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Ruckus in Parliament, loss of country

संसद में हंगामा, देश का नुकसान

Ruckus in Parliament, loss of country यह लगभग तय था कि संसद का मानसून सत्र हंगामापूर्ण होगा ही। एक तरफ मोदी सरकार ने जहां तमाम विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्ष को साथ लेकर चलने कोशिश की थी, लेकिन पहले ही दिन जिस प्रकार से विपक्ष ने संयुक्त स्वर में सदन की कार्यवाही में बाधा डाली, उससे यह संभावित हो गया कि विपक्ष के इरादे ठीक नहीं हैं।

देश में आज एक नहीं अनेक समस्याएं हैं। ऐसे में आम आदमी जहां गुस्से से लाल है, वहीं उस गुस्से को भांप कर विपक्षी दल सदन में उतरे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस, टीएमसी, बसपा और अकाली दल के सांसदों ने जहां महंगाई को मुद्दा बनाया वहीं किसान आंदोलन और अन्य मुद्दों पर भी नारेबाजी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बोलने तक नहीं दिया। यह भी कैसी विडम्बना है कि विपक्ष ने सत्र के पहले दिन का ठीक से आगाज तक नहीं होने दिया।

प्रधानमंत्री इस दौरान अपनी कैबिनेट के नए मंत्रियों का सदन से परिचय करा रहे थे, लेकिन विपक्ष को यह गवारा नहीं हुआ। हालांकि सरकार ने अपने हथियार नहीं डाले और विपक्ष ने अगर हल्ला मचाया तो सरकार ने आरोप लगा दिया कि कैबिनेट में शामिल किए गए दलित एवं महिला मंत्रियों के परिचय को न सुनकर विपक्ष ने इन वर्गों के लोगों के साथ अन्याय किया है। मोदी ने कहा भी कि कुछ लोगों को बहुत पीड़ा हो रही है।

दरअसल, लंबे समय बाद संसद के इस सत्र में विपक्ष सरकार को अपना गुब्बार निकालने का अवसर मिला है। देश में इस समय कोरोना का संकट जारी है, बीते अप्रैल, मई में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव ने जिस प्रकार के हालात पैदा किए थे, उसके बाद सरकार से अनेक सवाल पूछने का मन सांसद बनाए हुए हैं। कोरोना संकट की वजह से ही अब देश में महंगाई आसमान से भी ऊपर जाने को बेताब है। पेट्रोल- डीजल के रेट तो हाथ से निकल ही गए हैं, रसोई गैस भी महंगी हो गई है। इसके साथ ही सब्जी-फल के समेत हर वस्तु के दाम डबल से ज्यादा हो चुके हैं।

Ruckus in Parliament, loss of country  इस बीच किसान आंदोलन तो हरा-भरा है ही। पंजाब-हरियाणा के किसानों ने इसे जीवित बनाए रखा है, अनेक दौर की बातचीत के बावजूद केंद्र सरकार इस मसले का समाधान नहीं कर सकी है। इस बीच राजनीतिक मोर्चे पर भाजपा जहां इस जंग को हारती नजर आ रही है, वहीं विपक्ष के नेता किसानों को आगे करके सरकार पर लगातार हमलावर हैं। अब मॉनसून सत्र में उन्हें अपनी आवाज पूरे देश को सुनाने का अवसर मिल गया है। तब इसकी उम्मीद रखना कि विपक्ष धैर्य से सरकार की बात सुनेगा, बेनामी होगा। वैसे, एक नया मामला भी विपक्ष के हाथ लग चुका है, पेगासस स्पाईवेयर के जरिये फोन हैकिंग के मामले ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हंै। सरकार और भाजपा अपनी ओर से सफाई देते नहीं थक रहे, लेकिन विपक्ष खासकर कांग्रेस ने जैसा हमला बोला है, उसके बाद सरकार को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। जिनकी जासूसी कराई जा रही है, उनमें पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम भी शामिल है।

