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पंजाब में अकाली-बसपा में जुगलबंदी

पंजाब में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव इस बार काफी अलग होने का अनुमान है। इसकी एक झांकी इस वर्ष स्थानीय निकाय चुनाव के दौरान देखने को मिल चुकी है, लेकिन जनता का मन हवा के झोंके की तरह होता है, कब किधर उड़ चले पता नहीं चलता। केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आवाज उठाते हुए शिरोमणि अकाली दल ने जब भाजपा से किनारा किया तो यह कांग्रेस समेत दूसरे राजनीतिक दलों के लिए राहत की खबर थी।

हालांकि खुद शिरोमणि अकाली दल ने निकाय चुनाव के दौरान इसका अंदाजा लगा लिया कि उससे क्या भूल हुई है। अब भूल हुई तो हुई इसे सुधारना भी जरूरी है। बेशक, शिअद ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, बसपा के साथ विधानसभा चुनाव लडऩे की योजना बना रही पार्टी को सहयोगी चाहिए ही। पिछले कुछ समय के दौरान बसपा की राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपस्थिति नगण्य रही है। हालात ऐसे हैं कि अब पार्टी सुप्रीमो मायावती भी सक्रिय नजर नहीं आ रही हैं। हरियाणा में विधानसभा चुनाव के दौरान इनेलो के साथ गठजोड़ बनाने वाली बसपा ने फिर तुरंत पलटी मार ली थी और गठबंधन से किनारा कर एकतरफ आ खड़ी हुई थी। अब पंजाब में अगर उसने अकालियों के साथ मिलकर चलने की सोची है तो यह राज्य में विकल्प की राजनीति चाहने वाले लोगों के लिए सार्थक समाचार है। जाहिर है, शिअद की बसपा के साथ दोस्ती कितने समय तक चलेगी, यह तो समय ही बताएगा लेकिन दोनों दलों के बीच गठबंधन बनता है तो यह कांग्रेस के माथे पर चिंता की लकीरें जरूर लेकर आएगा।

शिअद और भाजपा के बीच गठजोड़ के वक्त भाजपा की स्थिति हमेशा एक छोटे भाई की रही है। प्रदेश के भाजपा नेताओं के मन में हमेशा यह कुंठा घर बनाए रही है कि शिअद से वे कभी ऊपर नहीं उठ पाएंगे। हालांकि जब शिअद और भाजपा के रास्ते अलग हुए तो भाजपा के उन नेताओं की बांछें खिल गई, जोकि पार्टी में आगे आने की बरसों से चाह पाले हुए थे। जाहिर है, अब खुलकर खेलने का मौका मिल रहा था। यही वजह है कि निकाय चुनाव में भाजपा ने सभी सीटों पर जहां अपने उम्मीदवार खड़े किए। लेकिन इस दौरान पार्टी को मुकाबले में बने रहने के लिए ऐसे उम्मीदवारों को भी टिकट देने पड़ी, जिनके जीतने की संभावना न के बराबर थी। अकेले चुनाव में उतरी पार्टी के लिए यह चुनौती थी, लेकिन इसके बावजूद उसने कड़ी टक्कर देकर अपने वर्चस्व को साबित किया। हालांकि अब विधानसभा चुनाव में भाजपा की वही भूमिका बसपा निभाने को तैयार है।

ऐसी रिपोर्ट हैं कि शिअद बसपा को वैसा ही दर्जा और सीटें देने पर अडिग है, जैसा वह भाजपा को देती थी। लेकिन बसपा इससे कहीं ज्यादा चाहती है। बहरहाल, शिअद, बसपा की मांग की अनदेखी करने की स्थिति में होगी, ऐसा नहीं लगता। इसकी वजह बसपा के पास दलित मतदाताओं का आधार होना है। पंजाब में दोआबा और माझा इलाके में दलित मतदाताओं की बेहतर संख्या, किसी भी राजनीतिक दल को आगे बढ़ा सकती है या फिर पीछे धकेल सकती है।

