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मौत पर सियासी तांडव आखिर कब तक

क्या बीमारी यह देखती है कि सरकार किस पार्टी की है? या फिर मौत ही किसी शक्तिशाली पार्टी, मुख्यमंत्री, मंत्री या अधिकारी से डर कर उसके इलाके में पैर नहीं रखती। और यह भी कि क्या कोई बीमारी किसी ताक़तवर शासक के अधिकार क्षेत्र में जाने से ख़ौफ़ खाती है। बीमारी पर किसी का वश नहीं और न ही मृत्यु परकिसी का ज़ोर ।एक लोकतांत्रिक देश में जहाँ जनता स्वयं अपने नुमाइंदे चुनती है वहां रोगों से बचाव के लिए भी सरकार से ही अपेक्षा होती है। अगर यह सरकारी तंत्र बीमारियों से बचाव और पर्याप्त उपचार नहीं देता पाता है तो इसे सरकारी तंत्र लापरवाही या खामी नहीं तो और कहा भी क्या जा सकता है। सियासी प्रत्यारोप की आड़ लेकर वह स्वयं आरोप से पल्ला कैसे झाड़ सकता है।ताज़ा मामला राजस्थान में कोटा के जेके लोन अस्पताल का है जहाँ कऱीब वर्ष भर। में अब तक 104 से ज्यादा बच्चों की मौत विभिन्न कारणों से हुई है। यह जहां चिंताजनक है, वहीं सरकारी तंत्र की विफलता का मुंह बोलता उदाहरण भी है। इस मामले में सबसे अटपटी बात है जि़म्मेदारी से बचने के सियासी ओढऩा ले लेना।

बीते वर्ष मानसून के मौसम में बिहार के भीतर एक अज्ञात बीमारी से अनेक बच्चों की मौत हो गई थी। हालात ऐसे थे कि एक एक करके रोज़ाना दर्जनों बच्चे के मौत का ग्रास बन गए थे। तब बिहार सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठे थे। आज के अति आधुनिक दौर में भी स्वास्थ्य सेवाओं की ऐसी बदहाली गंभीर चिंता का विषय है ।उस समय भी बच्चों की मौतों पर आरोपों प्रत्यरोपों होड़ लग गयी थी। की ऐसी ही राजनीतिक गेंदबाजी देखने को मिली थी। स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने की बजाय राज्य सरकारें एक दूसरे पर सियासी कीचड़ उछालें तो यह बहुत निंदनीय है। इस बार राजस्थान पर कांग्रेस क़ाबिज़ है तो भाजपा नेताओं का निशाना मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बन हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान के मुख्यमंत्री पर बच्चों की मौत को लेकर जैसा हमला बोला है, वह इस मामले की तह तक जाने की क़वायद की बजाय राजनीतिक विद्वेष की परिचायक है।जाहिर है, एक सरकार के तहत स्वास्थ्य विभाग काम करता है, जोकि सरकारी अस्पतालों का संचालन करता है। काबिल डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे होते हैं, कई बार हालात ऐसे भी बनते हैं कि रोग के समाधान की दिशा में काम करते-करते भी जीवन रूपी डोर हाथ से फिसल जाती है। राज्य सरकार का दावा है कि भयंकर ठंड और प्री मैच्योर जन्म और कम वजन जैसे कारण भी बच्चों कीमौत की वजह बन रहे हैं। सरकार का यह तर्क सही भी हो सकता है ।लेकिन तब सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार ने समय रहते इसके लिए क्या यत्न किए और एतिहाती पग उठाए।

देश में आजकल नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ तीखे विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। मीडिया की सुर्खियों में भी यही मसला छाया हुआ है।भाजपा नेताओं को सीएए से ध्यान बाँटने के लिए बच्चों की मौत का मुद्दा मिल गया है। राजस्थान सरकार के मंत्री तो आरोप भी लगा रहे हैं कि यह सब कवायद प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से करायी जा रही है। कांग्रेस सरकार अपने बचाव में यह भी तर्क दे रही है कि भाजपा ने सत्ता में रहते प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ाने पर जोर नहीं दिया। दरअसल, सियासत में नैतिकता के अभाव में आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला थमने की आशा दिखाई नहीं देती। नागरिकता संशोधन कानून पर जनता के बीच भ्रम को कोहरा फैला चुका विपक्ष भाजपा सरकार के प्रत्येक कार्य को शंका की निगाह से देख रहा है, वहीं भाजपा और उसके मंत्री-मुख्यमंत्री भी ऐसे रास्ते निकाल ले रहे हैं, जिनके जरिए कांग्रेस और उसकी सरकारों की खामियों को उजागर कर प्रतिवाद किया जा सके।

आखिर, किसी मामले के हद तक बढऩे और मीडिया की प्रबल सुर्खियां बनने के बाद ही सरकारी तंत्र क्यों सक्रिय होता है। इस मामले पर राजनीतिक दांव-पेच एकतरफ है लेकिन उन माता-पिता की आंखों के आंसू कौन पोंछेगा जिनके बच्चे दुनिया में आए भी लेकिन उनके पास ठहर न सके। सरकारें खुद को इतना सक्षम क्यों नहीं बनाती कि ऐसे संकट खड़े होने से पहले ही उनका निदान कर सके। क्यों निर्बल और अभावग्रस्त जनता सरकारी तंत्र की उदासीनता का शिकार हो जाती है। अब मामले के इतना बढऩे के बाद केंद्र सरकार ने उच्च स्तरीय टीम कोटा भेजी है। वास्तव में इस तरह के मामलों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय इसका प्रयास होना चाहिए कि ऐसे हालात पैदा होने से कैसे रोके जाएं। राजनेताओं को मेरी पार्टी, मेरी सरकार की प्रवृति से बाहर आकर बतौर जनहितैषी काम करना चाहिए। बीमारी और मौत किसी राजनीतिक दल की पहचान नहीं रखते। बीमारी हालात देखती है , जहाँ लापरवाही देखी तो मौत अपने पंजे गड़ाने से बाज भला क्योंकर आएगी।

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