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गलतफहमी को कभी लाईफ में घुसने का मौका न दे : मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक

गलतफहमी एक ऐसा शब्द है जो जहां भी जायेगा सिर्फ बरबादी के निशान ही छोड़कर जायेगा। गलतफहमी शब्द घर, ऑफिस, परिवार, रिश्तो हर किसी को खाक मे बदलने का मद्दा रखता है। इसीलिए कोशिश यही होनी चाहिए गलतफहमी जैसे शब्द को कभी भी जिंदगी मे घुसने ना दिया जाए और अगर घुस गया हो तो जितनी जल्दी हो सके उसे निकाल फेंकने का प्रयत्न करना चाहिए। गलतफहमी किसी कांटे की तरह होती है चाहे वह चरित्र पर शक करना और जब वह आपके रिश्ते में चुभन पैदा करने लगती है, ये सब चरित्रहीनता के लक्षण होते है। चरित्रहीन कभी भी अपना विकराल रूप धारण कर सकती है ओर इसकी निशानियां रिश्तो मे भी छलकनी लगती है। यही कारण है कभी फूल लगनेवाला रिश्ता आपको खरोंचे देने लगता है।

जो जोड़ा कभी एक-दूसरे पर जान छिडक़ता था, एक-दूसरे की बांहों में जिसे सुकून मिलता था और जो साथी की ख़ुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था, वो जब गलतफहमी का शिकार होने लगता है, तो रिश्ते की मधुरता व प्यार को नफऱत में बदलते देर नहीं लगती। ऐसे में अपने रिश्तें को टूटने से बचाने के लिए कुछ ऐसा करे। यह बात सही है कि बात करने के दौरान आपको कुछ ऐसा सुनने के लिए भी मिल सकता है जो आपको अच्छा ना लगे, पर आपको समस्या का समाधान करना है और इससे अच्छा तरीका कुछ भी नहीं है। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 24सी अणुव्रत भवन तुलसीसभागार मे सभा को संबोधित करते हुए कहे।

मनीषीसंत ने आगे कहा श्रेष्ठ में भी श्रेष्ठ वह है, जिसने अपना चरित्र हमेशा मजबूत रखा। जो बुराई से विचलित होकर डिगा नहीं। इसलिए कहा जाता है कि सदैव अपने चरित्र पर डटे रहो। एक दिन तुम्हारा चरित्र अवगुणों को भी बदल देगा। यह प्रक्रिया धीमी है, मगर पहले ही दिन से शुरू हो जाती है। उत्तम चरित्र यदि अडिग है, तो उसने बदलाव किए हैं। जिस बुराई से भागते हो, जिसे पसंद नही करते, जो तुम्हारे चरित्र का हिस्सा नहीं है, उसे अपने में कभी मत उतारो। हर बुराई, हर विपरीत से अपने ही चरित्र से लड़ो।

मनीषीसंत ने अंत मे फरमाया एक विषय पर दृढ़ निश्चय कर लेने का अर्थ है- कल्पना को संकल्प में बदल देना। यह संकल्प का प्रयोग करें तो वह बहुत सफल होगा। संकल्प एक आध्यात्मिक ताकत है। संकल्पवान व्यक्ति अंधकार को चीरता हुआ स्वयं प्रकाश बन जाता है। चंचलता की अवस्था में संकल्प का प्रयोग उतना सफल नहीं होता जितना वह एकाग्रता की अवस्था में होता है।

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