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भारतीय मूल की अमेरिकी छात्रा ने अनूठे ढंग से किया स्कूल की छुट्टियों का उपयोग

हिसार(प्रवीन कुमार): 15 वर्षीय हाई स्कूल की छात्रा रेहा जैन ने संयुक्त राज्य अमेरिका से हिसार पहुंचकर अनूठे ढंग से अपनी स्कूल की छुट्टियों का उपयोग किया। वह अमेरिका से हिसार आकर अनाथ बच्चों की मदद के लिए एक प्रोजेक्ट शुरु करने के उद्देश्य से शैशवकुंज अनाथ आश्रम के बच्चों के बीच पहुंची। यहां तीन दिनों तक अनाथ बच्चों के बीच रहकर उनकी समस्याओं और उनकी उम्मीदों को समझा। रेहा ने बताया कि वह अनाथ बच्चों की मदद के उद्देश्य से ‘अमन’ नाम से एक प्रोजेक्ट शुरु करने जा रही है।

इस प्रोजेक्ट के तहत वह एक वेबसाइट बनाकर उस पर इन अनाथ बच्चों की कहानी डालेगी। उस वेबसाइट के जरिये वह इन बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए फंड रेजिंग का काम करेगी। रेहा ने बताया कि उसने इस प्रोजेक्ट का नाम ‘अमन’ इसलिए रखा क्योंकि जब वह पहले दिन इस अनाथआश्रम में पहुंची तो उसने सबसे पहले 2 वर्षीय एक अनाथ बच्चे अमन से मुलाकात की। इस दो साल के अमन को उसकी मां ने सिर्फ 3 हजार रुपये के लिए किसी को बेच दिया था और इस बच्चे के हाथ व पैर भी काम नहीं करते। वह ये सोच कर काफी निराश हुयी कि जब इस बच्चे को पता लगेगा कि उसकी मां ने उसके और तीन हजार रुपये के बीच में से तीन हजार रुपये को चुना तो उसपर क्या बीतेगी। निशक्त और अनाथ होने के बावजूद वह उसे देखकर हंसने लगा। बस इसी बच्चे की बहादुरी को देखकर उसने अपने प्रोजेक्ट का नाम अमन रख दिया।

रेहा हांसी के राज परिवार से ताल्लुक रखती है और उसके पिता नमित जैन पिछले कई सालों से अमेरिका में नौकरी कर रहे हैं। उसका जन्म अमेरिका में ही हुआ था। उसका परिवार पिछले कई सालों से शैशवकुंज अनाथआश्रम को आर्थिक मदद दे रहा है। वह भी अपने इस परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अनाथ बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थी। बच्चों की मदद के लिए प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले उसके मन में यही ख्याल था कि अपने भविष्य के लिए जो अवसर उसे मिल रहे हैं वैसे ही अवसर के लायक से अनाथ बच्चे हैं। मगर, ऐसे अवसर उनके पास फिलहाल नहीं हैं कि वो अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकें। पहले उसका यहां आने का उद्देश्य अनाथआश्रम की एक डॉक्युमेंट्री बनाना था लेकिन जब यहां आकर इन बच्चों से उसने बात की तो उनकी मदद करने का मन में ख्याल आया। यहां उसने बच्चों से उनके जीवन के बारे में पूछा तो उनके उम्मीदों और सपनों को सुनकर उन्हें पूरा करने की दिशा में कार्य करने का मन किया। वह वास्तव में उन्हें अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध करवाना चाहती है।

आखिरकार दुनिया को ऐसे और लोगों की आवश्यकता है जो वही करते हैं जो उन्हें करना अच्छा लगता है। उसने अपनी डॉक्युमेंट्री के लिए एक स्टाफ सदस्य से बात की तो यह जानकर हैरानी हुयी कि शैशव कुंज के 41 बच्चों में से केवल 5 बच्चों को ही परिवार की देखभाल मिल पायी है। अबतक केवल 5 बच्चों को ही यहां से गोद लिया गया है। उसने कहा कि ये काफी दुखद है लेकिन गोद लिए गये बच्चों की ये कम संख्या उसे इनकी मदद करने के लिए और अधिक प्रोत्साहन प्रदान करती है। अब उसकी प्राथमिकता निश्चित रूप से इन बच्चों की शिक्षा है क्योंकि उनके द्वारा प्राप्त की गयी शिक्षा और जहां से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की है वह संस्थान ही उनका भविष्य तय करता है।

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