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कांग्रेस को अलविदा कहते नेता

Leaders saying goodbye to Congress: कांग्रेस को यह मान ही लेना चाहिए कि वह बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। एक राजनीतिक दल के रूप में वह ऐसे ठहराव की तरफ अग्रसर है, जहां उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को नया ठौर तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिन्हें घुटन हो रही है। यह घुटन संवादहीनता की और दिशाहीनता की है। यह भी संभव है कि नेतृत्व की अक्षमता उन्हें परेशान कर रही हो। पार्टी के अंदर असंतुष्टों का समूह आजकल बेशक कुछ शांत है, लेकिन उसकी गतिविधियां शांत नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता रहे जितिन प्रसाद ने ऐसे समय में पार्टी को अलविदा कहा है, जब प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी में लग चुका है। बेशक, उनकी घर बदली की वजह यही न हो लेकिन यह साबित हो गया है कि कांग्रेस में उकताहट बढ़ रही है। बीते वर्ष मध्यप्रदेश के महाराज और कांग्रेस में अपने पिता की विरासत को संभालने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अलविदा कहकर भाजपा का हाथ पकड़ लिया था। उन्हें मनाने के लिए कांग्रेस ने पूरा दम लगाया लेकिन आखिरकार उनका सब्र शेष हो गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी के उन युवा नेताओं में शुमार थे, जिन्हें भविष्य का कर्णधार समझा जा रहा था, लेकिन परिवार के प्रति समर्पित पार्टी को इन युवा कर्णधारों की परवाह कहां है, कि उन्हें संभाल कर रखे। राजस्थान में सचिन पायलट ने जिस प्रकार कांग्रेस को उसके घुटनों पर ला दिया था, उसके बाद हाईकमान को मजबूरी में उनके लिए अपने दरवाजे खोलने पड़े। अब वही पायलट फिर से अगर यह आरोप लगा रहे हैं कि उनके समर्थकों की पार्टी में सुनवाई नहीं हो रही है तो यह पायलट की छटपटाहट नहीं है, अपितु कांग्रेस में अनुशासहीनता और युवाओं को आगे बढऩे से रोकने की कोशिशों का विरोध है।

क्या यह माना जा सकता है कि जितिन प्रसाद ने एकाएक यह निर्णय ले लिया हो। प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद भी कांग्रेस के उन विद्रोही नेताओं में शुमार रहे, जोकि अपने हक और अपने सम्मान की मांग उठाते थे। लेकिन उन्हें इसकी सजा मिली और उन्हें पार्टी में दरकिनार कर दिया गया। जाहिर है, गांधी परिवार के होते उनकी ऐसी चाह अपराध ही मानी जाएगी। अब कांग्रेस के ग्रुप 23 के असंतुष्ट नेताओं में शामिल रहे जितिन प्रसाद भी अगर पार्टी में बदलाव की चाह पाल रहे थे तो यह अनुचित कैसे हो गया। हालांकि उन्हें भी इसके लिए चुप रहने को कहा गया। उनकी घर बदली के मायने महज यह नहीं हो सकते कि कांग्रेस में उन्हें अपना भविष्य सीमित नजर आने लगा था, अपितु यह भी हैं कि पार्टी में अब न आगे बढऩे की इच्छा रही है और न ही आगे बढ़ाने की। लोकतंत्र में चुनाव लडक़र कोई भी माननीय का ओहदा हासिल कर सकता है, लेकिन कांग्रेस के अंदर इसकी संभावना नहीं है। हालांकि दूसरे राजनीतिक दलों विशेषकर भाजपा में भी चुनींदा चेहरे पहले से निर्धारित होते हैं, लेकिन फिर भी कम से कम सभी चाहवानों पर चर्चा तो होती है, उनकी रजामंदी भी ली जाती है। उनके बारे में एक राय भी बनाई जाती है। हरियाणा जैसे कांग्रेस के ऊर्जावान नेताओं से भरे प्रदेश में अध्यक्ष के अलावा कोई नई नियुक्ति वर्षों से नहीं हुई है। आखिर गतिरोध कहां कायम होता है? अब पंजाब में जारी गतिरोध का सार भी यही है कि पार्टी नेतृत्व किसी अन्य को किसी अन्य की नाराजगी मोल लेकर महत्व देने की मंशा नहीं रखता।

