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Thursday, October 18, 2018
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वन विभाग ने वानरों को पकडऩे के लिए तैनात किए पेशेवर दल, शहर में हैं 1700 से अधिक वानर

वन विभाग ने वानरों को पकडऩे के लिए तैनात किए पेशेवर दल, शहर में हैं 1700 से अधिक वानर

शिमला। हिमाचल प्रदेश में वानरों की समस्या से निजात पाने के लिए राज्य वन विभाग के वन्य प्राणी प्रभाग द्वारा शिमला शहर में एक अध्ययन किया गया है जिसमें वानरों के वासस्थलों, खाद्य-स्थलों तथा वानरों की दिनचर्या को जीपीएस तथा फोटो द्वारा वानरों के मूलधार आंकड़ों का संकलन किया गया। यह प्रदेश का इस प्रकार का पहला वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किया गया प्रयास है।

राज्य वन विभाग के एक प्रवक्ता ने आज यहां इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि इस कार्य के लिए विभाग की चार टीमों का गठन किया गया जिसमें वन रक्षक तथा ईको-टास्क फोर्स के कर्मचारी सम्मिलित थे। शिमला शहर के 31 वार्डों मं आंकलन करने में ढाई माह का समय लगा।

अध्ययन में पाया गया कि शिमला में 1700 से अधिक संख्या में लगभग 49 वानरों के समूह वास करते हैं। इनमें सबसे बड़े समूह में लगभग 73 वानर तथा सब से छोटे समूह में 15 वानर हैं। क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा समूह खलीनी से कन्या नेहरु हस्पताल तक विचरण करता है। क्षेत्रफल के आधार पर सबसे छोटा क्षेत्र ढांडा के वानर समूह का पाया गया जो कि वहीं पर स्थित कूड़े के स्थान पर वास करता है। यह भी पाया गया कि वानरों के समूह अपने निर्धारित राह पर ही दिनभर विचरण करके रात को अपने वासस्थल पर विश्राम करते हैं।

शहर में लगभग 83 कूड़ादान मौजूद हैं जिनमें से लगभग 45 कूड़ादानों पर वानर हर समय मौजूद रहते हैं। इसके अलावा शहर में लगभग 30 खूले स्थानों पर कूड़ा फैंका जाता है। इन सभी कूड़ा फैंकने के स्थानों पर न केवल वानर अपितु लंगूर, कुत्ते तथा अन्य आवारा जानवर भी मौजूद रहते हैं।

अध्ययन के अनुसार वानर समूह के अल्फा वानर सबसे पहले भोजन ग्रहण करते हैं। अन्य वानरों, खासतौर से छोटे वानरों को भोजन ग्रहण करने का मौका बाद में मिलता है। छोटे वानरों इत्यादि को भरपेट भोजन उपलब्ध नही होता है तथा इसी श्रेणी के वानर औरतों तथा बच्चों पर आक्रमण करते हैं। साथ ही कूड़े द्वारा वानरों के दैनिक जरुरत का अधिकांश भाग थोड़े से ही फैंके गए भोजन से पूरा हो जाता है जिसके कारण बाकी के दिन में यह वानर उत्पात मचाते रहते हैं। यदि कभी प्रचुर मात्रा में वानरों को भोजन उपलब्ध न हो तो वानर समीप के हरित क्षेत्र में पलायन करके वन्स्पति आधारित भोजन की तलाश में रहते हैं। यह भी पाया गया कि शिमला शहर में वानरों के समूह संयोजित ढंग से लगभग वन्स्पति की 25 प्रजातियों पर निर्भर करते हैं जिसके खाने से यह अपना न केवल पेट भरते हैं अपितु अपने लिए विटामिन इत्यादि का भी संयोजन करते हैं। यदि शहर के सभी कूड़ा फैंकने के स्थलों पर कूड़ा उपलब्ध न हो तो यह वानर कुछ ही समय में भोजन की तलाश में हरित क्षेत्रों में स्थाई रुप पलायन करते हैं।

राज्य सरकार के निर्देशानुसार वानरों को उनके समूह के आधार पर उनके वासस्थल तथा खाद्य स्थलों पर ही नसबन्दी हेतु पकडऩे के लिए पेशेवर टीमों को कार्य पर लगाया गया है। यह पहली बार है कि वानरों को पकडऩे के लिए जहां-जहां संम्भव है, जाल उपयोग में लाया जा रहा है क्योंकि यह पिंजरे द्वारा वानरों को पकडऩा मुश्किल है। वन रक्षकों की देश-रेख में वानर पकडऩे की टीमें कार्य कर रही हैं ताकि पहले से संयोजित डेटा के आधार पर ही वानरों को पकड़ा जाऐ। वानरों को पकडऩे का कार्य प्रात: 5-6 बजे शुरु कर दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि वन विभाग द्वारा वानरों को पकडऩे की राशि में भी संशोधन किया है ताकि वानर पकडऩे वाली टीमों को इस अभियान की ओर आकर्षित किया जा सके।

वन्य प्राणी प्रभाग वानरों के व्यवहार तथा विभाग वानरों की समस्या से निपटने के लिए उठाये गये कदमों पर एक वृतचित्र भी तैयार किया जा रहा है ताकि जनता के सहयोग से इस समस्या का स्थाई समाधान ढूंढा जा सके।

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