बच्चों से भावनात्मक दुव्र्यव्हार को कैसे परखें और रोकें: डॉ. स्वतन्त्र जैन
Monday, August 20, 2018
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बच्चों से भावनात्मक दुव्र्यव्हार को कैसे परखें और रोकें: डॉ. स्वतन्त्र जैन

बच्चों से भावनात्मक दुव्र्यव्हार को कैसे परखें और रोकें: डॉ. स्वतन्त्र जैन

चंडीगढ़: हमारे समाज में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो अपने लाभ के लिये या अपने मतलब को सिद्ध करने के लिये बच्चों की भावनाओं का दुरुपयोग कर उनसे किसी भी प्रकार से खि़लवाड़ करने में किसी भी हद तक जा सकते हैं। चिन्ता का विषय यह है कि यह दुरुपयोग कोई व्यक्ति या दो-चार व्यक्तियों या फिर हज़ार-दो हज़ार व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह गया, अपितु यह एक सुसंगठित अन्तर्राजीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय गिरोह द्वारा चलाया जाने वाला घिनौना व्यापार बन गया है।

ये लोग बड़े ही सुनियोजित एवं सुव्यवस्थित ढंग से बच्चों के भावनात्मक स्वास्थ्य एवं स्वाभिमान से खिलवाड़ कर उन्हें साम-दाम, दण्ड-भेद के द्वारा अपने मां-बाप या उनके पालन-पोषण करने वालों से अलग-थलग करके उनसे ऐसे-ऐसे अपराध कराते हैं कि कोई साधरण व्यक्ति उस बारे सोच भी नहीं सकता। यह सब ताकत और नियन्त्रण पर आधरित होता है और प्राय: दुरुपयोग एवं दुव्र्यव्हार के अनेकोंनेक रूपों के साथ दिखलाई पड़ता है।

ऐसे भावनात्मक दुरुपयोग एवं दुव्र्यव्हार की पहचान एवं रोकथाम करना अत्यन्त ही चुनौतीपूर्ण एवं जोखि़मभरा कार्य है। चूंकि इसका पता लगाना, मूल्यांकन करना एवं साबित करना बहुत कठिन होता है, बहुत से केस रिपोर्ट होने से ही रह जाते है। कुछ भी हो, भावनात्मक दुरुपयोग व दुव्र्यवहार इन बच्चों में अत्यन्त गहरे व गुप्त/छिपे हुए निशान पीछे छोड़ देता है जो उनके बौद्धिक, सामाजिक एवं भावनात्मक, सभी तरह के विकास में बाधा डाल सकते हैं। इसीलिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि माता-पिता एवं शिक्षकों को बच्चों के ऐसे घिनौने अपराध के बारे में पूर्ण जानकारी हो ताकि वे किसी भी प्रकार के दुरुपयोग की कोई भी संभावना होने पर ज़रूरी कदम उठा सकें या पहले से ही रोकथाम कर सकें।

आइये, देखें कि बच्चों के साथ किये जाने वाले इन भावनात्मक दुव्र्यव्हार के क्या-क्या और कैसे-कैसे विशिष्ट रूप हैं और वे किस प्रकार कार्य करते है:-
1. अस्वीकृति : भावनात्मक दुव्र्यवहार तब होता है जब माता-पिता या कोई अन्य देखभाल करने वाले अपने स्नेह या वात्सल्य से वंचित कर देते हैं या फिर बच्चे की उपस्थिति या उपलब्ध्यिों को स्वीकार करने से ही इंकार कर देते हैं, जैसे : ‘मैं मान ही नहीं सकती कि यह पेंटिंग तुमने बनाई है। या, ‘तुम्हारे इतने नम्बर तो कतई नहीं आ सकते। जो भी बच्चे की देखभाल करने वाले वयस्क या बड़े लोग अपने बच्चे को अस्वीकार करते हैं, वे बच्चे की भावनात्मक ज़रूरतों के समय कभी उपलब्ध नहीं होते, या उनसे कोई सरोकार नहीं रखते । जानते हैं आप, कि बड़ों का यही व्यवहार अक्सर ऐसे बच्चों के विचारों एवं भावनाओं को इतना अधिक विचलित कर देता है कि उनके मन में यह कुंठा घर कर जाती है कि उन्हें कोई प्यार ही नहीं करता। विभिन्न तरीकों से दुव्र्यवहार करने वाले वयस्क बच्चे के लिये अपनी नापसन्दगी ऐसी भद्दी तरह जताते हैं, जैसे कि वह बच्चा ही उनकी हर किस्म की परिवारिक समस्याओं के लिये भी ‘बलि का बकरा’ अर्थात जि़म्मेवार साबित हो रहा हो।

