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नई शिक्षा नीति से बदलेगा देश, जो आज की जरूरत

बदलते दौर में शिक्षा में बड़ा बदलाव अब वक्त की मांग है। केंद्र सरकार ने देश की नई शिक्षा नीति-2020 तैयार की है, कैबिनेट इसे मंजूरी दे चुकी है। इससे पहले वर्ष 1986 में शिक्षा नीति लागू की गई थी, इसके बाद 1992 में इस नीति में कुछ संशोधन किए गए थे। अब 34 वर्षों के बाद देश में नई शिक्षा नीति का उजाला फैलेगा। नई शिक्षा नीति का आधार विकासपरक और लचीला है, वहीं देश के प्रख्यात शिक्षा शास्त्रियों और प्रबुद्ध लोगों की टीम ने इसे तैयार किया है। नई शिक्षा नीति को एक लाइन में समझें तो यह देश के भविष्य यानी बच्चों और युवाओं को नए दौर में लेकर जाएगी। सुधारों की गुंजाइश में हमेशा रहती है, नई नीति में भी रहेंगे, हालांकि शिक्षा को ज्ञान आधारित बनाकर सरकार ने अहम पहल की है। प्रत्येक वर्ष 10वीं और 12वीं के परीक्षा परिणामों के समय नंबर गेम का जो जलवा दिखता है, वह सभी विद्यार्थियों की मानसिक योग्यता का सही मापदंड हो, इसमें संशय नजर आता है। बेशक, प्रतिभा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन जरूरत ऐसे समाज की है, जिसमें सभी को आगे बढऩे का अवसर मिले और प्रत्येक बच्चे की मौलिक प्रतिभा निखर कर सामने आए।

नई शिक्षा नीति की मुख्य बातों को इस प्रकार समझा जा सकता है कि अब स्कूली शिक्षा 12 नहीं अपितु 15 वर्षों की होगी। इनमें शुरुआत के तीन वर्ष फाउंडेशन स्टेज के होंगे, इस दौरान तीन से आठ साल की उम्र के बच्चों की पढ़ाई होगी। जाहिर है, यही वह वक्त होता है जिसमें एक प्रखर और सक्षम व्यक्तित्व की स्थापना होती है। बताया गया है कि शुरुआत से लेकर उच्च अध्ययन तक शिक्षा का स्वरूप ज्यादा से ज्यादा ज्ञान और तर्क अर्जित कराने का होगा। बच्चों को गणित के साथ कोडिंग जैसी शिक्षा दी जाएगी, ताकि उनका आधार मौलिक बने और वे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हों। नई नीति में बोर्ड परीक्षाओं को लेकर भी सोचा गया है। योजना यह है कि छात्रों को पर्ष में दो बार परीक्षा के मौके दिए जाएं। अभी तक की शिक्षा का प्रारूप यही है कि ज्यादा से ज्यादा उत्तर रटे जाएं और फिर उन्हें परीक्षा में जस का तस लिखकर अंकों का पहाड़ तैयार कर लिया जाए। नई शिक्षा नीति में अगर परीक्षा को ज्ञान आधारित बनाए जाने का प्रस्ताव है तो यह उचित ही है। बताया यह गया है कि बच्चों को अब कोचिंग की जरूरत नहीं रहेगी। गौरतलब है कि साइंस, मेडिकल, नॉन मेडिकल में कोचिंग के लिए कोचिंग संस्थानों के बाहर भारी भीड़ लगी होती है। आखिर बगैर अभिरुचि के माता-पिता जहां अपने बच्चों पर स्ट्रीम लेने का दबाव बनाते हैं, वहीं बच्चे भी किसी न खत्म होने वाली दौड़ की भांति बेहतर भविष्य के लिए विषम परिस्थितियों से जूझते हैं।

नई नीति में इसका भी प्रावधान है कि स्कूल स्टैैंडर्ड अथॉरिटी का गठन हो, जोकि स्कूलों की गुणवत्ता और उनकी विश्वसनीयता पर नजर रखेगी। आजकल निजी स्कूल बिजनेस की भांति हो गए हैं। लॉकडाउन के दौरान शिक्षण कार्य न होने के बावजूद निजी स्कूल संचालकों की अभिभावकों से पूरी फीस एवं अन्य शुल्कों की मांग यही प्रदर्शित करती है। अंग्रेजी माध्यम के नाम पर कुकुरमुत्तों की भांति उग आए स्कूल बेशक अभिभावकों और बच्चों को विकल्प प्रदान करते हैं, लेकिन यह भारी भरकम फीस की एवज में होता है। हालांकि नई नीति में अधिकतम फीस भी तय की जाएगी। इसके जरिए यह तय होगा कि कौन शिक्षण संस्थान कितनी फीस ले सकता है। अब अध्यापन के भी नए मानक तय किए गए हैं। अब चार वर्ष की न्यूनतम इंटीग्रेटेड बीएड की डिग्री जरूरी होगी। इसके अलावा सेवानिवृत शिक्षकों की क्षमताओं का लाभ लेने के लिए पूल तैयार किया जाएगा। नई नीति यह भी विचार रखती है कि माध्यमिक स्तर तक एजुकेशन फॉर ऑल हो, वहीं अभी स्कूलों से दूर रह रहे दो करोड़ बच्चों को स्कूलों में लाया जाएगा। सामाजिक और आर्थिक तौर से वंचित समूहों की शिक्षा पर विशेष जोर होगा।

नई नीति में छठी क्लास से वोकेशनल कोर्स शुरू करने की तैयारी है। आत्मनिर्भर भारत की दृष्टि से यह जरूरी है। वहीं अनुसंधान संस्कृति तथा अनुसंधान क्षमता को बढ़ावा देने के लिए नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना का प्रस्ताव है। वास्तव में नई शिक्षा नीति उत्साहवर्धक एवं भविष्यों के तौर-तरीकों को ध्यान में रखकर है, हालांकि यह भी जरूरी है कि इसे लागू करने में पूरी ईमानदारी बरती जाए। अगर हमारी प्राथमिकता शिक्षा होगी तो हम मौजूदा और भावी पीढ़ी के संस्कार और उसका चरित्र निर्माण कर पाएंगे जोकि एक सर्वश्रेष्ठ भारत के लिए जरूरी है।

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