Saturday, September 21, 2019
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हरियाणा को 1805 में छोटे-छोटे रजवाडों और नवाबों ने बांट रखा था

सन् 1805 में हरियाणा में 33 रियासतें थी तथा इस क्षेत्र को छोटे-छोटे रजवाड़ों तथा नवाबों ने बांट रखा था। दिल्ली की लड़ाई के दौरान लॉर्ड लेक नामक अंग्रेज को जाट लड़कों द्वारा घेर लिया गया था। उस समय दिल्ली के तीन पठानों ने उसकी जान बचाई थी। जिसके इनाम में उन्हें दुजाना, लौहारू तथा पटौदी की रियासतों के रूप मेंं दिया गया। सन् 1833 के चार्टर एक्ट के अनुसार उत्तर-पश्चिम प्रांत की स्थाना हुई थी। जिसका मुख्यालय आगरा था। इसके तहत 6 मंडल आते थे। जिनमें अंबाला का इलाका एक मंडल था। इसे दिल्ली डिवीजन के तहत रखा गया था। हरियाणा में 1857 की क्रांति तक यही व्यवस्था रही। क्रांति में हरियाणा की जनता द्वारा सक्रिय भाग लेने के कारण, इसे सजा के तौर पर पंजाब में मिला दिया गया। स्वतंत्रता के पश्चात केंद्रीय गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने 640 रियासतों को राजनीतिक कूटनीति से भारत में शामिल कर लिया। कई बड़ी रियासतों का वजूद आजादी के काफी समय बाद तक रहा। हरियाणा में उस समय लगभग 6 रियासतें जींद, नाभा, दुजाना, लोहाझ्रू, पटौदी व पटियाला थीं।

1. जींद रियासत : पहले इस रियासत में 447 गांव, 1300 वर्ग मील का इलाका, 5 लाख जनसंख्या तथा 32 लाख रुपए की मालगुजारी थी। बाद में इस रियासत में तीन शहर जींद, संगरूर व दादरी तथा 346 गांव ही रह गए, रियासत का कुल क्षेत्रफल 1026 वर्ग मील था तथा 2 लाख 79 हजार 284 की आबादी थी। महाराजा रघुबीर सिंह राजा थे। रियासत की हालत बेहद खस्ता थी। जनता की मांगों को पूरा करने में राजा सक्षम नहीं था। लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिए सन् 1939 में प्रजामंडल की स्थापना की गई जिसमें हंसराज रहबर, बनारसीदास गुप्ता, चौ. लहरी सिंह, सागर दत्त गौड़, लाला रामकिशन, निहाल सिंह तक्षक तथा पं. शिवकरण शामिल थे। इन्होंने लगातार संघर्ष किया तथा राजा का वीरता से मुकाबला किया। चरखी दादरी में आंदोलन हिंसात्मक हो गया। फरवरी 1947 तक राजा का शासन कमजोर हो गया तथा प्रजामंडल ने समानांतर सरकार बना डाली। राजा ने कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता पताभी सीतारमया को समझौते के लिए बुलाया तथा प्रजामंडल की लगभग सारी मांगे मान ली। 5 मई 1949 को इसे पेप्सू स्टेट में शामिल कर दिया गया। 25 मई 1948 को राजा मेहताब सिंह ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया था।

2. नाभा : इस रियासत का कुल क्षेत्रफल 282 वर्ग मील तथा जनसंख्या 91 हजार 723 थी। इस रियासत में 174 गांव थे। बावल जिला था तथा कनीना व अटेली तहसीलें थीं। यह रियासत सन् 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की मदद से ईनाम में सन् 1858 में दे दी गई। प्रताप सिंह रियासत के राजा थे। उन्होंने जनता पर भारी टैक्स लगा रखे थे। लोगों से बेगार भी ली जाती थी। अस्पताल तथा विद्यालय जैसी सुविधाएं नहीं थी। द्वितीय विश्वयुद्ध समाज होने के बाद यहां भी प्रजामंडल की स्थापना हुई। श्री माधो सिंह के नेतृत्व में मथुरा प्रसाद, देवकी नंदन, रूप नारायण, दीन दयाल, मातादीन भारद्वाज, ईश्वर सिंह, श्याम मनोहर, रामेश्वर सिंह, मुखराम, शिवनारायण तथा कृपाराम आदि ने आंदोलन का नेतृत्व किया। कमलाबाई नामक महिला भी आंदोलन में शामिल थी। 25 मार्च 1946 को बावल कस्बे में धारा 144 लगा दी गई तथा सभी आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन ने गंभीर रूप धारण कर लिया। आखिर राजा ने प्रजामंडल की सभी मांगे मान ली तथा सभी आंदोलनकारियों को रिहा कर दिया गया।

