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समय के बीच और समय के पार बात करती है कविता

‘कविता समय के बीच और समय के पार बात करती है। कविता मेरे लिए एक हथियार है।’ यह कहना है साहित्यकार अमित मनोज का। दक्षिण हरियाणा में महेंद्रगढ़ जिले के कोथल कलां के अमित मनोज इस समय महेंद्रगढ़ में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी व भारतीय भाषा विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले छह साल से ‘रेतपथ’ पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। 5 नवम्बर, 1982 को बाबूलाल नामक एक किसान के घर में जन्मे, सैंतीस वर्षीय अमित मनोज लगातार लिख रहे हैं और हरियाणा के साहित्यकारों में उनका एक जाना पहचाना नाम है। अमित मनोज से उनके लेखन को लेकर हाल ही में सुमित्रा ने लंबी बात की। यहां प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश :-

आपने लिखना कैसे और कब शुरू किया?

– नौवीं कक्षा से अखबार के प्रति मेरा बहुत आकर्षण था। मुझे यह नहीं पता था कि अखबार में छपते कैसे हैं। फिर पाठकों के कॉलम में लिखना शुरू किया। इसके बाद कई अखबारों में खूब फीचर्स भी लिखे। कविताएं भी बीच-बीच में लिखता था, पर वे डायरी तक ही सीमित थी। एक दिन हुआ यह कि एक अखबार ने मेरे एक लेख को कुछ ज्यादा ही संपादित कर दिया। लेख तो मेरे ही नाम से छपा था, लेकिन कहीं से भी मुझे यह नहीं लगता था कि उस लेख का लेखक मैं हूं। उस दिन से अखबारों के लिए लिखना छोड़ दिया और अपनी कविताओं की तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया था।

पहली रचना कब और कहां प्रकाशित हुई?

– पहली साहित्यिक रचना के प्रकाशित होने की तिथि याद नहीं। वर्ष 1998-99 में लघुकथा या कोई कविता रही होगी।

पहली किताब कब प्रकाशित हुई और इस पर आपके परिवार के लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी?

– पहली किताब ‘कठिन समय में’ वर्ष 2010 में हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित हुई थी। परिवार वालों को कोई खास फर्क नहीं पड़ा होगा। इसका कारण यह था कि उन्हें जो फर्क पडऩा था, वह मेरे लेखन के शुरुआती दिनों में पड़ गया था। इस संबंध में एक दिलचस्प वाकिया है। दसवीं बोर्ड की परीक्षा वाली क्लास थी। मैं एक पोस्टकार्ड किसी संपादक के नाम लिख रहा था। पापा ने देख लिया। फिर क्या था। मुझे जो डांट पड़ी, वह आज तक भुलाए नहीं भूलती। मैंने संपादक के नाम चि_ियां लिखना छोड़ दिया। लिखता था तो अपने कमरे को बंद करके लिखता था, ताकि पापा तक कोई भी खबर न पहुंचे। दसवीं में मेरिट आई तो पापा ने रोहतक भेज दिया। दो-चार दिन बाद अखबार के लिए दक्षिणी हरियाणा के एक खास व्यंजन ‘राबड़ी’ पर एक लेख लिखा। रविवारीय मैगजीन में यह बहुत खूबसूरती से छपा भी। एक दिन मेरे पास एक अंतरदेशीय पत्र आता है। पते की लिखाई देखकर ही जान गया था कि पापा का है। पत्र खोला और पढ़ा तो आंखों में आंसू आ गए थे। मुझे उनके पत्र में लिखी आज भी यह पंक्ति याद है-‘राबड़ी पर आपका लेख पढ़ा। ठीक था। तो यह प्रतिक्रिया थी, जो पहली थी। मम्मी और दादी के लिए मेरा कुछ भी लिखना-पढऩा पढ़ाई थी। मैं बताता भी था तो मम्मी हंस देती थी और दादी अपना खुरदुरा हाथ मेरे सिर पर फिरा देती थी।

पाठकों की तरफ से मिलने वाली प्रतिक्रियाओं को आप कैसे लेते हैं? रचना की प्रशंसा सुन कर कैसा महसूस करते हैं?

– अच्छा लगता है, पर मैं प्रशंसा पर जीने वाला रचनाकार नहीं हूं। प्रशंसा के बावजूद मैं रचना पर सोचता रहता हूं कि वाकई में रचना कैसी है ? कमजोर लगती है तो प्रकाशित होने के बाद भी उसे छोड़ देता हूं।

लिखने के लिए क्या किसी खास समय को चुनते हैं?

