कभी सताना नहीं चाहिए। जिस तरह दान का विशेष महत्व है उसी तरह मकर संक्रांति पर स्नान का भी बहुत अधिक महत्व होता है। इस दिन किसी नदी में स्नान करने से सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मरने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान अवश्य करना चाहिए। यदि किसी पवित्र नदी में स्नान संभव न हो तो घर पर ही एक पात्र में गंगाजल में तिल डालें और उसके पश्चात् उसमें पानी मिलाकर स्नान करना चाहिए। सूर्यदेव को लाल पुष्प अर्पित करें और सूर्यदेव के मंत्रों का तथा आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ भी करें। इसके बाद उनका विधिवत पूजन कर धूप और दीप अर्पित करें, तिल और गुड़ से बने हुए लड्डुओं का भोग लगाने के बाद तांबे के लोटे का जल सूर्यदेव को अर्पित करें।

पं मुनीश तिवारी के अनुसार मकर संक्रांति ही एक ऐसा पर्व है जिसका निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते हैं। यूं तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है पर वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है।

उन्होंने बताया कि शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महा स्नान की संज्ञा दी गई है। मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।

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