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In truth, the ostriches have been formed by governments

सच में सरकारें बन चुकी हैं शुतुरमुर्ग

क्या यह मान लेना चाहिए कि सरकारों के हाथ में अब ज्यादा कुछ नहीं रहा है और उन्हें एकतरफ बैठ जाना चाहिए। ऐसे में न्यायपालिका ही देश को चलाएगी। दरअसल, ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि आजकल लगभग रोजाना ही सुप्रीम कोर्ट एवं राज्यों के हाईकोर्ट ऐसी व्याख्याएं दे रहे हैं, जिनमें केंद्र एवं राज्य सरकारों को कड़ी फटकार होती है। अदालतें इतने आक्रोश में हैं कि सिस्टम के खिलाफ हत्या आरोपी होने का आरोप तक लगा रही हैं।

अब जब कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर की भी घोषणा की जा रही है, तब न्यायपालिका का चिंतित होकर केंद्र सरकार से यह पूछना कि तीसरी लहर के लिए आपके पास क्या योजना है, बताता है कि जनभावनाओं के अनुकूल अदालत अपनी भूमिका का निर्वाह कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र एवं राज्य सरकारों को नसीहत दी है कि तीसरी लहर से निपटने के लिए तैयार रहने की जरूरत है। जाहिर है, अगर सरकारों को न्यायपालिका की ओर से यह बताया जाए कि उन्हें क्या करना चाहिए तो यह फिर कार्यपालिका के होने पर सवाल है। एक लोकतांत्रिक देश में कार्यपालिका का गठन जनता अपने कल्याण के लिए करती है। ऐसे में कार्यपालिका को अपनी सक्षमता का परिचय देते हुए ऐसी व्यवस्था कायम करनी चाहिए, जिससे जनता का जीवन सुगम और सुरक्षित हो। हालांकि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश समेत अनेक राज्यों में मेडिकल प्रणाली की पोल खुलकर सामने आ चुकी है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार का यह दूसरा कार्यकाल है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में अपनी पार्टी की जीत को मॉडल बताया था, और इसकी वे दूसरे राज्यों की सरकारों को नसीहत देते थे कि कैसे दिल्ली में मेडिकल प्रणाली बेहतर हो चुकी है, हालांकि कोरोना संक्रमण के चलते राष्ट्रीय राजधानी में जिस प्रकार ऑक्सीजन और अस्पतालों में बैड की समस्या से दोचार होना पड़ रहा है, उससे यह भलीभांति ज्ञात हो जाता है कि सरकार ने अपने प्रचार के अलावा कुछ नहीं किया है। यही वजह है कि हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है कि संक्रमण ने राज्य में बुनियादी चिकित्सा ढांचे की बदहाली की पोल खोल दी है, कहना पड़ रहा है कि दिल्ली सरकार शुतुरमुर्ग की तरह बर्ताव कर रही है। वैसे ऐसी टिप्पणी हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले केंद्र सरकार के लिए भी की थी, जब अदालत ने कहा था कि आप यानी सरकार शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर धंसाइए, पर हम ऐसा नहीं कर सकते। वास्तव में केंद्र एवं राज्य सरकारों की यही स्थिति है।

किसी प्राकृतिक आपदा के वक्त भी काफी गुंजाइश होती थी कि दूसरे राज्यों से प्रभावित राज्य में मदद पहुंचाई जाए, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि कोरोना संक्रमण इतना भयावह हो सकता है। ऐसे में सरकारों की इस व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्यों नहीं इसकी परिकल्पना की जाती कि कोरोना जैसी महामारी अगर फैले तो किस प्रकार उससे मुकाबला किया जाएगा। बीते वर्ष जब केंद्र सरकार ने संपूर्ण लॉकडाउन लगाया तो उस समय कहा गया था कि सरकार को इस दौरान व्यवस्थाएं करने का वक्त मिल गया। हालांकि बाद में जब कोरोना की रफ्तार मंद हुई तो केंद्र एवं राज्य सरकारें भी गतिहीन हो गईं। आखिर इसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को दोषी क्यों नहीं ठहराया जाए? यही वजह है कि अदालत सरकारों को शुतुरमुर्ग बता रही हैं, जोकि काफी हद तक सही भी जान पड़ रहा है।

