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मन बुराई की तरफ बढ़ता है : निरंकारी बाबा

मन की लगन ऐसी बनी रहे जो भक्ति वाली है, जो परमार्थ वाली है। मन के सिलसिले ऐसे हैं कि-
मन लोचे बुराईयाँ।
मन की चंचलता, मन का ऐसा सिलसिला है कि ये बुराई की तरफ बढ़ता है, ये संसार की तरफ बढ़ता है। जब संसार की तरफ बढ़ता है तो इसके मायने कि सांसारिक भाव बनते चले जातेहैं, सांसारिक प्रवृत्ति बनती चली जाती हैं, सांसारिक फितरत बनती चली जाती हैं। इसलिये महापुरुषों के अमोलक वचन इस मन को समझते हैं, कि-

बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ।
नाम की बेला पै पै सोईआ।।
कि एक बुराई की तरफ इन्सान किस कद्र सहजता के साथ बढ़ता जाता है और नाम के बेला पै पै सोया। जब परमार्थ और भक्ति का सवाल आता है, इस प्रभु-परमात्मा की बदगी का सवाल आता है तो उस वक्त ये आंखें मूंदे रखता है, उस तरफ उत्साहित नहीं होता, तो ये संसार की चाल है। ससार का यह जो रुप हमें नजऱ आता है ये संसार की बनावअ आज की नहीं है। ये कथन सदियों पहले कहे गए, ये कथन युगों पहले कहे गए। युगों पहले से दोनों ही पहलू साथ साथ चलते आ रहे थे। सत्य से मुख मोडऩे वाले और सत्य की तरफ मुख करने वाले। आठों पहन इसका दीदार करने वाले और

आठों पहर संसार में गलतान रहने वाले। हमेशा ही ये भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियां रही हैं, हमेशा ही ये भिन्न-भिन्न फितरतें रही हैं।
एक सांसारिक रुचियां हैं कि अक्सर इन्सान सुबह से रात तक जो सांसारिक सोच रखता है उसकी रुचि उस तरफ होती है। अक्सर हम बच्चों के बारे में कहते हैं कि बच्चे की रुचि खेलने की तरफ है, इस बच्चे की रुचि यपढ़ाई की तरफ है, ये बच्चा जब भी समय मिलता है किताब उठा लेता है, पढ़ाई करने लग पड़ता है और ये जो बच्चा है हर वक्त खेल में ही इसका ध्यान रहता है।

इसीलिये ये पढ़ाई में कमजोर पड़ जाता है। यानि कि किसी को कड़वा खाने की रुचि है, किसी को मीठा खाने की रुचि है, कोई संसार के स्वाद को ही सब कुछ मानता है और कोई इस प्रभु की बंदगी का लुत्फ लेता है। दानों में भिन्नताएं हैं, इसलिये इनका माग्र और है और उनका मार्ग और। दोनों की सोच भिन्न है। जो प्रभु की लगन में रहता है, इस सत्य की बंदगी के लिये, इसकी भक्ति के लिये, इस परमार्थ को निभाने के लिये जो हमेशा उत्साहित रहता है, उसकी दिलचस्पी, उसकी रुचि, उसकी चाहत इसी तरफ ही लगी रहती है कि मैं जीवन का एक-एक पल समर्पित कर दूं इस परमार्थ को, इस सत्य को, इंस बंदगी को, इस भक्ति को। कोई भी पल ऐसा न आये जो कि इस भक्ति से हटकर हो। वो स्वांस, वो पल बीते निरोल मच्छली की भांति कि जैसे अभी भी मिसाल दी गइ्र कि मछली जल में ही रहे तोउसका जीवन है।

भक्त भी यह चाहना रखता है कि मैं भी भक्ति के इसी सरोवर में हमेशा डूबा रहूँ। इस सागर में हमेशा डूबा रहूँ, कभी भी एक पल को इससे बाहर न निकलूं। महापुरुषों के कथन हम पढ़ते आ रहे हैं कि एक घड़ी न मिलती तो कलयुग होता। यानि कि एक घड़ी का वो जो एक वक्फा है, एक घड़ी की ही दूरी है।

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