Saturday, September 21, 2019
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कलंक का टीका स्वीकार कर श्री राम के काज में सहयोगी बनी माता कैकेयी

महाराज दशरथ ने कैकेय नरेश की राजकुमारी कैकेयी से विवाह किया। यह महाराज का अंतिम विवाह था। महारानी कैकेयी अत्यंत पतिपरायणा थीं और महाराज दशरथ उनसे सर्वाधिक प्रेम करते थे। देवताओं और असुरों में संग्राम होने लगा। महाराजा दशरथ को देवराज इंद्र ने अपनी सहायता के लिए आमंत्रित किया। महारानी कैकेयी भी युद्ध में उनके साथ गई। घोर युद्ध करते हुए महाराज दशरथ थक गए। अवसर पाकर असुरों ने उनके सारथी को मार डाला। कैकेयी जी ने आगे बढ़कर रथ की लगाम को अपने मुख में ले लिया और वह धनुष चढ़ाकर बाणों की वृष्टि करते हुए अपने पति की रक्षा करने लगीं। महाराज सावधान हुए और दूसरा सारथी आया, तब महारानी अपने स्थान से हटी।

सहसा कैकेयी जी ने देखा कि शत्रु के बाण से रथ का धुरा कट गया है। यह देखते ही वह रथ से कूद पड़ीं और धुरे के स्थान पर अपनी पूरी भुजा ही लगा दी। दैत्य पराजित होकर भाग गए, तब महाराज को उनके अद्भुत धैर्य और साहस का पता लगा। देव वैद्यों ने महारानी की घायल भुजा को शीघ्र ठीक कर दिया। महाराज दशरथ ने प्रसन्न होकर दो बार अपनी प्राणरक्षा करने के लिए महारानी को दो वर देने का वचन दिया। महाराज के आग्रह करने पर यह कह कर उन्होंने बात टाल दी कि, ”मुझे जब आवश्यकता होगी, तब मांग लूंगी। एक दिन महारानी कैकेयी की दासी मंथरा दौड़ती हुई आई। उसने महारानी से कहा, ”रानी! कल प्रात: महाराज दशरथ ने श्री राम को युवराज बनाने की घोषणा की है। आप बड़ी भोली हैं। आप समझती हैं कि आपको महाराज सबसे अधिक चाहते हैं। यहां चुपचाप सब हो गया और आपको पता तक नहीं।

”तेरे मुख में घी-शक्कर! अहा, मेरा राम कल युवराज होगा। यह मंगल समाचार सुनाने के लिए मैं तुम्हें यह हार पुरस्कार में प्रदान करती हूं। कैकेयी जी ने प्रसन्नता से कहा।

मंथरा ने कुटिलता से कहा, ”अपना हार रहने दीजिए। कौन भरत युवराज हो गए, जो आप उपहार देने चली हैं। राजा आपसे अधिक प्रेम करते हैं। इसलिए कौशल्या जी आपसे ईष्र्या करती हैं। अवसर पाकर उन्होंने अपने पुत्र को युवराज बनाने के लिए महाराज को तैयार कर लिया। श्री राम राजा होंगे और आपको कौशल्या जी की दासी बनना पड़ेगा। मेरा क्या। मैं तो दासी हूं और दासी ही रहूंगी।

कैकेयी उत्साह से श्री भरत के आगमन की कर रही थी प्रतीक्षा
भावीवश कैकेयी ने मंथरा की बातों का विश्वास कर लिया और कोपभवन के एकांत में महाराज दशरथ से श्री राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास और भरत के लिए राज्य का वरदान मांग लिया। श्री राम के वियोग में महाराज दशरथ ने शरीर छोड़ दिया। कैकेयी जी बड़े ही उत्साह से श्री भरत के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थी। भरत को आया जानकर वे बड़े ही उत्साह से आरती सजाकर स्वागत के लिए बढ़ीं। किन्तु जिस भरत पर उनकी सम्पूर्ण आशाएं केंद्रित थीं, उन्हीं ने उनको मां कहना भी छोड़ दिया। जिन कौशल्या से वह प्रतिशोध लेना चाहती थीं, भरत की दृष्टि में उन्हीं कौशल्या का स्थान मां से भी ऊंचा हो गया।

जब श्री भरत जी श्री राम की चरण पादुका लेकर अयोध्या के लिए विदा होने लगे तो एकांत में कैकेयी ने श्री राम से कहा, ”आप क्षमाशील हैं। करूणासागर हैं। मेरे अपराधों को क्षमा कर दें। मेरा हृदय अपने पाप से दग्ध हो रहा है।”आपने कोई अपराध नहीं किया है। सम्पूर्ण संसार की निंदा और अपयश लेकर भी आपने मेरे और देवताओं के कार्य को पूर्ण किया है। मैं आपसे अत्यंत प्रसन्न हूं। श्री राम ने कैकेयी को समझाया। वनवास से लौटने पर श्री राम सबसे पहले कैकेयी के भवन में गए। पहले उन्हीं का आदर किया। कैकेयी जी का प्रेम धन्य है, उन्होंने सदा के लिए कलंक का टीका स्वीकार कर श्री राम के काज में सहयोग दिया।

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