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विनम्रता सदैव ऊँचाईयों पर ले जाती है : निरंकारी बाबा

आज उन्हें लोग जालिम कहते हैं जो अहं मे चूर होते हैं। वह ही जुल्म करते हैं। उनके लिए कहा गया है कि –
जालम जुलमों नहीं डरदे, अपणे अमली आपे मर दे।

भाव, जो अमल कमाते हैं, जो कर्म करते हैं वही पर्याप्त होते हैं उनको डुबोने के लिए, उनके अन्त के लिए। फिर न वो ताकते नजर आती है न वो शरीर नजर आते हैं, न वो साम्राज्य नजर आते हैं। दूसरी तरफ जिन्होने सन्तों-महापुरुषों से समझ को हासिल किया, वास्तविक सीख को अपनाया, वे ऐसा साम्राज्य स्थापित कर गए जिसे युगों बीतने पर भी कोई हिला नहीं सका। वे आज भी कायम है। उन्होंने दिलों में अपना ऐसा स्थान बनाया जो बड़े-बड़े राजा-महाराजा तशद्दुद करने वाल कभी भी बना नहीं पाये बल्कि वे तो ऐसा अपयश लेकर संसार से रुख्सत हुए जो सदियों बादभी कायम है।

जिन्होंने स्वयं को कुछ नहीं गिनवाया। सदैव यही कहा कि मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, मेरा ता कोई अस्तित्व ही नहीं है, वो ऊँचाईयों को छू जाते हें। महापुरुष-सन्तजन कहते हैं कि जो विनम्र भाव वाले होते हैं वास्तव में वे ही सबसे ऊँचे हुआ करते हैं-

उह उच्चा ए सब लोकां तो पतवन्ता ए उह प्रधान।
साध दी सेवा करके जिसदा हौमे दा मिट जांदा मान।

कहते हैं कि वह सबसे ऊँचा, पतवन्ता तथा प्रधान हुआ करता है जो महापुरुषों से शिक्षा ग्रहण करके, महापुरुषों की सेवा करके अपने मान को गँवा देता है। वैसे भी, जो अपना अस्तित्व ही नहीं मान रहा, उसका नुकसान क्या होगा? एक नन्हीं सी घास की मिसाल देते हैं। जब तेज हवा चलती है, आँधी चलती है तो बड़े बड़े उखड़ कर गिर जात हैं लेकिन वह घास उसी तरह से कायम रहती है। अंग्रेजी में एक कहावत प्रसिद्ध है – ञ्जद्धशह्यद्ग 2द्धश ह्यद्यद्गद्गश्चह्य शठ्ठ ह्लद्धद्ग द्घद्यशशह्म्, स्रश ठ्ठशह्ल द्घड्डद्यद्य द्घह्म्शद्व ह्लद्धद्गद्बह्म् ड्ढद्गस्रह्य. अर्थात् जो जमीन पर सोते हैं वे पलंग से गिरते नहीं। जो पहले ही जमीन पर लेटे हैं वे कौन से पलंग से गिरेंगे? सन्त तुकाराम जी ने कहा कि मैं प्रतिष्ठा को विष्ठा मानता हूँ। जो पहले ही निमाणा है वह किसी बात पर क्यों कर बौखलायेगा? क्यों कर तिलमिलायेगा? कोई यश होता है तो वह उसे प्रभु कृपा मानता है। वह जानता है कि अभी 50 यश कर रहे हैं तो हो सकता है सैकड़ो-हजारों अपयश कर रहे हो। यह दातार की कृपा है कि यह यश करवा रहा है वर्ना मैं तो कुछ भी नहीं हूँ। कबीरजी फरमाते हैं-

कबीर सबते हम बुरे हम तज भलो सब कोय।
कोई खाली बोल नहीं है बल्कि ऐसी उनकी मान्यता है। हम अगर तोते की भाँति इन बोलों को रट लें, बालते रहे और कोई जरा सा भी हमारी इच्छा के विपरीत चले तो हम एकदम उससे उलझ पड़े। अगर ऐसा है तो हमारा अभिमान हमसे यह मनवा रहा है कि कबीर हम हैं चंगे, बुरे सब कोय। ऐसा अहं करने से सदैव नुकसान ही होता है और विनम्रत सदैव ऊँचाईयों पर ले जाती है। महापुरुष कहते हैं कि ऐ इन्सान, अगर तू अपनी मैं को मार नहीं सकता, इसे कायम ही रखना चाहता है तो उसे इतना विस्तार दे, इतना विशाल बना ले कि यह प्रभु का ही रुप हो जाये। इसेउस मयार (स्तर) तक ले जाए जहां दूसरा कुछ रहे ही नहीं। सब प्रभु ही प्रभु हो जाता है। इसके लिए हम निरन्तर सुमिरण करते हैं कि तूही निरंकार, मैं तेरी शरण – भाव, यही “मैं” तेरी शरण में आ गई है, तेरी शरणागत हो गई है। स्वयं को दास बना लिया है इसने, चाकर बन गई है। फिर तो यह मस्कीन बनजाती है और सुख ही सुख पाती है।

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