वैसे, सत्र के पहले ही दिन विपक्षी सांसदों का इस प्रकार का आचरण चिंतित करने वाला है। संसद में सामान्य मर्यादा भी अब नहीं दिख रही है। विधेयकों पर चर्चा के दौरान विपक्ष का हंगामाखेज होना स्वीकार किया जाएगा, लेकिन अगर प्रधानमंत्री एक परंपरा के तहत नए मंत्रियों का परिचय करवा रहे हैं तो क्या इतना भी वक्त विपक्षी सांसदों के पास नहीं है कि वे शांति से उनकी बात सुन सकें। ऐसा कम ही होता है, जब प्रधानमंत्री को नए मंत्रियों का परिचय देने से रोका जाता है। संसद का वास्ता महज सांसदों से नहीं हैं, उन मंत्रियों से भी है, जिनके पास अपने संसदीय क्षेत्र के कार्य लेकर सांसद पहुंचेंगे। सरकार में मंत्री बनने के बाद तो कोई दल नहीं रह जाता, तब तो सभी सांसद सरकार का हिस्सा होते हैं और सरकार की जिम्मेदारी पूरे देश की होती है। वैसे कांग्रेस सांसद ने तो प्रधानमंत्री के परिचय कार्यक्रम की यह कहकर आलोचना की कि संसद कोई नोटिस बोर्ड नहीं है। इस बीच यह भी कहा गया कि मंत्रियों का परिचय कराने से डॉ मनमोहन सिंह को भी दो बार रोका गया था। यानी वक्त खुद को दोहरा रहा है। भारतीय राजनीति में विडम्बनाओं का सूत्रपात आज की बात नहीं है। यहां अब गलत परंपरा को गांठ बांध कर रख लिया जाता है और समय आने पर जैसा को तैसा की रणनीति अपनाई जाती है। न जाने वे क्या परिस्थितियां रही होंगी, जब विपक्ष ने डॉ मनमोहन को रोका था, अगर उस समय ऐसा किया गया तो हर बार ऐसा किया जाएगा, यह अनुचित जान पड़ता है।
संसद के सत्र में प्रति दिन लाखों रुपये खर्च होते हैं। अगर सत्र बगैर सार्थक बहस के महज हंगामे की भेंट चढ़ जाए तो देश के संसाधन भी व्यर्थ हो जाते हैं। ऐसे में यह सभी के लिए विचारणीय है कि मॉनसून सत्र देश के लिए लाभदायक बने। केंद्र सरकार अनेक विधेयकों पर चर्चा कराना चाहती है, इतिहास गवाह है कि संसद में अनेक विधेयक इसलिए पारित नहीं हो सके क्योंकि विपक्ष की उन पर सहमति नहीं बनी। ऐसा गठबंधन सरकारों के वक्त में होता आया है।

बीते सत्र में कृषि कानूनों को पारित करवा कर मोदी सरकार ने बहुत बड़ा हाथ मार लिया था, लेकिन इसके बाद से विपक्ष के अंदर एकता कायम हो गई है। महंगाई, कोरोना महामारी, टीकाकरण इत्यादि अनेक व्यापक मुद्दे हैं, जिन पर संसद में तथ्यपरक बहस की आवश्यकता है, खुद प्रधानमंत्री मोदी ने भी सर्वदलीय बैठक में यह बात रखी थी कि सरकार सभी मुद्दों पर बहस को तैयार है, लेकिन विपक्ष को भी सहयोग देना होगा। वैसे, यह भी सच है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में रोजाना फेरबदल नहीं होता, यानी अगर सरकार गठन के बाद पहली बार फेरबदल हुआ है तो नए मंत्रियों का परिचय करा देने में क्या बुराई है। संसद सत्र के समय खासतौर पर कुछ ऐसे मुद्दे उठाए जाते हैं, जिनसे संसद व देश के कामकाज व चिंतन की दिशा भटकती है। ऐसे मुद्दे जोकि देश की दशा और दिशा प्रभावित कर रहे हैं, के बारे में संसद ही बहस का उपयुक्त स्थल है। हालांकि यह तभी होगा जब सरकार को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले और उसके बाद विपक्ष अपनी बात रखे।

विपक्ष का मंतव्य अपना स्वार्थ पूरा करने का नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका रचनात्मक होनी चाहिए। उसकी आवाज जनता की आवाज होती है, लेकिन तार्किक तरीके से सरकार का विरोध न करके महज विरोध के लिए विरोध करने की मानसिकता अनुचित है। आज के हालात वैसे ऐसे हैं कि किसी भी राजनीतिक दल की सरकार होती, वह यूं ही समस्याओं से घिरी नजर आती। कोरोना संकट ने देश की आर्थिकी को पहले ही भारी नुकसान पहुंचाया हुआ है। हालांकि सरकार को भी राजनीति से परे जाकर संवेदनशील तरीके से विपक्ष को साथ लेकर चलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सरकार के लिए सत्र को चलाना मुश्किल होगा और ऐसे में नुकसान देश का ही होगा।

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