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प्याज ने फिर रुलाया

देश में प्याज सरकार बना भी देता है और गिरा भी देता है। प्याज खाने में बेशक कसैला लगे लेकिन इसकी कीमत जब बढऩे लगती हैं तो यह सरकारों के माथे पर पसीना ला देता है। आम आदमी की जरूरत से जुड़ी यह सब्जी अगर महंगी होने लगे तो घर का बजट बिगड़ जाता है। इस बार फिर यही हो रहा है। प्याज की कीमतें कई शहरों में 80 रुपये किलो तक पहुंच चुकी हैं, ऐसे में प्याज की कालाबाजारी होने लगी है, वहीं आम ग्राहक को यह उपलब्ध नहीं हो पा रहा। अब सरकार ने इसके निर्यात पर रोक लगा कर स्थिति नियंत्रित करने की कोशिश की है। इसके अलावा सरकार ने घरेलू कारोबारियों की ओर से प्याज जमा रखने की सीमा भी तय की है। अब थोक व्यापारी 500 क्विंटल और खुदरा व्यापारी 100 क्विंटल से ज्यादा प्याज स्टॉक में नहीं रख सकेंगे। इस पूरी कवायद के अलावा जमाखोरों के खिलाफ भी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

बेशक आजकल नवरात्र चल रहे हैं, इन दिनों में घरों में प्याज का सेवन नहीं किया जाता। बावजूद इसके इसकी कीमतों में इजाफा होना चिंता की बात है। प्याज की कीमतें बढऩे की वजह कर्नाटक और महाराष्ट्र समेत कई इलाकों में बाढ़ आना है। बाढ़ की वजह से जहां फसलें बर्बाद हुई हैं, वहीं पहले से स्टॉक में रखा प्याज भी पूरे देश में नहीं पहुंच पा रहा। अब जैसे-जैसे आपूर्ति घटती गई, वैसे-वैसे इसके दाम भी बढ़ते गए। अब हालात यह हैं कि सेब जहां 100 रुपये किलो मिल रहा है, वहीं प्याज 80 रुपये में एक किलो हासिल हो रहा है। दरअसल, बाजार में मुनाफा कमाने की चाहत में बैठे कारोबारी ऐसे समय का ही भरपूर फायदा उठाते हैं। सरकार इस बात को अच्छी तरह समझती है कि एक बार किसी जरूरी वस्तु की किल्लत अगर हो जाती है तो फिर उसकी कालाबाजारी को रोक पाना मुश्किल हो जाता है। वहीं यह भी समझने की बात है कि हर वर्ष बारिश और बाढ़ की वजह से प्याज की आपूर्ति प्रभावित होती ही है। यह चिंताजनक है कि सरकार की जिम्मेदार एजेंसियां इसका अंदाजा नहीं लगा सकी कि पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष भी प्याज को उगाने वाले राज्यों में बारिश की वजह से इसकी सप्लाई पर असर पड़ सकता है।

यह बात हैरत में डालने वाली है कि केंद्र सरकार के पास प्याज का पर्याप्त भंडार होने के बावजूद इसके दाम बेलगाम हो गए। मांग और आपूर्ति का यह बीजगणित हमारे निति निर्धारक क्यों नहीं लगा पाते। अगस्त से खुदरा बाजार में प्याज के भाव बढऩा शुरू हो गए थे, बावजूद इसके इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया। क्या ऐसा तो नहीं है कि लाभ कमाने की यह जुगत सामूहिक है और सरकार की एजेंसियां जानते-समझते हुए भी इस तरफ ध्यान नहीं देती। हालांकि तब तक मामला हाथ से निकल चुका होता है, प्याज जब आम आदमी को रुलाने लगता है तो सरकार को उसकी फ्रिक होती है। दो राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए तैयार हो रही भाजपा के लिए यह चुनौतीपूर्ण हो सकता था, लेकिन उसने प्याज का निर्यात रोक कर सही ही कदम उठाया है। अब इस कदम से कितना फायदा होगा, यह देखा जाएगा लेकिन इतना तय है कि बाजार में अब आपूर्ति बढऩे की पूरी संभावना है। अब दाम नीचे आने चाहिएं, लेकिन देशभर के विभिन्न बाजारों तक आपूर्ति बढ़ाने में परिवहन की चुनौतियों से पार नहीं पाया गया तो हो सकता है, दाम में कमी का फायदा सभी को नहीं मिल पाएगा।

प्याज ऐसी सब्जी है, जिसका प्रयोग हर घर की जरूरत है। देश में प्याज का उत्पादन पश्चिम और दक्षिण के राज्यों में ही होता है। इस दौरान इन राज्यों में किसी संकट की स्थिति में प्याज की सप्लाई प्रभावित होती है और फिर पूरे देश में कीमतें आसमान छूने लगती हैं। क्या समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता। इतिहास गवाह है कि जब-जब प्याज की कीमतें सिर चढ़ाने लगी हैं, राजनीतिक पारा भी चढऩे लगा है। अतीत से सबक लेते रहना जरूरी है, प्याज और अन्य सब्जियों की बढ़ती कीमतों की रोकथाम के लिए कदम न उठाए जाएं तो जनता में हाहाकार होना लाजिमी है। अगर सरकार ने समय रहते इस पर ध्यान दिया होता तो आज प्याज के निर्यात पर रोक लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

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