– समय को चुनता नहीं हूं। तनाव ही रचना के लिए माहौल तैयार करता है। आपके पास आइडिया ही ऐसा होगा कि बिना लिखे चैन ही न पड़ेगा। तब आप समय नहीं देखते। नींद नहीं आएगी तो रात को उठ कर लिखेंगे। सुबह लिखेंगे। दोपहर-शाम या सफर तक में लिखेंगे। तब भी मैं अपनी बात करूं तो सुबह लिखना अधिक पसंद करता हूं। छुट्टी वाले दिन और मजा आता है। उस दिन नौकरी की व्यस्तता नहीं होती। दिन भर आप अपनी पसंद का काम कर सकते हैं। कोई पेंटिंग बना सकते हैं। अधूरी रही कोई रचना पढ़ सकते हैं। लिख सकते हैं।

लिखने के लिए अगर कोई विचार क्लिक करता है तो उसे तुरंत नोट करते हैं या उसे परिपक्व होने के लिए पर्याप्त समय देते हैं?

– विचार ही लेखन को जन्म देता है। क्लिक हुए विचार पर आपका वश नहीं होता। विचार एक प्रवाह की तरह आता है। यह व्यक्ति-व्यक्ति और विचार पर निर्भर करता है कि वह कितनी देर तक किसी के साथ रहता है। स्मृति की भी इसमें पूरी भूमिका होती है। मैं कोशिश करता हूँ कि जेहन में कौंधे विचार को कागज पर लिख लूं। यदि खुद ड्राइविंग कर रहा हूँ तो गाड़ी साइड में रोक कर पहले उस विचार को कागज पर नोट कर लेता हूँ, बाद में कई दिनों बाद उसे फिर से देखता हूं। लगता है कि विचार बेहतर है तो उसे रचना की शक्ल में तराशना शुरू कर देता हूं और यदि विचार पसंद नहीं आता तो उस कागज को फाड़ देता हूँ। विचार को रचना तक पहुंचाने में मुझे बहुत वक्त लगता है। मैं जल्दी से कोई रचना पूरी नहीं कर पाता। रचना मेरे भीतर निरंतर अपने जुड़ाव-घटाव के साथ चलते हुए मौजूद रहती है।

क्या कभी ऐसा होता है कि लिखने के लिए समय नहीं निकाल पाए हों और बाद में रचना के लिए प्रेरित करने वाले विचार अचानक साथ छोड़ गए हों ?

– ऐसा अक्सर होता है कि जब लिखने के लिए आपके पास समय नहीं होता। रचना के लिए प्रेरित करने वाले विचार साथ तो नहीं छोड़ते, वे घूम-घूमकर वापस आते रहते हैं। लेकिन बहुत बेहतरीन रचनाएं बिना लिखे रह जाती हैं। जैसे ‘शिकायत’ और ‘ट्रांसलेटर’  जैसी अपनी ही कहानियां आप मुझसे सुन सकते हैं। अंत तक उनका फाइनल है, लेकिन लिखी नहीं गई हैं। जैसे कि मेरा एक उपन्यास जो भैंस जैसे एक मूक पशु के बहाने लिखा जा रहा है। छह-सात साल से अधूरा ही चल रहा है। नहीं लिखे के भी कुछ कारण वाजिब हैं। कभी-कभी लगता है कि रचना को अपने भीतर खूब पकने देना चाहिए। इससे लाभ भी है, हानि भी। लाभ यह है कि पकते रहने से वह निखर कर आपके सामने आती है। तब जो रचना कागज पर आएगी, अतिरिक्त उसमें कुछ नहीं होगा। हानि यह है कि कभी-कभी आपका वह विचार स्लिप हो सकता है और पूरी की पूरी रचना आपके जेहन से गायब या दबी रह सकती है।

आपकी नजर में कविता क्या है ?

– कविता से मेरा अभिप्राय उस रचना से है, जो कम शब्दों में अधिक प्रभाव पैदा करे। कविता एक साथ कई अर्थ रखती है। कविता समय के बीच और समय के पार बात करती है। कविता की पंक्तियां आपके भीतर अपनी गूंज के साथ देर तक रहती हैं। कविता मेरे लिए एक हथियार है। जब मुझे किसी से लडऩा होता है या जब मुझे किसी के पक्ष में खड़ा होना होता है तो मैं कविता की जरूरत महसूस करता हूं।

आपने कविता और कहानी, दोनों विधाओं में लिखा है। आपकी दिलचस्पी कविताएं लिखने में ज्यादा है या कहानियां लिखने में?

– असल में मैं खुद नहीं जानता कि मैं कवि अधिक हूं कि कहानीकार। पेंटर अधिक हूं कि फोटोग्राफर। लिखना मैं कहानियां ही चाहता हूं। कविताएं बीच-बीच में आती हैं तो उन्हें छोड़ नहीं पाता। मुझे लगता है कि कविता न लिखने पर उसका विचार, कहानी या उपन्यास में उस तरह से नहीं आ पाएगा, जैसा वह कविता में आ पाता है। कविताओं की मुझे कोई योजना नहीं बनानी पड़ती, लेकिन कहानियों के प्लाट और शिल्प पर मुझे बहुत सोचना पड़ता है। अब मैं कहानियों और उपन्यास की दिशा में आगे बढऩा चाहता हूं।

आप यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। जाहिर है, कामकाज में बहुत व्यस्त रहना पड़ता होगा। ऐसे में लिखने के लिए कैसे समय निकाल पाते हैं?