दलित वोट हासिल करने के लिए पंजाब में कोई भी राजनीतिक दल दलितों की अनदेखी करने का साहस नहीं दिखा पाता। यही वजह है कि शिअद ने जहां सत्ता में आने पर दलित उपमुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की है, वहीं भाजपा भी इसका ऐलान कर चुकी है। हालांकि भाजपा तो दलित मुख्यमंत्री ही बनाने की पैरवी कर रही है। उत्तर प्रदेश में भाजपा और बसपा का गठजोड़ सफल नहीं रहा था, इसके बाद बसपा ने सपा के साथ आने का निर्णय लिया, लेकिन यह निर्णय भी बदलते देर नहीं लगी। ऐसे में पंजाब में बसपा, भाजपा के साथ आती, इतनी उम्मीद नहीं थी। बसपा के कांग्रेस के साथ भी जाने की गुंजाइश नहीं थी।

ऐसे में शिअद और बसपा का साथ आना स्वाभाविक था। पंजाब में दलित मतदाता प्रयोगधर्मी है, वह कांग्रेस के साथ जाना पसंद करता है, लेकिन उचित प्लेटफार्म मिलने पर वह अपना इरादा भी परिवर्तित कर लेता है। यही वजह है कि आप ने जब पंजाब में अपनी जगह बनाने की कोशिश की तो दलित मतदाता का उसे काफी सहयोग मिला। लेकिन इस बार राज्य की राजनीति में बदलाव दिखेगा। बेशक, शिअद ने दलित उपमुख्यमंत्री की घोषणा की है, लेकिन सवाल यह पूछे जा रहे हैं कि आखिर यह दलितों को इस्तेमाल करने की कोशिश तो नहीं है। क्योंकि राज्य क्या, देश की राजनीति में भी दलितों को स्वाभाविक रूप से नहीं अपितु किसी निर्धारित मकसद से आगे किया जाता है और फिर उन्हें एक सजावटी पद सौंप कर दलित वर्ग में यह दिखाने की कोशिश होती है कि किस प्रकार दलितों का उद्धार किया जा रहा है।

बसपा की पहचान पूरी तरह से एक दलित पार्टी की है, लेकिन पार्टी के कर्ता-धर्ताओं की सोच न जाने क्यों कुंठित होकर सामने आती है कि वे अपने कदमों पर खड़े होने की बजाय दूसरों की बैसाखी बन जाते हैं। बसपा ने अपने शुरुआती दौर में दलितों और  समाज के उन दमित वर्गों के लिए आशा के नए दरवाजे खोले थे, जोकि विकल्प की राजनीति चाहते हैं। हालांकि बसपा को जब मौके मिले तो उसने उन आशाओं को पूरा भी किया लेकिन फिर आरोपों का भार पार्टी को ले बैठा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब बसपा खुद को अगर पिछड़ी पा रही है तो इसके लिए ये आरोप भी वजह हैं। पंजाब में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव बसपा के लिए नई शुरुआत हो सकते हैं। बेशक, पार्टी के प्रदेश स्तरीय नेता यह बात समझते भी हैं, यही बात है कि वे सीटों को लेने में कोई जिद नहीं दिखाना चाहते। उनकी राय है कि अगर पार्टी को दो से चार सीटें छोडऩी भी पड़ी तो वे इसके लिए तैयार हैं।

पंजाब में शिअद-बसपा के बीच गठजोड़ की खबरों के बीच कांग्रेस में जारी राजनीतिक उठा-पटक अब और बढऩे की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। पार्टी के अंदर गुटबाजी न पहले खत्म हुई है और न ही निकट भविष्य में इसके खत्म होने की संभावना है। यह भी तय है कि पार्टी अकेले ही चुनाव मैदान में उतरे। भाजपा और आप से कांग्रेस को कोई चुनौती न मिले लेकिन शिअद-बसपा का गठजोड़ उसके लिए सिरदर्द बन सकता है। जाहिर है, इस गठजोड़ के साथ राज्य में राजनीतिक सरगर्मी और तेज होंगी। पंजाब की जनता को राज्य के संपूर्ण विकास की सोच को मद्देनजर रखकर चलना होगा।

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