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महापुरुषों-संतों का मत अपनाने वाले ही सही इंसान : निरंकारी बाबा

‘मन नीवां मत मत ऊँची यह हम पढ़ते-सुनते आ रहे हैं। ऊँची मत तो सन्तों की ही हुआ करती है। ऊँची मत मिलेगी तो मन निमाणा बन जायेगा। विनम्रता वाले भाव से हम युक्त हो जायेंगे। अहम के भाव, अभिमान के भाव से छुटकारा मिल जाएगा। इसलिए बाकी सारे जितने विकार हैं वो भी दूर होते चले जायेंगे। तो इसलिए ऊँची मत धारण करने के लिए ही महापुरुषों ने कल्याणकारी माना है लेकिन इधर फिर प्रमाणित होता है कि हम ऊँची मत लेने के लिए तैयार नहीं हैं।

हमारे ऊपर जो मत प्रभाव डालती है वो साकत वाली, निंदको वाली और उस मत का अगर हम प्रभाव ग्रहण कर लेते हैं तो फिर कौन सी ऊँचाईयों को हम छुएंगे। फिर तो कहना ही पड़ेगा कि- करतूत पशु की मानस जात। मनुष्य जन्म में आया है लेकिन पशुओं से भी बद्तर इसकी करतूत है क्योंकि इसने मत ऊँची नहीं ली है। हां, जिन्होंने ऊँची मत दी उनकी जय-जयकार बुलाने में यह पीछे नहीं हैं। उसमें तो बहुत बढ़-चढ़कर हम हिस्सा लेते हैं। लेकिन जो मत दी उसको अपनाने को तैयार नहीं है। अगर अपनाया गया होता तो संसार की आज दुर्दशा नहीं होनी थी। जिस वातावरण की बात हो रही है शुद्ध वातावरण, सुखद वातावरण, चैन वाला वातावरण, सुकून वाला वातावरण यह स्थापित हो चुका होता। अगर नहीं हुआ तो इसका सीधा मतलब है कि ऊँची मत को अपनाया नहीं गया है।

महापुरुष समय समय पर इस संसार में आकर इन्सान को यह एहसास कराते आये हैं कि इन्सान वक्ती तौर पर उससे कुछ हासिल करने के लिए जिस रास्ते को तू उत्तम मानकर चल रहा है, उससे कुछ हासिल न होगा। जिस तरह पीछे भी दास ने कहा कि थोड़े वक्त की प्राप्तियां के लिए लंबे समय की हानि संसार में यही हो रहा है।

इन्सान सही मायनों में वही होते हैं जो महापुरुषों-सन्तों की मत अपना लेते हैं। फिर उनकी भावना, उनकी सोच नेकी वाली बन जाती है। उनका जीवन कल्याणकारी बन जाता है। अपने लिए भी और औरों के लिए भी। अपना भी उद्धार और दूसरों का भी उद्धार। इस मत को धारण करने के लिए महापुरुष जोर लगा रहे हैं क्योंकि इस संसार का स्वर्ग बनने का इससे हट कर कोई साधन नहीं है।

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