– आपने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया। व्यस्तता इतनी रहती है कि मेरी अनेक रचनाएं आधी-अधूरी हो गई हैं। एक को लिखना शुरू करता हूं तो दूसरी जोर मारती रहती है। कभी अकादमिक कार्य आपको काम ही नहीं करने देते। आप चाहते हुए भी अपनी रचनाओं की अंतिम तिथि घोषित नहीं कर सकते, जबकि अकादमिक या कार्यालयी कार्य टाइम-बाउंड होते हैं। आप मना भी नहीं कर सकते। इस बीच रचनाएं आती हैं और चली जाती हैं। कुछ ढीठ रचनाएं ही होती हैं, जो आपके भीतर के लेखक को जिलाए रखती हैं। लिखने का हाल यह है कि बैग में रखी कविताओं की नोट-बुक कभी-कभी निकल पाती है और कहानियों के प्लाट आधे-अधूरे न जाने कहां-कहां से झांकते रहते हैं। तब भी बीवी-बच्चों के स्कूल जाने और मेरे विश्वविद्यालय आने से पहले जो समय रहता है, मैं उसका भरपूर लाभ उठाता हूं।

इन दिनों क्या पढऩा अच्छा लगता है?

– मैं कहानी और कविता, दोनों पढ़ता हूं। इन दिनों कवि ज्ञानेंद्रपति और कहानीकार सुरेश कांटक को पढऩे में मजा आ रहा है।

क्या आपके हिसाब से इंटरनेट के इस जमाने में किताबों की बिक्री घटी है?

– बिलकुल। किताबें थोड़े से लोग खरीदते हैं। पुस्तकालयों में जाने वालों की संख्या निरंतर घटी है। किताब-प्रेमियों को छोड़कर सबका समय तो फेसबुक और व्हाट्सएप्प खा ही रहा है। ई-बुक और दूसरे माध्यमों ने भी किताबों की बिक्री को प्रभावित किया है।

प्रकाशित किताबें

कठिन समय में (कविता संग्रह)
दुख कोई चिडिय़ा तो नहीं (कविता संग्रह)
लोक साहित्यकार राजकिशन नैन : विवेचन और मूल्यांकन (आलोचना)
प्रेमचंद की किसानी कहानियां (संपादन)
कथा में किसान (भाग-एक, भाग-दो) (संपादन)
‘रेत पथ’ पत्रिका का संपादन व प्रकाशन
पुरस्कार
हरियाणा साहित्य अकादमी से कहानी के लिए दो बार पुरस्कृत
‘रेत पथ’ के लिए वर्ष 2013 का बाबू बालमुकुन्द पुरस्कार

अमित मनोज की रचनाएं

शर्म

इन फूलों को वहीं रहने देते
इनके हाथों में आ मुरझा गए हैं बेचारे
पौधों पर ये अधिक लुभाते थे
मैले हो गए रंग इनके फीके पड़ गए
रो रहे हैं अब सुनो तो जरा
देखो देखो कैसे खून इन नाजुक फूलों पर
उभर कर आ गया है और वे सब अपराध
जो सोते-जागते किए हैं इन्होंने
और जरा भी नहीं पसीजे
सोचा तो बिल्कुल ही नहीं
काम के अत्यधिक दबाव में
अपने आकाओं की खुशी के लिए
भूल गए खुद को ही
कि क्यों आए थे पृथ्वी पर वे
फूल अब क्या कहें
और सुने भी कौन इन तालियों की झूठी गडग़ड़ाहट में
किसके पास समय है इतना
कि गूंगों के बोलों को कोई कान दे
देखो-देखो मुरझा गए कितना ये फूल
जो खुश करने के लिए तोड़े गए थे किसी को
और वह जरा भी नहीं पसीजा
नजऱ ही नहीं आई उसे फूलों के टूटने की मजबूरी
हजारों हजार फूल ऐसे ही हो गए बर्बाद
डाल पर होते तो खिल जाते चेहरे जरूर
उन बच्चों के
फूल छू नहीं सकते जो पास आकर
बस देख सकते हैं दूर से
और सपनों में उगा सकते हैं ऐसे ही फूलों के पौधे
जिनसे न टूटे कभी कोई फूल
जब मुरझा जाए अपने आप ही तो
पृथ्वी ही कहे-शुक्रिया !
तुम खिले मेरे लिए इतना समय।

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