सबरीमाला में क्यों नहीं होती शांति - Arth Parkash
Wednesday, November 21, 2018
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सबरीमाला में क्यों नहीं होती शांति

सबरीमाला में क्यों नहीं होती शांति

केरल का सबरीमाला मंदिर फिर चर्चा में है, भगवान अय्यप्पा मंदिर में विशेष पूजा शुरू हो गई है। मंदिर मंगलवार रात 10 बजे तक खुला रहेगा, इसके बाद मंदिर फिर से बंद हो जाएगा। पिछले दिनों में मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जो राजनीति जारी है, उसकी पराकाष्ठा है कि नेता सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, हालांकि व्यापक जनहित और न्यायपूर्ण फैसले देना ही अदालत का काम है। खैर, दो दिन के लिए फिर खुले मंदिर में पिछली बार की तरह कोई विवाद न हो और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू कराया जा सके, इसके लिए राज्य सरकार ने व्यापक सुरक्षा बंदोबस्त किए हैं। यहां 20 सदस्यीय कमांडो टीम और 100 महिलाओं समेत 2300 कर्मियों को दर्शन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तैनात किया गया है। पचास वर्ष से अधिक की आयु वाली कम से कम 15 महिला पुलिसकर्मियों को सन्निधानम में तैनात किया गया है।

मालूम हो, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बयान दिया था कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फैसले नहीं देने चाहिए, जो लागू न कराए जा सकें। संभव है यह बयान उन लोगों का समर्थन करता है जोकि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि केरल सरकार ने भी अब इस मसले पर राजनीतिक बयान देकर अपनी चाल चल दी है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भाजपा नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि विवाद के लिए वे जिम्मेदार हैं। विजयन ने ट्वीट किया, घिनौनी राजनीति और दगाबाजी एक्सपोज हो गई है। सबूत सामने आए हैं कि सबरीमाला में समस्या पैदा करने में बीजेपी नेताओं की भी मिलीभगत थी। यह नोट किया जाना चाहिए कि बीजेपी के राज्य अध्यक्ष भी इसमें शामिल थे। यह बहुत ही निंदनीय है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश का फैसला सुनाया था। पहले यहां 10 साल की बच्चियों से लेकर 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। यह प्रथा 800 साल से चली आ रही थी। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरे राज्य में विरोध हो रहा है। 17 से 22 अक्तूबर तक मंदिर मासिक पूजा के लिए खोला गया था, लेकिन विरोध के चलते कोई महिला दर्शन नहीं कर पाई। उस दौरान कुछ महिला पत्रकारों और युवतियों ने प्रवेश की कोशिश की तो प्रदर्शनकारियों ने पत्रकारों के वाहनों में तोडफ़ोड़ की। अब धार्मिक संगठनों ने मीडिया से अपील की है कि वह महिला पत्रकारों को कवरेज के लिए न भेजे। वैसे ये हास्यास्पद लगता है कि एक आयुवर्ग की महिला पत्रकारों को वहां जाने से रोका जा रहा है। जाहिर है, महिला पत्रकारों के वहां जाने से यह सुनिश्चित हो जाता है कि उनका प्रवेश होगा ही। ऐसे में विवाद बढऩे की आशंका रहती है। हालांकि पुलिस के मुताबिक महिलाओं के प्रवेश की अनुमति का विरोध करने पर 536 मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में अब तक 3719 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि इनमें से सिर्फ 100 लोग ही जेल में हैं। बाकी लोगों को जमानत मिल चुकी है।

सबरीमाला मंदिर का मसला संभवतया इतनी जल्दी हल होने वाला नहीं है। इस देश में मंदिर और दूसरे धार्मिक स्थलों से जुड़े मसले गैस के ऐसे चैम्बर हैं, जोकि भड़कने को तैयार रहते हैं। देश तमाम समस्याओं से जुझे, सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, उद्योग-धंधे चाहे कुछ न हों, लेकिन धार्मिक स्थल कायम हों और उनकी परंपरा अनुसार हिफाजत भी। यह सोच हमें विकसित नहीं होने दे रही। महिलाओं से भेदभाव को खत्म करने के लिए अगर अदालत कोई फैसला देती है तो जनता अदालत के ही खिलाफ आवाज बुलंद कर देती है। एक लोकतंत्र में यह संभव है लेकिन क्या विरोध से पहले तमाम पक्षों पर विचार नहीं करना चाहिए, बदलते दौर में क्या परंपरावादी बातें कायम रहनी चाहिए?

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