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आतंकवाद सरीखे संवेदनशील मुद्दों पर सियासत निंदनीय

जम्मू-कश्मीर बेशक अनुच्छेद 370 की बेडिय़ों से आजाद हो चुका है, लेकिन घाटी में आतंकी गतिविधियों से इसे निजात फिर भी नहीं मिल सकी है। अब तो आलम यह है कि डीएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी आतंकियों के साथ मिलीभगत करके देश के साथ गद्दारी करते दिख रहे हैं। एक वीरता पुरस्कार प्राप्त डीएसपी देविंदर सिंह पर जो आरोप हैं, वे बेहद शर्मनाक और पुलिस फोर्स को शर्मिंदा करने वाले हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस मामले में जांच शुरू कर चुकी है। जांच रिपोर्ट में यह सामने आ रहा है कि इससे पहले छह बार आरोपी डीएसपी आतंकियों को कश्मीर से बाहर पहुंचा चुका है। यानी उसकी यह करतूत लंबे समय से जारी थी। भारत में रहकर पाकिस्तान परस्ती करने वाले ऐसे लोगों की सजा तो कठोरतम होनी ही चाहिए और ऐसे संवेदनशील मसलों पर राजनीतिक दलों को भी एक दूसरे पर कीचड उछालने से गुरेज करना चाहिए।

मालूम हो, डीएसपी पर आरोप है कि वह हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकियों को अपनी गाड़ी में लेकर कश्मीर से बाहर ले जा रहा था। यह मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है और अत्यंत गंभीर है। देविंदर सिंह के संबंध में जो रिपोर्ट आ रही हैं, उनके मुताबिक उसकी कश्मीर, दिल्ली और चंडीगढ़ में बड़ी संपत्तियां हैं। एक डीएसपी स्तर का अधिकारी अपने वेतन बलबूते पर करोड़ों की सम्पत्तियां भला कैसे अर्जित कर सकता है। जाहिर है, देश से गद्दारी का आतंकियों और उनके सरपरस्त से जो इनाम ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों को मिलता है, उसी से इतनी संपत्तियां खड़ी की जाती हैं। यह भी सामने आ रहा है कि देविंदर सिंह से पुलवामा पुलिस लाइन पर दो वर्ष पहले हुए आतंकी हमले के संबंध में भी कुछ अहम जानकारी मिली हैं। यह कितनी बड़ा धोखा है कि आतंकवाद विरोधी अभियानों में हिस्सा लेने के लिए ही जिस डीएसपी को समय से पहले पदोन्नति से नवाज दिया गया हो, वही आतंकवादियों का हमसफर बन कर देश की सुरक्षा को ताक पर रख रहा था।

इस बीच, डीएसपी देविंदर सिंह की गिरफ्तारी ने देश में एक ओर राजनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया है। विपक्ष जोकि पहले से नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी को लेकर होहल्ला कर रहा है, अब देविंदर सिंह की गिरफ्तारी को भी विपक्ष मुद्दा बना लेना चाहता है। कानून के सामने एक आरोपी का धर्म, जाति और क्षेत्रवाद कोई महत्व नहीं रखता है, आरोपी सिर्फ आरोपी होता है लेकिन कांग्रेस ने इस मामले में भी आरोपी डीएसपी का धर्म परख लिया है। कांग्रेस नेता का यह कैसा अटपटा बयान है कि देविंदर सिंह अगर देविंदर खान होता तो ट्रोल टुकड़ी की प्रतिक्रिया कहीं ज्यादा तीखी और मुखर होती। इस बयान के जरिए कांग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि भाजपा का रुख मुस्लिमों के खिलाफ है, फिर चाहे नागरिकता संशोधन कानून हो या फिर जम्मू-कश्मीर में आतंकी। वैसे कांग्रेस बखूबी जानती है कि है कि घाटी में आतंकी हरकतों के पीछे ज्यादातर लोग किस धर्म के हैं।

ऐसी बयानबाजी से की खुद कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की सोच क्या उजागर नहीं होती। कांग्रेस यह सवाल भी उछालती रही है कि नोटबन्दीके बाद भी घाटी में आतंकवाद की घटनाएं जारी। कांग्रेस का यह भी कहना है कि हमें सामने की चौकसी करते हुए पीछे से आंखें मूंदना महंगा पड़ेगा। उनका कहना है कि अब निश्चित तौर पर यह सवाल उठेगा कि पुलवामा के खौफनाक हादसे के पीछे के असली मुजरिम कौन थे – इसे नए सिरे से देखने की जरूरत है। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा प्रकरण सामने आया था जब विपक्ष नेपुलवामा कांड को देश के अंदर से प्रायोजित करार दिया था। ऐसी बयानबाजी से कांग्रेस को चुनाव मे कोई फायदा तो क्या मिलना था उलटे पाकिस्तान को कुछ न कुछ फायदा जरूर मिल गया हैं।

अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद पाकिस्तान जब संयुक्त राष्ट्र संघ में गया तो उसने कांग्रेस नेताओं के उन बयानों को आधार बनाया था जो संयुक्त राष्ट्र में जमा करवाये गए दस्तावेज में दर्ज थे। इनमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम सबसे ऊपर था। अब जबकि डीएसपी देविंदर सिंह की गिरफ्तारी के सुरक्षा से जुड़ा है जिसकी जांच पुलिस से लेकर एनआईए तक करेगी इसलिए इसे राजनीतिक रंग देना कहां तक जायज है, यह भी आश्र्चयजनक है कि आज देश का मीडिया भी बंटा हुआ नजर आ रहा है, एक वर्ग ने सही को सही कहना बंद कर दिया है तो दुसरे वर्ग को गोदी मीडिया की संज्ञा दी जाती है। इसके पीछे राजनीतिक सरोकार और स्वार्थ हो सकते हैं, लेकिन यह याद रखा जाना जरूरी है कि मीडिया की निष्पक्षता और प्रखरता से ही लोकतंत्र की स्वतंत्रता जीवित है। कांग्रेस और विपक्ष को आलोचना का अधिकार है लेकिन यह सकारात्मक हो तो तब ही स्वीकार्य भी।

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