चिकित्सा ढांचे को लेकर दिल्ली सरकार पर बात आई तो उसने इसके लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं होने को आधार बताया। हालांकि अदालत ने कहा कि आप कह रहे हैं कि ऑक्सीजन होने मात्र से सब ठीक हो जाएगा, यह सरकार की धारणा है लेकिन भविष्य के चिकित्सा ढांचे को लेकर आपकी योजना क्या है, उसका खुलासा भी होना चाहिए। अब यही बात सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी पूछी है, जिसके संबंध में रोजाना नए खुलासे हो रहे हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि केंद्र सरकार थक चुकी है और उसका मनोबल टूट चुका है। बीते वर्ष देशवासियों के दिलोदिमाग में विभिन्न तरीकों से हौसला और उम्मीद कायम रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अब व्यथित नजर आ रहे हैं। बंगाल चुनाव में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देने वाले प्रधानमंत्री अगर उस समय से ही कोरोना पर हमले को महत्व देते रहते तो आज जनता में केंद्र सरकार के प्रति ऐसी नकारात्मक धारणाएं नहीं बनती। और अदालतों को भी केंद्र के प्रति ऐसी तीखी टिप्पणियां करने का मौका नहीं मिलता। गौरतलब है कि दिल्ली को ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नसीहत दी है कि हमें कड़े फैसले के लिए मजबूर न करें। कितना अच्छा होता अगर अदालतें केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रशंसा करती और कोरोना संक्रमण से लडऩे की उनकी योजना को सराहती।

गौरतलब है कि पंजाब में सामने आ रहा है कि राज्य के छह जिलों में एक भी वेंटीलेटर नहीं है। इसी तरह राज्य के 17 जिलों में लेवल थ्री का एक भी बेड नहीं है। अनेक जिलों में अस्पतालों में टेक्निकल स्टाफ नहीं है। कहीं वेंटीलेटर्स हैं तो स्टाफ नहीं है और जहां स्टाफ है वहां वेंटीलेटर्स नहीं। तरनतारन में दो वेंटीलेटर्स हैं, लेकिन यहां एक भी एक्सपर्ट नहीं है। होशियारपुर के हालात तो ऐसे हैं कि यहां तीन वेंटीलेटर निजी अस्पतालों को दे दिए गए हैं। इधर, विपक्ष विशेषकर भाजपा ने सवाल उठाया है कि पीएम केयर्स फंड से पंजाब को जब 290 वेंटीलेटर भेजे गए थे तो अब तक धूल क्यों फांकते रहे। इस बीच राज्य के लिए यह भी चिंता की बात है कि सरकारी डॉक्टर अपने पदों से इस्तीफे दे रहे हैं। अब तक चार डॉक्टर ऐसा कर चुके हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वेतनमान की विसंगति के कारण राज्य में स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं मिल रहे। हरियाणा में भी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली मौजूदा कोरोना काल में उजागर हो गई है।

आखिर क्यों सरकारें आपदा के वक्त ही योजनाएं बनाने में व्यस्त होती हैं, क्यों नहीं समय रहते तैयारी की जाती। मौजूदा परिस्थितियां बेहद भयावह हैं और जनता सरकारों के प्रति गहनता से सोच रही है। बेशक, कोरोना काल के जख्म सूख जाएं लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी ढांचा मजबूत न कर पाने की सजा हर सत्ताधारी राजनीतिक दल को जनता देगी। यह बात हमेशा पूछी जाएगी कि आखिर हमने किस उम्मीद से किसी को सत्ता सौंपी थी, जिसने उसका मखौल बना दिया। अब भी वक्त है, सरकारें खुद को शुतुरमुर्ग बनने से रोक सकती हैं।

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