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OTT only means Porn Movies

ओटीटी का मतलब ही अश्लील सिनेमा

OTT only means Porn Movies : ओटीटी यानी ओवर द टॉप प्लेटफार्म बीते वर्ष कोरोना काल के दौरान लगे लॉकडाउन से पहले से है, लेकिन बीते एक वर्ष में यह जिस कदर लोकप्रिय हो गया है, उसी का परिणाम है कि इसके संचालकों ने इसे दर्शकों की भावनाओं को कैश करने का जरिया बना लिया है। हद दर्जे की अश्लीलता और हिंसा परोस रहे ओटीटी प्लेटफार्म के संबंध में अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह माना है कि इस प्लेटफार्म का दुरुपयोग हो रहा है और इसके नियमन की जरूरत है। कई ओटीटी प्लेटफार्म तो अश्लीलता के ऐसे वाहक बन गए हैं, जोकि रचनात्मकता के नाम पर यही धंधा कर रहे हैं। ऐसा इसलिए भी हो रहा है, क्योंकि अभी तक केंद्र सरकार की ओर से इसके लिए कोई नियमन नहीं था। हालांकि अब केंद्र सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। स्थिति यह है कि अब इसे रचनात्मकता पर हमला बताया जा रहा है। दरअसल, तांडव वेब सीरीज के आपत्तिजनक कंटेंट के मामले में सर्वोच्च न्यायालय सुनवाई कर रहा था। इस मामले में अमेजन प्राइम वीडियो की इंडिया हेड अपर्णा पुरोहित, वेब सीरीज के अभिनेता और निर्माता निर्देशक के खिलाफ उत्तर प्रदेश व कुछ अन्य राज्यों में एफआईआर दर्ज है। इलाहाबाद हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद कुछ आरोपी सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचे थे।

OTT only means Porn Movies : वास्तव में अभिव्यक्ति की आजादी का अभिप्राय यह तो नहीं हो सकता कि किसी मजहब, जाति, संप्रदाय और देश के कानून-संविधान का मखौल बनाया जाए। भारत में फिल्में इसी तरह तैयार होने लगी हैं, जैसे रोड साइड खोमचे वाले भेलपुरी बेचते हैं। बस चंद मिनटों का भरपूर एन्जॉयमेंट और फिर खाली कटोरी सडक़ किनारे फेंक कर पैसे देकर चलते बनो। कभी पर्दे पर बेशर्मी का जो विस्तार देखने को मिलता था, वह अब बेशक कम हो गया हो लेकिन ओटीटी जैसे प्लेटफार्म ऐसी जगह बन गई हैं, जहां जो मर्जी दिखाया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता। बीते वर्ष कोरोना की वजह से लॉकडाउन के बाद फिल्में बनना बंद हुई और फिर बड़े पर्दे पर किसी फिल्म का प्रदर्शन भी नहीं हुआ, हालांकि ओटीटी प्लेटफार्म जोकि मोबाइल फोन पर ही पर्दा बन जाता है, के द्वारा फिल्मों का चस्का रखने वालों को भरपूर आनंद मिल रहा है। ओटीटी पर आई वेब सीरीज तांडव को लेकर जो हंगामा देश में कायम है, वह इसी का उदाहरण है कि किस प्रकार निर्माता निर्देशक और लेखक अपनी मर्जी का कंटेंट पेश कर मोटी कमाई कर रहे हैं। इस वेब सीरीज में हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को जहां चोट पहुंचाई गई है, वहीं देश के कानून और संविधान से भी मखौल किया गया है। फिल्मों में राजनीतिकों की भूमिका संदिग्ध ही दिखाई जाती है, लेकिन इस वेबसीरीज में तो प्रधानमंत्री जैसे पद की गरिमा को ही लांछित कर दिया गया है। तांडव वेब सीरीज में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और कई अन्य अशोभनीय बातों को लेकर केस दर्ज हो चुके हैं। वहीं इस वेब सीरीज से जुड़े निर्माता-निर्देशक अब माफी मांगते फिर रहे हैं। इस विवाद के सामने आने के बाद निर्माता तथा कास्ट टीम ने लोगों की संतुष्टि के लिए उसमें बदलाव करने का ऐलान किया है। आखिर ऐसी नाटकीयता भारतीय फिल्मों के साथ ही क्यों है। प्रोफेशनलिज्म की कमी इसे कहा जाए या फिर सस्ता मनोरंजन लूटने की भारतीय दर्शकों की चाहत। देश में अब अश्लील वेबसाइटों के प्रदर्शन पर भी रोक है, लेकिन ओटीटी पर निर्माता निर्देशक अश्लीलता का प्रदर्शन कराते हुए जो उपहास नियम और कानून का उड़ा रहे हैं, वह बेहद दुखद है। सिनेमा संस्कृति और जीवन प्रणाली का आईना होता है, समाज में जो घटता है वह सिनेमा में दिखाया जाता है। हालांकि क्या यह हमेशा सही होता है। आजकल और बहुत पहले से सिनेमा का चेहरा ऐसा हो गया है, जिसमें हद दर्जे की काल्पनिकता और समाज की सोच को बिगाडऩे वाले कंटेंट की भरमार हो गई है। बौद्धिक समाज इसे अभिव्यक्ति की आजादी करार देता है, हालात ऐसे हैं कि उनके लिए हद दर्जे की बेशर्मी भी कला का रूप है।

