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खट्टर सरकार : गठबंधन धर्म और भावी चुनौतियां

नया साल नयी उम्मीदों और नये लक्ष्यों का संकल्प लेने का अवसर होता है। हरियाणा में भाजपा-जजपा गठबंधन सरकार अपना कामकाज संभाल चुकी है। नये वर्ष के लक्ष्यों और उनकी प्रतिपूर्ति के लिए तय की जाने वाली रणनीति पर प्रदेश की जनता की निगाहें हैं। खट्टर सरकार का पहला कार्यकाल तमाम चुनौतियों से घिरा रहा है। डेरा बाबाओं की वजह से सरकार को जहां मुश्किलों का सामना करना पड़ा वहीं राज्य के कर्मचारी संगठनों ने भी सरकार को नाकों चने चबाये रखे। मंत्रियों में आंतरिक गतिरोध भी हावी रहा। सरकार की शुरुआत अच्छी थी, लेकिन अंतिम वर्षों में जो ग्रोथ देखने को मिली, वह जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी। सरकार को इस बात पर चिंतन करना होगा कि पांच शहरों के मेयर पद के चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों की जीत, जींद उपचुनाव और लोकसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के बाद विधानसभा चुनाव के दौरान आखिर जीत का सिलसिला क्यों मंद पड़ गया।

जाहिर है, गठबंधन की राजनीति दाम्पत्य जीवन की तरह ही होती है। जब दोनों पक्षों को एक राय बनाकर कदमताल करनी होती है। मौजूदा सरकार में भाजपा की चुनौती जहां गठबंधन को बरकरार रखते हुए आगे बढऩा है, वहीं उसकी सहयोगी जजपा जोकि चाबी की भूमिका में है, के लिए सामंजस्य कायम रखना जरूरी है। जजपा ने इस भूमिका का निर्वहन बेहतर तरीके से जारी रखने का प्रयास भी किया है। एक नवोदित पार्टी के नेता के रूप में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला जहां सरकार के साथ संतुलन बना कर चल रहे हैं, वहीं अपने पार्टी संगठन के अंदर भी उन्होंने व्यापक समरसता कमोबेश कायम की है। बीते दिनों पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं विधायक रामकुमार गौतम ने बगावत के सुर अलापे। अब देखना है कि दुष्यंत अपने विधायकों को संतुष्ट और एकजुट कैसे रखे रहेंगे।

सरकार बनाने के बाद भाजपा-जजपा ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाने की घोषणा की थी। कार्यक्रम को बनाने में दोनों दलों के नेता जुटे हैं। इस कार्यक्रम को तैयार करना और फिर उसे अमल में लाना निश्चय ही बड़ी चुनौती होगी। विपक्ष इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम में विलंब होने की वजह से गठबंधन सरकार को आड़े हाथ लेने पर तुला है। 27 अक्तूबर के बाद से अब तक योजनाओं की घोषणा और उसके अमल में लाए जाने का जनता को बेसब्री से इंतजार है। गौरतलब है कि दोनों पार्टियों की ओर से अनेक वादे लगभग समान हैं। इनमें वृद्धावस्था सम्मान पेंशन को 5100 रुपये प्रतिमाह देना भी शामिल है। जजपा ने वादा किया था कि वह महिलाओं को 55 वर्ष पूर्ण होने पर पेंशन देगी, वहीं भाजपा का वादा था कि महंगाई जैसे-जैसे बढ़ेगी वैसे-वैसे पेंशन बढ़ती जाएगी। स्वाभाविक है कि इस वादे को पूरा करने के लिए गठबंधन में सरकार चला रही दोनों पार्टियों को आपसी सोच और समन्वय तैयार करना होगा।

बहरहाल, नए साल में गठबंधन सरकार के सामने कर्मचारी फिर चुनौती बन चुके हैं। किलोमीटर स्कीम को लेकर रोडवेज कर्मचारी जहां आंदोलनरत हैं, वहीं नगरपालिका से जुड़े कर्मचारियों ने भी हड़ताल का ऐलान कर रखा है। पिछले कार्यकाल में भी सरकार लगभग पांच वर्ष कर्मचारियों के आंदोलन झेलती रही है। उनसे बैठकों का दौर चलता रहा है, कर्मचारी संगठनों ने भाजपा नेताओं के आश्वासन भी नहीं स्वीकारे जिसके परिणामस्वरूप 75 पार सीटों का लक्ष्य लेकर चल रही पार्टी को महज 40 सीटों पर संतोष करना पड़ा। पेंशन बढ़ोतरी, पुरानी पेंशन स्कीम, पंजाब के समान वेतनमान सहित अनेक मांगें ऐसी हैं जिनकी व्यवहारिकता को लेकर सरकार पशोपेश में है। वह इन्हें केंद्र का मामला बता कर टालती रही है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी भी सरकार के समक्ष चुनौतियां कभी खत्म नहीं होती हैं। उनका समाधान करना ही सरकार का दायित्व होता है। हरियाणा में भाजपा हाईकमान को इसका अहसास भी है। इसलिए उसने मुख्यमंत्री मनोहर लाल को मजबूती देने के लिए गृहमंत्री की जिम्मेदारी अनिल विज को दी है। विज एक तेजतर्रार नेता हैं। उन्होंने पुलिस प्रणाली में सुधार के प्रयास शुरू किये हैं। लेकिन यह तो सर्वविदित है कि जनता केवल बातें नहीं चाहती, वह एक्शन चाहती है। सरकार के ओहदेदार कोई भी हों, उन्हें जनता से किए वादों को पूरा करने के लिए काम करना होगा, यही इस गठबंधन सरकार का नववर्ष का लक्ष्य और संकल्प भी होना चाहिए।

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