2. अपमान : दुव्र्यवहार तब होता है जब एक वयस्क लगातार किसी बच्चे को अपमानित करता है या फिर उसकी भौंडी नकल करने जैसा व्यवहार करता है, जैसे : व्यंगात्मक टिप्पणियां करके बच्चे का मज़ाक उड़ाना, उस पर बुरी तरह चिल्लाना, गालियां देना और निजी या सार्वजनिक तौर पर उसे शर्मसार करना आदि।

3. बच्चे को अकेला या अलग-थलग करना : इस किस्म का दुव्र्यवहार तब होता है जब माता-पिता या अन्य देखभाल करने वाले बच्चे से किसी और का संपर्क बिल्कुल प्रतिबन्धित कर देते हैं, जैसे : दूसरे बच्चों से दोस्ती करने, खेलने या बात-चीत करने से रोकना। किसी बच्चे को किसी निश्चित समय के लिये अपने कमरे, कोठरी, बेसमेंट या बाथरूम में बंद करके सामान्य पारिवारिक सदस्यों से उसका संपर्क या बातचीत को रोक देना। ऐसे एकाकीपन से ना केवल बच्चे घबरा जाते हैं अपितु अनजाने भय, चिन्ता और अवसाद के शिकार हो सकते हैं।

4. आतंकित करना या डराना : जब कोई माता-पिता या बड़े लोग बच्चे को धमकाने के लिये किसी चाकू या अन्य तरीकों से उसे चोट पहुंचाने वाला या यातना देने वाला व्यवहार करते हैं, या ऐसा करने की धमकी-मात्र ही देते हैं। कई बार पेरेंट्स एक बच्चे को सबक सिखाने के लिये अपने दूसरे बच्चे से या फिर किसी और के बच्चे से ज्यादा प्यार जताना शुरु कर देते हैं, जिससे बच्चे में असुरक्षा की भावना घर कर सकती है, जैसे: किसी बच्चे को किन्हीं हिंसक या ख़तरनाक परिस्थितियों में रखने या उसका त्याग करने की धमकी देने जैसा व्यव्हार।

5. भ्रष्टाचार : बच्चों में अपराधिक वृति या व्यवहार को प्रोत्साहित करना भी एक किस्म से भावनात्मक दुव्र्यवहार का ही एक अन्य रूप है, जैसे : जब बच्चों को शराब या अन्य प्रतिबन्धित दवाएं देकर या अश्लील सामग्री दिखलाई जाए या भीख मांगने, जेब काटने या चोरी करने या जानवरों और मनुष्यों के प्रति कू्रर व्यवहार करने को विवश किया जाए,

6. शोषण : जब बच्चों को अपने किसी निजी लाभ के लिये उपयोग किया जाए, जैसे उन्हें चोरी करने, भीख मांगने, हमला करने या नशीली दवाओं के बांटने या वैश्यावृति के लिये बाधित करना।

हमें कैसे पता चले कि किसी बच्चेे को भावनात्मक दुव्र्यव्हार का सामना करना पड़ रहा है? किसी भी बच्चे के साथ भावनात्मक दुव्र्यव्हार होने के कुछ संकेत नीचे दिये हैं :
* किसी बच्चे में कम आत्म-विश्वास या बहुत खराब आत्म छवि का होना,
* उसका दूसरों से भयभीत होना या हर किसी के प्रति विश्वास में कमी,
* दूसरों पर ज़रूरत से ज्यादा निर्भरता या उनसे बिल्कुल अलग-थलग होना,
* हमेशा चिन्तित या उदास रहना,
* अत्याधिक आज्ञाकारी या अति चौक्कना होना,
* रिश्ते बनाने में कठिनाई महसूस करना या निर्मोही सा व्यव्हार करना,
* किसी भी काम के प्रति बहुत कम उत्साह व लगन या दृढ़ता का न होना,
* ज्यादा अपेक्षा रखने वाला या आक्रामक वृति का होना,
* कू्रर एवं विनाशकारी वृति का होना,
* निष्क्रिय-आक्रामक, बाध्य रूप से-जुनूनी या सनकी जैसा व्यव्हार दिखाना,
* भावनात्मक, सामाजिक एवं क्षैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए होना,
* नींद में कमी या भाषा सम्बन्ध्ी विकारों से ग्रस्त होना,
* आत्म-विनाशकारी या आत्महत्या की प्रवृति होना,
* शराब या नशीली दवाओं के दुरुपयोग करने वाले होना।

