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महानता तभी है जब इंसान अपने कर्तव्यों का पालन शांति से करे : निरंकारी बाबा

इन्सान का यह भ्रम है कि मैं यदि जंगलों वीरानों में जाकर डेरे लगा लूं, परिवार से नाता तोड़ लूं, तो सबसे छुटकारा प्राप्त करके, मैं शान्त हो जाऊंगा। यहां तो मुझे क्रोध भी आता है, यहां तो लालच भी आ जाता है, चहां तो और कई विकार भी हावी हो जाती हैं, तो वहां सभी से छुटकारा मिल जाएगा। लेकिन यह ठीक नहीं। क्योंकि किसी महात्मा ने गृह त्याग का मार्ग नहीं बतलाया। हां गृहस्थ में रहते हुए भी आसक्ति का त्याग जरुर होना चाहिए।

गुरु साहिब अपने प्रचार यात्रा करते हुए जंगलों से गुजर रहे थे। वहां एक इंसान आंखे बन्द करके समाधि लगाए बैठा हुआ था। महात्मा उसके पास गये। जब वह समाधि से बाहर आया, आंखें खोली तो उससे पूछा कि ‘आप यहां पर क्या कर रहे हैं?Ó वह कहने लगा कि ‘मैं यहां प्रभु प्राप्ति के लिए सभी बंधनों को छोड़कर आया हूँ। जब मैं परिवार में था, तो सब विकार मुझे सताते थे। अब न मुझे लालच है, न क्रोध है। कुछ भी तो नहीं, अब मैं बहुत शांत हूंÓ महापुरुष ने समझया कि ‘यह कोई महानता नहीं। महानता तो तभी है जब इंसान अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए शांत रहे।

यह तो कोई भक्ति नहीं, बहादुरी नहीं।Ó वह कहने लगा कि नहीं, मैंने अपना सही अनुभव बतलाया है। इतनी देर से उसने फिर आंखें बन्द कर लीं, समाधि में चला गया। जो महात्मा उसे समझा रहे थे, उन्होंने उसके आगे से लोटा उठाकर थोड़ी दूर पेड़ के नीचे रख दिया। जब वह समाधि से बाहर आया, आंखें खोली तो क्या देखा कि सामने जो लोटा था, वह नहीं। उसी वक्त गाली-गलोच शुरु हो गई। कहने लगा कि जिसने मेरा लोटा चुराया है, उसका सर्वनाश हो जाए, उसका कुछ न रहे। जितना कह सकता था, कह दिया। तब महात्मा ने मुस्कुरा कर कहा कि अभी थोड़ी देर पहले तू कह रहा थाकि मेरा क्रोध समाप्त हो गया है, लेकिन एक लोटा ही आंखों से ओझल होने पर तुझे इतना क्रोध आ गया है। तू निरलेप कहां हुआ है?

वास्तव में महानता उसी की है, जो सभी कर्मों को निभाता हुआ, निरलेप अवस्था में रहता है। जैसे कमल का फूल पानी में रहता है, जल में रहता है, जल में रहकर भी उस ज से न्यारा रहता है, उसकी निरलेप अवस्था रहती है। कोई समझाने के लिए कहे कि कमल के फूल को अगर निरलेप रहना है, तो उसे उठाकर किसी कमरे में बन्द कर दीजिए, किसी खास स्थान पर रख दीजिए। तब वह खुद पानी से निरलेप हो जायेगा। अगर पानी ही नहीं है, तो निरलेप किससे होगा? उसके निरलेप रहने की परख तो तभी होगी जब वह पानी में रहकर निरलेप रहकर दिखाएगा। वह पानी में मौजूद रहे, तभी तो मालूम पड़े कि वह कितना निरलेप रह सकता है? इसी तरह भक्तों की, महापुरुषों की भावना रही है। भक्त इसी समाज में रहे हैं और अपने फर्जों को निरलेप रहकर निभाते रहे हैं।

वे चाहे किसी युग में सेसार में आये, उन्होंने कर्मों से मुख नहीं मोड़ा। वे अपने परिवार में रहे और हर प्रकार के कर्तव्यों की पालना की और यह सब कुछ करते हुए भी उनकी निरलेप अवस्था बनी रही।एक राजा और रानी थे। दोनों को ध्यान आया कि माया को छोड़कर कहीं चले जायें। दोनों चल दिए तो रास्ते में राजा की नज़ऱ एक सोने के टुकड़े पर पड़ी। ज्यों ही सने सोने का टुकड़ा देखा, फटाफट मिट्टी उठाकरउसके ऊपर डाल दी, ताकि वह सोने का डुकड़ा दिखाई न दे।

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