एम करूणानिधि : इतिहास हो गया तमिल राजनीति का एक और योद्धा
Wednesday, December 19, 2018
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एम करूणानिधि : इतिहास हो गया तमिल राजनीति का एक और योद्धा

एम करूणानिधि : इतिहास हो गया तमिल राजनीति का एक और योद्धा

आखिरकार भारतीय राजनीति का एक और जननेता चला गया। तमिलनाडु की राजनीति का एक बड़ा स्तंभ रहे पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि का जाना ऐसा खाली स्थान है जोकि कभी नहीं भर सकेगा। वे अपने पीछे ऐसा इतिहास छोड़ गए हैं, जिसे राज्य कभी भुला नहीं पाएगा। जब उन्होंने साल 2006 में राज्य के सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री के तौर पर पदभार संभाला था तब यह बात सभी को पता चल गई थी कि श्कलाईनारश् को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकताए भले ही उम्र कम पड़ जाए। करुणानिधि ने 27 जुलाई 1969 को पार्टी की कमान संभाली थी और 2016 में बीमार हो जाने तक उन्होंने खुद को पार्टी के लिए समर्पित किया। बीमारी की वजह से उन्होंने अपने बेटे एमके स्टालिन को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर अपने कंधों से बोझ तो कम किया लेकिन पार्टी से खुद को अलग करना उनके लिए नामुमकिन रहा।

5 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहने के दौरान करुणानिधि परिवारवाद के आरोपों के चलते सवालों के घेरे में जरूर रहे लेकिन 14 साल की उम्र से आंदोलनों और संगठनों को मजबूती देने वाले ‘दक्षिणमूर्ति’ ने राज्य के साथ ही देश की राजनीति में पार्टी का महत्व स्थापित किया। कविताओं, नाटकों और साहित्य में रुचि ही थी जिसने उन्हें द्रविडिय़न आंदोलन के दौरान मुखर होकर बोलने का आत्मविश्वास दिया। इस आंदोलन के चलते साल 1953 में वे गिरफ्तार भी हुए। इस आंदोलन की प्रेरणा से उन्होंने तमिल फिल्म ‘परासक्तिÓ भी बनाई जो तमिल सिनेमा में एक बड़ा मोड़ साबित हुई।

करुणानिधि ने जस्टिस पार्टी के अलागिरी स्वामी के भाषण से प्रेरित होकर 14 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखा। स्थानीय युवाओं को आंदोलन से जोड़ते हुए उन्होंने तमिल मनवर मंद्रम नाम का छात्र संगठन शुरू किया जो द्रविडिय़न आंदोलन की पहली छात्र इकाई था। यहां शुरू किए गए अखबार मुरसोली ने बाद में डीएमके के आधिकारिक अखबार की शक्ल ली। करुणानिधि के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने का मौका तब आया जब औद्योगिक शहर कल्लुकुड़ी का नाम सीमेंट व्यापारी के नाम पर डालमियापुरम किया जा रहा था। डीएमके ने इस बदलाव के खिलाफ आंदोलन किया और करुणानिधि ने स्टेशन से डालमियापुरम नाम हटाकर ट्रैक पर पत्थर लगा दिए और ट्रेनें रोक दीं। इन प्रदर्शनों में दो लोगों की जान चली गई और करुणानिधि को गिरफ्तार कर लिया गया।

उनके राजनीतिक करियर का जिक्र करें तो महज 33 साल की उम्र में साल 1957 में उन्होंने पहली बार कुलीथलाई सीट से जीत हासिल कर तमिलनाडु विधानसभा में कदम रखा था, साल 1969 में अन्नादुराई के निधन के बाद वे पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उसके बाद तमाम उतार.चढ़ावों के बीच 1971.76, 1989.91, 1996.2001 और 2006.11 के दौरान पांच बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। साल 2016 में अपने बेटे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर उन्होंने सक्रिय राजनीति से किनारा तो किया लेकिन अलविदा नहीं कहा। साल 2011 में जब विधानसभा चुनाव में डीएमके को एआईडीएमके के हाथ करारी शिकस्त देखने को मिली तब करुणानिधि ने कहा था. जनता ने मुझे आराम करने का मौका दिया है। इसे करुणानिधि का खुद पर तंज मानें या शायद वह आगे की राजनीति को भांप चुके थे। चुनाव फिर से हुआ इस बार भी जनता ने उन्हें सत्ता से दूर रखा। आखिरकार द्रविडिय़न आंदोलन के नायक के युग का अंत हो गया।

जे जयललिता के देहांत के बाद तमिलनाडु के लोगों के लिए यह दूसरी क्षति है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं करूणानिधि से मिलने गए थे। जाहिर है, समय की तेज बहती धारा में प्रत्येक व्यक्ति को बह जाना है, राज्य और देश की कार्यप्रणाली को प्रभावित करने वाले ऐसे लोगों की मौजूदगी इसका परिचायक थी कि आम आदमी तकलीफ समझने के लिए कोई है, हालांकि पुराना जाता है तो नया आता है। श्रद्धांजलि!

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