पानी व पेड़ पौधों को बचाएं, कहीं देर न हो जाए: मुनिश्री आलोक
Saturday, September 22, 2018
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पानी व पेड़ पौधों को बचाएं, कहीं देर न हो जाए: मुनिश्री आलोक

पानी व पेड़ पौधों को बचाएं, कहीं देर न हो जाए: मुनिश्री आलोक

चंडीगढ़: जिस तरह से पानी व पेड़ पौधों के कारण उत्पन्न हुए पर्यावरण संकट ने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान समेत पूरे उत्तर भारत को अपनी लपेट में लिये हुए है हर जगह गर्मी व धूल भरे कणों ने आम जनजीवन को अस्त व्यस्त बना दिया। जिस कारण बाहर निकलना तो दूर की बात सांस लेने में भी परेशानी हो रही है। इन सबका कारण आज का इंसान है जो अपने स्वार्थ के कारण लगातार पानी का दुरूपयोग व पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने से बाज नही आ रहा है इसी कारण ही यह विकराल संकट सभी राज्यों मे उत्पन्न हो गया है। अगर जल्द इंसान सभला नही तो बहुत देर हो जाएगी और इसके परिणाम और भी विकराल देखने को मिलेगें इसलिए सभंल जाईये।

ये शब्द मनीषी श्रीसंत ने कहा कि पानी व पेड पौधों के काटने से दुनिया विकराल संकट से जूझ रही है तो भारत भी इससे अछूता नहीं है। इन चुनौतियों का तोड़ निकालने के बीच अब विभिन्न मंचों पर जलवायु परिवर्तन की चिंता पर चर्चा भी आम हो गई है। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक ने रविवारिय सभा को संबोधित करते हुए कहे।मनीषी श्रीसंत ने कहा पेड पौधों को बचाने के लिए व पानी का सदुपयोग के लिए एक अभियान चलाने की जरूरत है और तो और जो पानी का दुरूपयोग कर रहे है व पेड पौधो व पर्यावरण को हानि पहुंचाते है उनके खिलाफ सरकारो को कडी से कडी कार्रवाई करनी चाहिए। स्कूलो, कॉलेजो और परिवारो मे भी बच्चो, बडो, बुजुर्गों सभी को पर्यावरण के प्रति जागरूक करे।

जल प्रबंधन से जुड़े पहलुओं पर सार्थक चर्चा के लिए भारत ने भी जल सप्ताह की शुरुआत हुई है। इस साल भी भारत सरकार के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरोद्धार मंत्रालय के तत्वाधान में इसके पांचवें संस्करण का आयोजन किया जा रहा है। मैं इस दिशा में तत्काल कदम उठाने की हिमायत इसलिए करता हूं, क्योंकि बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन बेहद सीमित हैं। अंधाधुंध दोहन से वे तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं।

पृथ्वी अन्य ज्ञात खगोलीय पिंडों के बीच सबसे महत्वपूर्ण ग्रह मानी जाती है। पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई क्षेत्र पानी से घिरा हुआ है और आवासीय विश्व का लगभग 60-70प्रतिशत भाग को पानी घेरे हुये है। यह दिखाता है कि, पानी पृथ्वी पर नवीनीकृत स्रोत है क्योंकि यह पृथ्वी पर वाष्पीकरण और बारिश के माध्यम से पुन:उत्पादित और पुन:वितरित किया जाता है। यह हमारे दिमाग में एक सवाल को जन्म देता है कि यदि पानी नवीनीकृत स्रोत है तो फिर क्यों हम पानी के लिए चिन्तित हो रहे हैं और इसको संरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। वास्तव, में पृथ्वी पर केवल 1 प्रतिशत पानी है, जो हमारे लिए उपयोगी है। और अन्य पानी के स्रोत प्रयोग न करने योग्य पानी जैसे : समुद्र का पानी, जो 97 प्रतिशत खारा होता है, 2 प्रतिशत पानी जो ग्लेशियर और ध्रुवीय आइसकैंप के रुप में है।

केवल 1प्रतिशत पानी ही हमारे लिए है, जिस पर पूरे विश्व की भारी जनसंख्या जीवन जीने के लिए निर्भर है। मृत्यु भोजन की कमी से ज्यादा पानी के अभाव में अधिक संभव है। यह फिर से हमारे मस्तिष्क में एक और सवाल उठाता है कि, हम जल बचाओ की आवश्यकता को इतनी देर से क्यों महसूस कर रहे हैं? पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों का जीवन पानी पर निर्भर करता है, तब तो यह परिदृश्य बहुत बदतर हो जाएगा जब उपयोग करने योग्य पानी गंदा हो जाए या कम होना शुरु कर हो जाए। बाहर से देखने पर पानी साफ और पीने योग्य लगता है, उसमें उद्योगों, कारखानों, सीवर, जैसे आदि विभिन्न स्रोतों के माध्यम से हानिकारक और विषैले तत्वों का मिश्रण हो सकता है और यदि यह पशुओं, पेड़-पौधों या मनुष्य द्वारा निगल लिया जाए तो यह बीमारी और मृत्यु का कारण हो सकता है।

कुछ सुझाव है, जो वास्तव में जल बचाने में मदद करेंगे।
मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया जल का संग्रह करने के लिए नदियों को जोडऩा मौजूदा सरकारों को प्राथमिकताओं में शामिल करना होगा जिससे पानी को किल्लत वाले क्षेत्रों को भी जल पहुंचाया जा सके। जाहिर है जल संसाधनों के सतत विकास के लिए मौजूदा सरकार ने तमाम प्रयास किए हैं और जब इन प्रयासों को सभी वर्गों का साथ मिलेगा तो भारत निश्चित रूप से जल को लेकर संवेदनशील समाज बन जाएगा।

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