3. दुजाना : दुजाना रियासत के तहत एक कस्बा तथा 32 गांव आते थे। इसका कुल क्षेत्रफल 91 वर्ग मील था। कुल जनसंख्या 30 हजार 666 थी। सालाना राजस्व 2 लाख 31 हजार रुपए था। यह रियासत सन् 1805 में बनी। सन् 1945 में इसका नवाब मोहम्मद इक्तदार अली खा था। शासक का सारा कार्य उसके शिक्षक उम्र दराज व्यक्ति नायब दीवान खास के हाथों में था। रियासत के तहत में उस समय बिजली की व्यवस्था थी। रियासत में कोई अस्पताल नहीं था। केवल एक प्राइमरी स्कूल था। भारी करों से तंग आकर सुविधाओं की कमी के चलते नाहड़ में सन् 1945 में प्रजामंडल बनाया गया। राव देवकरण प्रधान तथा सरदार सिंह सचिव बने। हरियाणा आर्य, नेकीराम यादव, ताराचंद आर्य, श्योचंद, मोहनलाल तथा रामजीलाल सदस्य थे। इन्होंने कई जनहित के प्रस्ताव तैयार कर, नवाब के खिलाफ आंदोलन कर दिया। इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 8 दिसम्बर 1946 को सभी नेताओं को छोड़ दिया गया। विभाजन के समय नवाब पाकिस्तान चला गया तथा रियासत का रोहतक जिले में विलय हो गया।

4. लौहारू : लौहारू रियासत का कुल क्षेत्रफल 226 वर्ग मील था और जनसंख्या 27892 थी। यह रियासत सन् 1803 में महाराजा अलवर द्वारा बनाई गई थी। उन्होंने अपने मुगल सरदार अहमद बख्श खान को इस रियासत का दीवान नियुक्त किया था। बाद में वह स्वतंत्र नवाब बन गया। उसकी पीढ़ी के मिर्जा अमीनुद्दीन अहमद नवाब बनेद्ध 14 सितंबर 1935 में नंबरदारों ने लगान के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। नवाब अमीनुद्दीन ने नंबरदारों को गिरफ्तार करवा दिया। गांव चेहड़ में नवाब ने घरों को आग लगा दी। शिंघाणी गांव में अंादोलनकारियों पर गोलीबारी में 35 लोग मारे गए। भारी कर, बेगार तथा धार्मिक स्वतंत्रता दिये जाने की मांग को लेकर यहां आर्य समाज के नेता ठाकुर भागवत सिंह, श्री गंगाशाही, चौ. बंसीलाल, भगत पूजा राम तथा श्री शंकरलाल ने नवाब के विरुद्ध प्रजामंडल की स्थापना की। इस घटना से आसपास के क्षेत्रों के नेता व आम लोग लौहारू जा पहुंचे। नवाब ने जनता की सारी मांगे मान लीं। नवाब इस रियासत को अलवर स्टेट के साथ मिलाना चाहता था, लेकिन प्रजामंडल के नेताओं के कारण इसे हिसार में शामिल करना पड़ा।

5. पटौदी : इस रियासत में इस कस्बा तथा 40 गांव आते थे। यह रियासत सन् 1805 में बनाई गई थी। इसका कुल क्षेत्रफल 53 वर्ग मील तथा आबादी 21 हजार 520 थी। 90 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की थी। रियासत की सालाना आमदनी 3.50 लाख रुपये थे। सन् 1940 में मोहम्मद इफ्तार अली खां पटौदी नवाब थे, जो उस समय की भारतीय किकेट टीम के कप्तान भी थे। रियासत का सारा काम दीवान खान बहादुर शेख आलम अली देखते थे। सुविधा के नाम पर एक छोटा दवाखाना तथा 5 प्राईमरी स्कूल थे। 1 जहून 1939 को मौलाना नूरूद्दीन के नेतृत्व में पंडित गौरी शहर, बाबू दयाल शर्मा, सुरजभान मित्तल, रूप लाल मेहता आदि नेताओं ने प्रजामंडल की स्थापना की। नवाब ने सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार करवा दिया। क्षेत्री नेता राव गजराज सिंह व पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हस्तक्षेप कर नवाब तथा प्रजामंडल के बीच समझौता करवाया। आजादी के बाद रियासत का गुडग़ांव जिले में विलय कर दिया गया।

6. पटियाला : सन् 1946 में यहां राजा भूपेंद्र सिंह शासक थे। हरियाणा में बाढड़ा व नारनौल इसका हिस्सा थे। भारी टैक्स तथा सुविधाओं की कमी व बेगार जैसी ज्यादतियों के खिलाफ सेवा सिंह टिकरी वाला, श्री राम किशोर माताद्दीन, चौ. दूलीचंद, लाला अयोध्या प्रसाद, कमला देवी, रामसरन मित्तल आदि के नेतृत्व में आंदोलन किया गया। सन् 1938 में यहां प्रजामंडल की स्थापना हुई। आजादी के बाद इस रियासत का पेप्सू स्टेट में विलय कर, चुनाव करवाए गए।

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