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गठबंधन राजनीति का नया दौर

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को परास्त कर देश की बागडोर संभालने वाली भाजपा ने जब कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखना शुरू किया तो यह अजीब लगा था। भाजपा नेताओं का उत्साह आसमान छू रहा था और वे अपने इस नारे को सफल बनाने के लिए दिन-रात लगे हुए थे। इस बीच 2019 का लोकसभा चुनाव आया और कड़ी चुनौतियों के बीच भाजपा कांग्रेस को सत्ता से बहुत दूर रखने में कामयाब हो गई। तब लगने लगा था कि कांग्रेस मुक्त देश का सपना पूरा हो ही जाएगा, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस को संजीवनी प्रदान कर दी। हरियाणा में बेशक कांग्रेस सत्ता का गुलगुला खाने से चूक गई लेकिन महाराष्ट्र में आखिर उसकी मनोकामना पूरी हो गई। दरअसल, महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की तिकड़ी ने सरकार बनाकर कामयाबी हासिल नहीं की है, अपितु भाजपा के उस दावे को मात दी है, जिसके तहत वह कांग्रेस के वर्चस्व को ही खत्म करने की योजना रखती है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि देवेंद्र फडणवीस को राज्यपाल ने अगर चुपके-चुपके मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई तो इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का हाथ रहा, तो यह ऐसा तीखा राजनीतिक हमला है, जिसकी तलाश कांग्रेस को लगातार रही है। लोकसभा चुनाव में हार, रफाल युद्धक विमानों की खरीद में सुप्रीम कोर्ट की सरकार को क्लीन चिट, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खात्मा, अयोध्या विवाद का शांतिपूर्ण तरीके से निपटारा आदि ऐसे मसले हैं, जिनके जरिए भाजपा ने विरोधियों से बहुत माइलेज हासिल कर ली है। कर्नाटक और गोवा की घटनाओं को लोग भूल गए थे, लेकिन महाराष्ट्र में रातों-रात जो हुआ, उसने भाजपा की अपरिपक्व रणनीति की पोल खोल दी। अब भाजपा अध्यक्ष पार्टी के बचाव में कुछ भी बयान दें लेकिन पार्टी की गलती ने शिवसेना, एनसीपी समेत कांग्रेस के लिए जहां भविष्य की राह खोल दी है, वहीं भाजपा को आड़े हाथ लेने का मौका भी उसे हासिल हो गया है।

ऐसे में राज्य के अंदर भाजपा की रणनीति यही हो सकती है कि वह तीनों दलों की खिचड़ी सरकार की खामियों को सामने लाकर इस महायुति को सफल होने से रोके। अगर पांच साल तक यह सरकार पूरे कर गई तो यह साबित हो जाएगा कि भाजपा के बगैर देश के अंदर विरोधी दलों के अंदर एक सकारात्मक सोच कायम हो रही है और वे उस महागठबंधन को बनाने के लिए फिर एकजुट हो सकते हैं, जिसे 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन यह सफल नहीं हुआ। संभव है, इसका अहसास तीनों दलों के नेताओं को है, और इसके लिए काम भी शुरू कर चुके हैं। एनसीपी प्रमुख शरद पवार के संबंध में भाजपा के प्रति नरम रवैया रखने की बात सामने आई थी, लेकिन वह निराधार निकली। अब तय है कि एनसीपी और शिवसेना भाजपा के साथ चलना नहीं चाहेंगे। तीनों दलों की रणनीति भी यही है कि उन्होंने गठबंधन में लचीलापन रखा है। तीनों ने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाया है, जिसमें कहा गया है कि गठबंधन संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध है। वहीं किसानों, बेरोजगारों और महिलाओं के लिए कई तरह के ऐलान किए गए हैं।

एक और बड़ी बात यह घटी है कि शरद पवार जोकि केंद्र की राजनीति से लगभग बाहर हो चुके थे, अब फिर से मध्य में आ चुके हैं, उन्होंने अपने अनुभव और रणनीतिक कौशल से जहां भाजपा को मात दी है, वहीं कांग्रेस को भी साथ लाने में कामयाब रहे हैं। वे एक बड़े समन्वयक के रूप में सामने आए हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब संपूर्ण विपक्ष को एकता के सूत्र में बांधने में राहुल गांधी कामयाब नहीं हो पाए थे, तो अब संभव है शरद पवार पूरे विपक्ष के बीच एकता का सूत्र बांधने में अहम भूमिका निभाएं। तीनों दलों ने महाराष्ट्र में संपूर्ण विकास का दावा किया है, अगर गठबंधन की सरकार अपने दावे पर खरी उतरती है तो यह भविष्य के गठबंधनों की नींव तैयार करेगी। राजनीतिक रूप से एक जगह आना संभव है, लेकिन सरकार में एकसाथ रहते हुए जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरना बिलकुल अलग बात है। सरकार सफल हुई तो यह गठबंधन भी सफलता पाएगा।

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