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परमाणु उर्जा को लेकर जन जागरुकता अभियान चलाया गया

हिसार(प्रवीन कुमार): जलवायु परिवर्तन में नाभिकीय ऊर्जा किस प्रकार प्रभावी हो सकती है। इस विषय पर एक जागरूकता कार्यक्रम बरवाला के सरकारी तथा गैर सरकारी स्कूल में परमाणु के प्रति जनजागरुकता अभियान चलाया गया। यह कार्यक्रम भारत सरकार के उपक्रम न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ इंडिया द्वारा आयोजित किया गया। कार्यक्रम का संचालन धर्मपाल ने किया। धर्मपाल ने जारुकता अभियान के तहत कहा कि जब हम पारम्परिक ईंधन की बात करते हैं तो आम तौर पर हम एक ऐसे पदार्थ के बारे में सोचते हैं जो ज्वलनशील है और उससे ऊष्मा निकलती है, जिसे कई प्रकार से इस्तमाल किया जाता है. हमारे चारों ओर विभिन्न प्रकार के इंधन को जला कर उससे जो ऊर्जा उत्पन्न होती है वह ऊष्मा के रूप में प्रयुक्त होती है. पारम्परिक इंधन से अर्थ है लकड़ी, चारकोल, पेट्रोल, डीजल, गैस आदि. इसीलिए हम ऐसा सोचते हैं कि ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए ऊर्जा उत्पादन के सभी तरीकों में किसी पदार्थ का जलना जरूरी होता है|

वास्तव में ज्वलन वह प्रक्रिया है जिसमे किसी पदार्थ की ऑक्सीजन गैस के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया की वजह से ऊष्मा और प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है. लेकिन सामान्यत: यह जानकारी नहीं होती कि ऊर्जा का उत्पादन बिना किसी रासायनिक प्रज्वलन के भी हो सकता है. किसी नाभिकीय इंधन से ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया मूलत: एक बिलकुल अलग प्रकार की घटना है। उन्होंने कहा कि जिसमे किसी प्रकार का प्रज्वलन या रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं होती. यह जानने के लिए पहले पारम्परिक इंधन के प्रज्वलन की प्रक्रिया को समझना जरुरी है. किसी पदार्थ के परमाणु या अणु के इलेक्ट्रान के साथ सम्मिश्रण की वजह से रासायनिक प्रतिक्रिया होती है. यानी कि किसी रासायनिक प्रतिक्रिया में इलेक्ट्रान की भूमिका होती है. इलेक्ट्रान एक सूक्ष्म परमाणु न्यूक्लियस (नाभिक) के चारों ओर परिक्रमा करते हैं. प्रक्रिया में केवल इलेक्ट्रान की भूमिका होती है और नाभिक किसी भी प्रकार की रासायनिक प्रतिक्रिया में संलिप्त नहीं होता और इससे पूर्णत: अप्रभावित रहता है. एक रासायनिक प्रतिक्रिया में यही होता है. पारम्परिक अथवा जीवाश्म इंधन (कोयला, पेट्रोलियम आदि) का प्रज्वलन एक रासायनिक प्रतिक्रिया है। धर्मपाल ने बतया कि कोयले का ही उदाहरण लें, जो बिजली उत्पादन के लिए सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाला इंधन है| इसके जलने की प्रक्रिया में कार्बन का एक परमाणु, हवा में उपलब्ध ऑक्सीजन के एक अणु के साथ रासायनिक रूप से जुड़ता है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का एक अणु बनता है|

चूँकि यह एक ऐसी रासायनिक प्रतिक्रिया है जिसमे ऊष्मा निकलती है, इसलिए कोयले (यानी कार्बन का एक प्रकार) को ऊर्जा के स्त्रोत के रूप में इस्तमाल किया जा सकता है. कोयला पृथ्वी पर काफी बड़े क्षेत्र में पाया जाता है और इसे धरती के अन्दर से निकालना अपेक्षाकृत आसान है. यही कारण है कि कोयला लम्बे समय से दुनिया में ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत रहा है. अन्य जीवाश्म इंधन, जैसे तेल व गैस में भी कार्बन होता है और उनका प्रज्वलन भी उसी प्रकार होता है, उनसे भी ऊर्जा उत्पन्न होती है और नुकसानदायक गैसें, जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, आदि उत्सर्जित होती हैं उन्होंने बताया कि सच तो यह है कि जीवाश्म इंधन वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के सबसे बड़ा स्त्रोत हैं. और कार्बन डाइऑक्साइड ही मानव द्वारा जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक है. इस प्रकार हम जितना ज्यादा जीवाश्म इंधन का उपयोग करते हैं, हमारी पृथ्वी उतना ही ज्यादा गर्म होती है, जिसका गंभीर परिणाम हमारे वर्तमान और भविष्य पर पड़ रहा है. जीवाश्म इंधनों का यही सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू है।

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