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लघु कथा – स्वाभिमान

अनुराग चतुर्वेदी
अनुराग चतुर्वेदी

लघु कथा…. लोक डाउन को शुरु हुए एक हफ़्ता बीत चुका था. रवि की छोटी सी दुकान जो कि बस्ती मे सबकी छोटी मोटी जरुरतो को पुरा करते हुए सबको चौबीस घंटे सेवा दिया करती थी आज कल आस पास की बस्तियां भी वहा से सामान लेने लोग आने लगे थे सोच कर रवि बहुत खुश था कि आज मेरी छोटी सी दुकान सब के काम आ रही है. पहले बस थोडा किराना ही रखता था,अब थोडा आटा, चावल, दाल और अन्य जरूरत के सामान भी वो लाने लगा था. रोज जितना भी लाता सब खत्म हो जाता और कमाई बढ़ने से वो और सामान लाता ,अब तो लोगो से पुछ कर अलग से लिस्ट तैयार कर लेता और अगले दिन सब को उनके पसंद का सामान दे देता. काम ज्यादा बढ़ा तो उसने अपने पडोसी कलुआ के बेटे बबलु को अपने साथ रखने के लिये कलुआ से कहा तो कलुआ की बीबी तुरंत तैयार हो गयी और बोली “दिन भर खेला करता है इसी बहाने रवि भैया से कुछ सीख लेगा. हा रवि भइया पैसा नही दिजियेगा बस थोडा रासन पानी की मदद हो जायेगी तो हम लोगो का काम चल जायेगा वैसे भी अभी आप की कितनी उधारी देना बाकी है समझ लेंगे थोडा कर्जा उतर रहा है”कहते कहते कलुआ की बीबी की आखे गीली हो गयी. “कैसी बात करती हो भौजी ….क्या इस लिये बबलु को साथ ले जा रहा हूँ. आपके मन मे ये काहे आया अरे काम बढ़ गया है और झुमकी को दुकान इस लिये नही ले जा सकता क्योकि अभी मुन्ना छोटा है ,नही तो झुमकी दुकान सम्भाल लेती, आप लोग अपने रासन पानी की चिंता ना करे और बबलुआ के आये से और आराम ना मिल जायी हमका “कहते हुए बबलु की ओर रवि ने देखा जो अकसर रवि की दुकान पर आकर टाफ़ी खाने चला आता था और उसकी भी बडी इक्छा थी कि दुकान के अंदर जा कर देखे कि क्या क्या सामान रखा है, रवि चाचा के तो खूब मजे है जब चाहे तब टाफ़ी खा सकते है और कुछ भी सामान के लिये पैसे भी नही देने पड़ते होंगे ,बाल सुलभ बबलू का मन खुशी से झूम उठा…. “हा चाचा मै चलुगा और खूब मन लगा कर सबको सामान भी दूँगा और आप की मदद करूंगा… “बबलु बोल पड़ा… “हा. हा चल मेरे साथ “रवि ने कहा और बबलू को लेकर चल दिया. बबलू के आने से रवि तो थोडा आराम हो गया था कभी कुछ सामान किसी के घर पहुंचाना होता तो बबलुआ दौड़ कर दे आता और रुपये पैसे का हिसाब भी कर लेता. . कुछ दिन से दुकान के पास बबलु के दोस्त रोज खड़े होने लगे थे वे बबलू को रोज काम करते हुए देखते…पर बबलु अपने काम मे मस्त रहता. एक दिन बबलू का दोस्त पंकज दुकान पर आया और रवि से बोला “चाचा मुझे भी काम पर लगा लो अब तो बबलू भी खेलने नही आता तो मेरा मन नही लगता है दोनों मिल कर आप का काम कर देंगे और चाचा ” …..कहते कहते पंकज रोने लगा.. “क्या हुआ पंकज …कहते हुए रवि और बबलू दोनों दुकान के बाहर आ गये.. पंकज अभी भी सिसक रहा था.. रुक रुक कर बोलने लगा “तीन दिन से कुछ भी खाने को नही मिला है रोज मा बोलती है “जा रे …पंकज अब तो तेरा दोस्त दुकान पर रहता है वो रवि चाचा से कह कर कुछ रासन दिला देगा अभी पिछली उधारी नही चुकाई है और ये बन्दी कारण अब कोइ काम भी नही है बापु के पास है ,मै रोज खड़े होकर सोचता था कि आज जरुर कहुँगा पर हिम्मत नही हो रही थी…. चाचा मुझे भी रख लो मै भी बबलू की तरह खूब मन लगा के काम करूंगा” कहते कहते पंकज की हिचकी बन्ध गयी. रवि ने पंकज को बाहो मे उठा लिया…. “अरे इतना बडा हो गया है तू…और घर की इतनी चिन्ता करने लगा है… ठीक है लगा लुंगा काम पे पर पहले घर जा और ये सामान ले जा कहते कहते उसने बबलू की मदद से एक झोले मे आटा चावल दाल और कुछ और जरुरी सामान के साथ कुछ रुपये भी डाल दिये. और पंकज से कहा “दौड़ कर जा ये सामान ये सामान अपने घर दे आ… तेरी मा ने दो दिन पहले ही सामान बताया था और बोला था कि पंकज को दे देना… मै काम के चक्कर मे भूल गया था तेरी मा ने पैसे भी दिये थे तु चिन्ता ना कर.. जल्दी से दे कर आ.. “कहते कहते रवि के आँसु बहने लगे और पंकज दौड़ता हुआ अपने घर चल दिया… वापस भी आना था उसे. अब वो भी बडा हो गया है सोचते हुए उसके पैर जमीन पर नही पड़ रहे थे.

लेखक:- अनुराग चतुर्वेदी

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