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गांधी जी और एक फैसले का पलटना

गांधी जी को हम लोग कब याद करते हैं? लगभग हर उस क्षण जब बात नीति की हो, सदाचार की हो, समानता की हो, गांव-देहात की तरक्की की हो, शिक्षा की हो, गरीब की हो, महिला की हो और दलित की हो। गांधी जी की जितनी आलोचना होती है, जिस तरह से होती है, शायद ही किसी समाज सुधारक की होती हो। 2 अक्तूबर को जब देश गांधी जी को उनके जन्मदिन पर याद कर रहा था तब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को भी इस दौरान पढ़ा और सराहा जा रहा था। डेढ़ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने दलितों को लेकर एक फैसला सुनाया था, जोकि यह था कि दलित वर्ग पर होने वाले अत्याचार के मामले में आरोपी की तुरंत गिरफ़्तारी नहीं होगी। इस फैसले में और भी सवाल थे, जिन्होंने देश भर के दलित समाज को उद्धेलित कर दिया था। सड़कों पर उतरे लोगों ने इस फैसले को पलटने की मांग की थी। देश की सर्वोच्च अदालत कोई फैसला दे और जनता उसके विरोध में उतर आए, दुहाई दे कि जनाब! जो फैसला आप दे रहे हो, वह नाइंसाफी है, इस पर फिर से विचार हो। यह बेहद विस्मयकारी घटना थी।

खैर, केंद्र सरकार का दिल पसीजा था, न जाने दलित वोट बैंक का प्रभाव था या फिर हकीकत का अंदाजा। सरकार ने पुनर्विचार याचिका कर दी थी। अब एक अक्तूबर को यानी गांधी जयंती से एक दिन पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने इस फैसले को पलट दिया। हालांकि इससे पहले अगस्त 2018 में केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन करके कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी कर दिया था। अब अपने ही फैसले को पलटते हुए कोर्ट ने जो टिप्पणी की है, वह इसका सबूत है कि देश में दलित समाज को लेकर जो राय जाहिर की जाती है, वह कितनी भ्रामक है। बात आरक्षण की हो तब यह कहा जाता है कि दलित अब आरक्षण का सुख बहुत भोग चुके, बात उनकी सामाजिक सुरक्षा की हो, तब भी यही कहा जाता है कि दलित अब क्रीमीलेयर हो चुका है आदि। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने समाज के चौथे पायदान पर खड़े दलित वर्ग की इस पीड़ा को शब्द दिए हैं। उसका कहना है कि समानता के लिए एससी-एसटी वर्ग का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है, वह छुआछुत, दुव्र्यवहार और सामाजिक बहिष्कार झेल रहा है। यह मानकर नहीं चल सकते कि पूरी बिरादरी ही कानून का गलत इस्तेमाल करेगी।

आजादी के 72 सालों बाद भी जब देश में कानून का शासन है और लोकतंत्र कायम है, अगर तब भी सुप्रीम कोर्ट यह स्वीकार करते हुए इस बात को पुरजोर तरीके से कहता है कि एसटी-एसटी वर्ग का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है तो यह बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। यह सवाल हमारे पूरे सामाजिक तंत्र और शासन प्रणाली पर है। गौरतलब है कि संविधान ने एससी-एसटी वर्ग के जीवन और स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के मकसद से एससी-एसटी एक्ट का गठन किया था। हालांकि समाज का उच्च वर्ग दलित समाज पर इस एक्ट के दुरुपयोग का आरोप लगाता रहा है, सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले का आधार यही था। अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने जो बात कही है, वह यह है कि झूठा मुकदमा कोई भी व्यक्ति दर्ज करवा सकता है, इससे किसी जाति का लेना-देना नहीं है। कोर्ट ने एनसीआरबी के आंकड़े भी सामने रखे हैं जिनके मुताबिक 2016 में एससी-एसटी के तहत 47 हजार से अधिक केस दर्ज हुए। इतने केस कानून के दुरुपयोग की वजह से दर्ज नहीं हो सकते।

वास्तव में गांधी जयंती मनाने का मकसद सिर्फ अखबारों में लेख लिखना, शानदार मंचों पर बैठकर गांधी जी के जीवन पर खूबसूरत सी बातें करना, उनका प्रिय भजन सुनते हुए एक आदर्श समाज की परिकल्पना में गोते लगाना नहीं होना चाहिए। गांधी जी आज न हों, लेकिन जातिवाद आज भी जिंदा है। छुआछुत की सोच आज भी कायम है, बेशक बहुत से लोगों की इसे न स्वीकार करने की मजबूरी दिखे। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यही कहा है, उनके अनुसार आज भी बंधुआ मजदूर हैं, महिलाओं के साथ मर्यादित व्यवहार नहीं होता। दलित गटर की सफाई करते मर जाते हैं, हम इनके लिए ऑक्सीजन सिलेंडर तक का इंतजाम नहीं कर पाए। कोर्ट ने कहा कि दलितों ने लंबे समय तक पीड़ा झेली है, हम उन्हें संरक्षण नहीं दे सकते तो असमानता के हालात भी नहीं बना सकते। दरअसल, इस फैसले को बेहद सकारात्मक रूप से देखे जाने की जरूरत है, ऐसे तत्व हर जाति और धर्म में मिलेंगे जिनका काम माहौल को बिगाडऩा और कानून का निजी हित में फायदा उठाना है, लेकिन इन्हीं जातियों और धर्मों में ऐसे कितने ही लोग होंगे जोकि अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को कायम रखने की लड़ाई इन्हीं कानूनों के साए में लड़ते हैं। गांधी जी के बताए मार्ग पर चलते हुए हम सामाजिक बेडिय़ों को तोडऩे का साहस दिखा पाएं तो यह उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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