Editorial

Sirsa's Entry: Master Stroke of BJP

सिरसा की एंट्री : भाजपा का मास्टर स्ट्रोक

भाजपा ने पंजाब में वह कर दिखाया है, जोकि अभी तक उसके विरोधियों की सोच से परे था। शिअद नेता मनजिंदर सिंह सिरसा की पार्टी में जॉइनिंग करवा कर भाजपा ने ऐसा कार्ड खेला है, जोकि उसे पंजाब की राजनीति में मजबूती प्रदान करेगा। कृषि कानूनों को लेकर साल भर तक दिल्ली बॉर्डर पर बैठकर भाजपा को कोसते रहे किसानों और सरकार विरोधियों के लिए यह सबक है, क्यों राजनीति में दांव पेच का स्तर भी बहुत ऊपर पहुंच चुका है। भाजपा को किसान विरोधी ठहराने वाले नेताओं के सुर अब बदल गए हैं, उन्हें भाजपा अब प्यारी लगने लगी है। यह सब राजनीतिक बातें हैं और लोकतंत्र है तो यह सब कुछ होगा ही। चुनाव नजदीक हैं तो लोग आएंगे भी और जाएंगे भी। लेकिन कुछ लोगों के आने का जिक्र तो होगा ही। अब इसे भाजपा का मास्टर स्ट्रोक ही कहा जाएगा कि पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उसने शिरोमणि अकाली दल में बड़ी सेंध लगाते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं प्रमुख चेहरे मनजिंदर सिंह सिरसा को अपने खेमे में शामिल कर लिया। अपनी बेबाकी और सिख हितों के लिए सजग रहने वाले सिरसा का भाजपा में आना एक एक्टिव सिख चेहरे की कमी को पूरा करेगा वहीं यह सिख समाज में पार्टी को पैठ बनाने में मदद भी करेगा। शिरोमणि अकाली दल से अलग होने के बाद भाजपा के पास सिखों को पार्टी से जोडऩे के लिए ऐसा मुखर नेता नहीं था, लेकिन सिरसा के प्रवेश से अब भाजपा भी सिखों के और नजदीक आ गई है।

पंजाब में शिअद से अलग राह अपनाने के बाद भाजपा के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना चुनौती है। हालांकि इस वर्ष की शुरुआत में नगर निकाय चुनाव के दौरान भाजपा ने अकेले पूरे प्रदेश में चुनाव लड़ा था, उसके उम्मीदवार बेशक न जीते हों, लेकिन पार्टी के नेताओं ने साहस का परिचय देते हुए अपनी जड़ों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया था। कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद भी शिअद ने भाजपा से दूरी मिटाने की चेष्टा नहीं की। उसने बसपा के साथ ही चलना जरूरी समझा है। ऐसे में भाजपा को ऐसे चेहरे और लोगों की जरूरत है जोकि पंजाब में उसे पल्लवित करने में सहयोग करें। भाजपा के पास पंजाब में अनेक हिंदू नेता हैं, जिनका प्रदर्शन बेहतरीन रहा है, लेकिन सिखों के बगैर पंजाब में सियासत मुश्किल है। इसलिए अब जहां पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के रूप में एक बड़े सिख नेता का साथ भाजपा को मिल चुका है, वहीं अब भाजपा ने मनजिंदर सिंह सिरसा के रूप में एक और कद्दावर नेता को अपने मोर्चे में शामिल कर लिया है। हालांकि पंजाब विधानसभा चुनाव में सिरसा की भाजपा खेमे में क्या भूमिका रहेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना तय है कि पार्टी को उनकी मौजूदगी का फायदा मिलेगा।

सिरसा को अभी तक किसान हितों की पैरवी करते हुए देखा जाता था, उन्होंने कृषि कानूनों को अनुचित बताया था। संभव है, भाजपा में उनका प्रवेश कृषि कानूनों की वापसी के साथ ही तय हो गया था। कांग्रेस से बाहर आ चुके पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कानून वापसी से पहले प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री से मुलाकात कर भाजपा की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया था, अब कृषि कानूनों की वापसी से कैप्टन ने भी राहत की सांस ली है, क्योंकि कथित किसान विरोधी भाजपा से याराना रखने का उन पर अब आरोप नहीं लग पाएगा। भाजपा के अछूत होने जैसा आरोप पूरी तरह धोया जा चुका है। सिरसा दो बार दिल्ली से विधायक रहे हैं और लंबे समय तक दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के विभिन्न पदों पर सेवाएं दे चुके हैं।\

सिरसा ने कहा, केंद्रीय गृह मंत्री और प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया है कि सिखों के जितने भी मुद्दे हैं, वे हल होने चाहिए। क्योंकि यह सभी मुद्दे अभी राजनीति की भेंट चढ़े हुए हैं, इसलिए वे दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए हैं। मनजिंदर सिंह सिरसा के सिख समुदाय पर प्रभाव को ऐसे समझा जा सकता है कि वर्ष 2012 में जब वे गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी के महासचिव बने थे तो अकाली दल को पंजाब में सत्ता हासिल हुई थी। परमजीत सिंह सरना को मात देकर अकालियों ने गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी में पकड़ बनाई थी। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि सिरसा का भाजपा में जाना सिख समाज के बीच पार्टी को पैठ बढ़ाने में मदद करेगा। किसान आंदोलन के बाद से ही भाजपा सिख विरोधी दल होने की धारणा का शिकार रही है। तीन कृषि कानूनों को विपक्ष ने मोदी सरकार की कमजोरी बताया है, हालांकि ऐसा है भी लेकिन मोदी सरकार के इस निर्णय को ऐसे भी देखा जाना चाहिए कि उसने जनमत का सम्मान किया है। कृषि कानूनों में संशोधन की जरूरत बताई गई थी लेकिन बाद में किसान इन्हें वापस लेने पर ही अड़ गए। वास्तव में राजनीति ने किसानों की तरक्की के रास्ते बंद करवा दिए हैं। केंद्र सरकार ने अब भी कृषि सुधार का अपना रास्ता खुला रखा है, यही वजह है कि उन विपक्षी नेताओं को जोकि नया मंच तलाश रहे हैं, अब भाजपा बुरी नहीं लग रही। हालांकि अगली बार मोदी सरकार को सभी को विश्वास में लेकर कृषि सुधार के लिए प्रयास करने होंगे। यही समय की मांग है। 


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