OTT only means Porn Movies : पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सिनेमा ने सार्थक फिल्में भी दी हैं। इन फिल्मों की दुनियाभर में प्रशंसा हुई है। भारतीय दर्शकों ने भी उन्हें दिल से स्वीकार किया है, लेकिन बीते वर्ष अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद हालात बहुत कुछ बदले हैं। अब यह पूछा जा रहा है कि आखिर फिल्में किसका हित साधने के लिए बनाई जाती हैं। इन फिल्मों की स्टारकास्ट कौन तय करता है और इसके पीछे आधार क्या होता है। अभद्र और अश्लील कंटेंट के नाम पर एक ऐसा समुदाय बनाना जहां सदाचार और नैतिकता पानी भरते हैं, दर्शकों को क्षणिक मनोरंजन के नाम पर दिग्भ्रमित करना और अपने फायदे की सोचना, फिल्मकारी नहीं हो सकती। अब वह जमाना बेशक लद चुका है, जब फिल्में समाज की भलाई और उसे विचार प्रदान करने के लिए बनाई जाती थी। उन फिल्मों का आधार राष्ट्रहित और समाज हित होता था। हालांकि अब फिल्में मुनाफे के लिए बनाई जाती हैं। ओटीटी प्लेटफार्म पर आने वाली फिल्में ऐसी समझी जाती हैं, जिन्हें देखने वाले अपने तक सीमित रखेंगे। इन फिल्मों के निर्माता निर्देशक इसका फायदा लेते हैं कि इनकी कहीं समीक्षा नहीं होगी और अगर होगी भी तो उसका कोई औचित्य नहीं होगा, क्योंकि जो दिखाकर वे फायदा लेना चाहते हैं, वह उन्हें मिल ही जाएगा। गौरतलब है कि केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ओटीटी उद्योग के प्रतिनिधियों से मुलाकात की है। इस दौरान ओटीटी उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयासों का स्वागत किया है। अगर ऐसा है तो यह सार्थक राह पर चलने वाली बात है। वास्तव में ओटीटी प्लेटफार्म हो या फिर सामान्य फिल्में उन्हें रचनात्मक और सार्थक सोच को सामने लाना चाहिए, न कि बिकाऊ कंटेंट की आड़ में अश्लीलता और हिंसा को परोस कर भावनाओं को उद्वेलित कर अपनी जेबें भरनी चाहिए।

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