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आंदोलन से पंजाब ही प्रभावित नहीं

Punjab not only affected: तीन कृषि कानूनों को लेकर किसानों का आंदोलन किस प्रकार आम जनता पर भारी पड़ रहा है, वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास पहुंची शिकायत के जरिए और अच्छी तरह से समझा जा सकता है। अभी तक सरकार में बैठे लोग और आंदोलन के लगातार खींचते जाने से परेशान आम जनता की बातें मीडिया के जरिए सामने आ रही थीं, लेकिन अब मानवाधिकार आयोग के पास भी इसकी शिकायत पहुंची है और इसके बाद आयोग ने दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के अधिकारियों को नोटिस जारी कर किसानों के विरोध प्रदर्शन की रिपोर्ट मांगी है। दरअसल, मानवाधिकार आयोग को शिकायत मिली हैं कि इन राज्यों में चल रहे किसान आंदोलन की वजह से नौ हजार से अधिक उद्योग बंद हो चुके हैं। यातायात व्यवस्था चरमरा गई है। जिसकी वजह से लोगों को, मरीजों, बुजुर्गों और दिव्यांगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है साथ ही बोर्डरों के बंधक होने की वजह से लोगों को ज्यादा दूरी तय करनी पड़ रही है। अब जरा पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के उस बयान पर गौर फरमाया जाए, जिसमें उन्होंने कहा है कि पंजाब के किसान यहां नहीं अपितु हरियाणा और दिल्ली की सीमा पर जाकर धरना दें। वे यह भी बताने से पीछे नहीं हटे कि ऐसे धरने राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर साबित हो रहे हैं। दरअसल, ये धरने केवल पंजाब की अर्थव्यवस्था के लिए ही नहीं अपितु हरियाणा, दिल्ली, यूपी समेत पूरे देश की अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं।

पंजाब में इस समय कृषि कानूनों के खिलाफ 113 जगह धरने जारी हैं। अगर देखा जाए तो पंजाब से ही इन कानूनों का विरोध शुरू हुआ था। दिल्ली जाने के लिए निकले किसानों को जब हरियाणा सरकार ने रोकने की कोशिश की तो इस पर भारी हंगामा हुआ था। इससे पहले किसान पंजाब में हाईवेज, रेल ट्रेक, टोल प्लाजा और जगह-जगह जाम लगाकर बैठे थे। यह मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट तक पहुंचा था, क्योंकि पंजाब के उद्योगों को इससे भारी नुकसान हो रहा था। खैर, जब किसानों ने दिल्ली बॉर्डर का रूख किया तो पंजाब की कांग्रेस सरकार ने राहत की सांस ली थी। लेकिन अब एकबार फिर अगर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह किसानों से इसकी गुहार लगा रहे हैं कि वे दिल्ली बॉर्डर पर जाकर धरना दें तो यह साबित हो चुका है कि इन धरनों की वजह से राज्य सरकार को नुकसान हो रहा है और खुद कैप्टन इसे स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में सहज समझा जा सकता है कि ये धरने किस प्रकार आंदोलन प्रभावित राज्यों के लिए नुकसानदायक बन रहे हैं। तब इन धरनों को खत्म करने के लिए प्रयास होने चाहिए, लेकिन कांग्रेस ने इसे राजनीतिक मुद्दा बना लिया है और वह नहीं चाहती है कि कृषि कानूनों का मसला सुलझे। अब हरियाणा के गृहमंत्री अनिल विज जहां किसानों को भडक़ाने का कैप्टन पर आरोप लगा रहे हैं, वहीं कृषि मंत्री जेपी दलाल कह रहे हैं कि कैप्टन को हरियाणा और दिल्ली की भी चिंता करनी चाहिए। मालूम हो, नवजोत सिंह सिद्धू के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने के वक्त पंजाब के कांग्रेस नेताओं ने इसका श्रेय लेना चाहा था कि किसान आंदोलन पंजाब और कांग्रेस के प्रोत्साहन से चल रहा है। अब मुख्यमंत्री कैप्टन का यह बयान भी किसी न किसी तरह आंदोलनकारी किसानों को प्रोत्साहित करने वाला है कि वे आंदोलन करें लेकिन पंजाब में नहीं, अपितु यहां से दूर जाकर।

वास्तव में कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा आंदोलन अब किसी नतीजे पर पहुंचना जरूरी है। यह कैसी विडम्बना है कि किसान जहां इसे राष्ट्रीय महत्व की बात बनाकर प्रचारित कर रहे हैं कि इन कानूनों की वजह से किस प्रकार खेती खत्म हो जाएगी। किसानों की आशंकाएं अपनी जगह सही या गलत हो सकती हैं लेकिन इस आंदोलन की वजह से आम जनता को जो परेशानी हो रही है, उसे किसान क्यों नहीं समझ पा रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को यह भी शिकायत मिली है कि इस आंदोलन की वजह से कुछ जगहों पर लोगों को उनके घरों से भी नहीं निकलने दिया जा रहा। इसके अलावा आन्दोलन स्थलों पर कोविड प्रोटोकॉल की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हरियाणा सरकार ने तो इसकी शिकायत भी की थी कि किसान आंदोलनकारी कोरोना रोधी वैक्सीन नहीं लगवा रहे। यह सब सरकार के खिलाफ माहौल बनाए रखने की योजना थी। इस आंदोलन की वजह से कुंडली, सिंघु बॉर्डर पर व्यवसायियों और कारोबारियों का रोजगार ठप हो गया है। मानवाधिकार आयोग ने इसे भी गंभीरता से लिया है और आर्थिक विकास संस्थान से भी 10 अक्तूबर तक इस आंदोलन की वजह से उद्द्योग पर पड़े प्रभाव पर एक रिपोर्ट मांगी है। वहीं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और गृह मंत्रालय से इस भी आंदोलन में हो रहे कोविड नियमों के उल्लंघन पर भी रिपोर्ट मांगी है।

वास्तव में किसान आंदोलन के दूसरे पहलू को भी गंभीरता से देखे जाने की जरूरत है, जोकि अब शुरू हो गया है। किसान आंदोलनकारियों ने केंद्र सरकार के किसी कदम पर भरोसा नहीं जताया है वहीं यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, कानूनों के अमल पर रोक लग चुकी है, बावजूद इसके अब भी आंदोलन के नाम पर राजनीति उफान पर है। यह जानना जरूरी है कि आखिर इस आंदोलन की सच्चाई क्या है, किसान आंदोलनकारी किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में विघ्न डालने के लिए खुद आक्रामक होकर जाते हैं और पुलिस कार्रवाई में चोट या जान की क्षति होने पर उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह कहां तक उचित है। देश में आने-जाने, कारोबार करने आदि की सभी को स्वतंत्रता है लेकिन आंदोलनकारियों की वजह से यह स्वतंत्रता खत्म हो गई है। किसानों को अपने हक के लिए आवाज उठानी चाहिए लेकिन इस दौरान दूसरे लोगों को पैदा हो रही समस्या का भी भान उन्हें होना चाहिए। आंदोलन अपनी जगह है, लेकिन देश में व्यवस्था एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी अपनी जगह कायम है। यह प्रत्येक का संवैधानिक अधिकार है।

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