खैर, ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद कांग्रेस को एक युवा नेता के जाने से जो आघात पहुंचा है, उसका परिणाम निकट भविष्य में देखने को मिल सकता है। जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने पर कांग्रेसियों ने वैसी ही टिप्पणी की हैं, जैसी वे सिंधिया को लेकर कर रहे थे। पार्टी छोडऩे को विश्वासघात और स्वार्थीपन ठहराया गया है। यह भी कहा गया है कि वे पिछले कुछ समय से लगातार चुनाव हार रहे थे, वहीं यह भी तंज कसा गया कि पार्टी ने उन्हें क्या नहीं दिया, जिससे के लिए वे विरोधी दल में चले गए।

जाहिर है, पार्टी का अपने आप कोई अस्तित्व नहीं है, जब एक समान विचारधारा के लोग आकर जुटते हैं, तो पार्टी का जन्म होता है। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद कांग्रेस में थे, इसलिए वे भी पार्टी की विचारधारा को थाम कर आगे बढ़े। लेकिन अब अगर उन्हें कांग्रेस में अपना भविष्य कुंठित नजर आ रहा है तो उन्हें बदलाव का अधिकार है। यह भी कहा जा सकता है कि अगर कांग्रेस में ही उन्हें आगे बढऩे के रास्ते मिलते तो वे यहीं ठहरते। बताया गया है कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के समय भी प्रसाद ने कांग्रेस से किनारा करने की सोची थी लेकिन उन्हें मना लिया गया था। अब बेशक, भाजपा में आकर उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व यानी गांधी परिवार पर सीधा निशाना नहीं साधा है, लेकिन कांग्रेस के हालात पर यह कहना ही काफी है कि उन्हें लग रहा था कि पूर्व पार्टी में रहकर लोगों की सेवा करना और उनके हितों की रक्षा करना अब संभव नहीं रह गया था।

विरोधी राजनीतिक दल से किसी बड़े नेता के आने का नफा और नुकसान तो लगाया ही जाता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार जारी है, लेकिन विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने के दावे के बावजूद भाजपा ब्राह्मणों को खुश नहीं रख पाई है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जितिन प्रसाद के जरिए भाजपा प्रदेश के ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करना चाहती है। हालांकि पार्टी को इसका भी ख्याल रखना पड़ेगा कि प्रसाद के आगमन से बने समीकरण दूसरे दिग्गजों को रुष्ट न कर दें। खैर, मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी भाजपा ने तमाम वादे किए होंगे, उनके पूरा होने या न होने का अभी कोई संकेत नहीं है। कांग्रेस के विधायक तोडक़र भाजपा में आए सिंधिया ने उपचुनाव में जीत दर्ज की और विपक्ष में बैठी भाजपा को सत्ता में ले आए। लेकिन उन्हें अभी तक इसके लिए कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला। जाहिर है, सत्ता में बैठी भाजपा अनेक नेताओं को मकरंद के समान लगती है, जिसकी तरफ वे खींचे चले आते हैं। यह स्वाभाविक भी है। हालांकि यह समय भाजपा में आए नेताओं के विश्लेषण का नहीं अपितु कांग्रेस से जा रहे नेताओं के विश्लेषण का है। कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में स्थिति डांवाडोल हो चुकी है। यहां पार्टी के जो 7 विधायक थे, वे भी कम हो गए हैं। पिछले 30 साल में कांग्रेस नहीं पनप पाई और अब चुनौती बढ़ती जा रही है। दरअसल प्रसाद का भाजपा में आने का उतना फायदा नहीं है, जितना कांग्रेस के लिए नुकसान है। जितिन न ही 2014 में जीते थे और न ही 2019 में। जाहिर है, कांग्रेस को अपने नेताओं की नाराजगी दूरी करनी होगी, वरना उनका पार्टी से बहिगर्मन इसी प्रकार जारी रहेगा। मौसम की गर्मी के बीच नेताओं के गर्म तेवर पार्टी की सेहत पर भारी पड़ रहे हैं।

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