हम सभी यह तो जानते हैं कि बहुत से बच्चों का इस तरह भावनात्मक रूप से दुव्र्यवहार लगातार कई-कई दिनों व महीनों ही नहीं वरन सालों-साल चलता रहता है। किन्तु हमें यह नहीं पता कि इस तरह से भावनात्मक रूप से दुव्र्यवहार करने वाले माता-पिता, शिक्षक या अन्य देखभाल करने वालों की क्या कोइ्र्र ख़ास विशेषताएं होती हैं? जी हां, ये लोग स्वयं बच्चे के अपने ही माता पिता से ले कर कोई भी उन्हें नियन्त्रण में रखने वाले वयस्क या बड़े लोग हो सकते हैं, फिर चाहे वे अपने या सौतेले मां/बाप हों, उसके अपने ही अत्यन्त नज़दीकी रिश्तेदार, घर की बाई या कोई नौकर हो, शिक्षक हों या किसी हॉस्टल या बालाश्रम के वार्डन हों, या किसी स्कूल के प्रतिष्ठित प्रिंसीपल हो या कहीं का चौकीदार या स्कूल बस के चालक, या फिर बच्चों को चुरा करके अपराधिक धंधे कराने वाले गिरोह के लोग – कोई भी हो सकते हैं, क्योकि आंखें मंूंद कर आज-कल किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता। यह भी ज़रूरी नहीं कि सभी को संदेह की दृष्टि से देखें, किन्तु हरपल सावधानी बरतना और सतर्क रहना अत्यन्त आवश्यक है।

तो, आइये देखते हैं कि इस तरह भावनात्मक रूप से दुव्र्यव्हार करने वालों की आखिऱ क्या विशेषताएं होती हैं:
* वे बच्चे को अस्वीकार या ख़ारिज कर देते हैं,
* अपनी समस्याओं के लिये बच्चे को दोषी ठहराते हैं,
* बच्चे का वर्णन नकारात्मक रूप से करते हैं,
* अपना लाड-प्यार रोक लेते हैं,
* बच्चों से कठोर एवं अवास्तविक उम्मीदें रखना,
* उनका अपने आवेगों पर नियन्त्राण नहीं रहता है,
* उनकी आशा पूर्ण ना होने पर उनमे अधीरता या सहनशीलता की बहुत कमी होती है,
* उनमें अपरिपक्व व्यव्हार का होना,
* उनकी स्वयं की मानसिक स्वास्थय सम्बन्धी समस्याओं का होना,
* शराब या नशीली दवाओं के दुरुपयोग करने वाले ।

अब, हम सब के सामने बड़ा प्रश्न है कि भावनात्मक दुव्र्यवहार से पीडि़त बच्चों को हम कैसे बचाएं? तो, देखें कि किसी भी बच्चे के विरुद्ध किसी भी तरह से भावनात्मक दुव्र्यवहार का संदेह होने पर शिक्षक/मात-पिता या अन्य सेवा संस्थाएं क्या कर सकते हैं :

* बच्चों की सुरक्षा के लिये उत्तरदायी एजेंसी को संदिग्ध बाल दुव्र्यवहार की रिपोर्ट करने के लिये स्कूल/राज्य के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करे,
* ऐसे बच्चों की सहायता व सेवा के लिये स्कूल के परामर्शदाता, मनोवैज्ञानिक या अन्य उपलब्ध संस्थाओं को रैफर करें,
* ऐसे बच्चों की शिकायतों पर विशेष ध्यान दें, उन्हें नजऱान्दाज बिल्कुल मत करें,
* बच्चों को सुनो, उन पर विश्वास करें और उनके लिये हमेशा उपलब्ध् रहें,
* बच्चे को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि वह अकेला नहीं है,
* डरे हुए बच्चे या आत्म-ग्लानि से परिपूर्ण बच्चों को यह जताना और आश्वस्त कराना ज़रूरी है कि उसके साथ हुए किसी भी दुव्र्यवहार के लिये उस की कोई गलती नहीं है,
* अपने आप को भावनात्मक दुव्र्यवहार से सम्बन्धित संसाधनों व सामग्रियों के बारे में हर तरह से सूचित रखें।

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