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सफलता के दायरे को करे ऊंचा : मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक

आमतौर पर समाज मे यह धारणा है कि सफल व्यक्ति बहुत सुखी होता है, हमेशा आंनद मे रहता है और हमेशा प्रसन्नचित रहता है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर व्यक्ति के लिए सफलता के अलग अलग मायने हे। यहां तक कि सफलता को इतना संकीर्ण ओर छोटा मान लिया जाता है कि छोटी-छोटी राशि प्राप्ति करने को ही लोग सफलता कहने लगता है। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 24सी अणुव्रत भवन तुलसी सभागार मे सभा को संबोधित करते हुए कहे।

मनीषी श्रीसंत ने कहा-सफलता का सीधा संम्बध सुख नहीं है बल्कि सीधा संबंध तो कुछ प्राप्ति से है और प्राप्ति कभी भी स्थायी सुख नहीं दे सकती, स्थाई आत्मियता नहीं दे सकती क्योंकि किसी एक प्राप्ति की खुशी कुछ ही समय के उपरांत दुख और बेचैनी में बदलने लगती है। स्थायी सफलता आपके मन की शांति है, आपके मन में आंनद है आपके हर पल की खुशी है और मन की खुशी के सामने, मन के सुख के सामने सारी सफलताएं या यौं कहे बडी से बड़ी सफलता भी बौनी हो जाती है। विश्वास है तो जिंदगी की गाडी दौड़ती ही जाती है ओर इसके विपरित अगर विश्वासघात हो जाए तो दौडती हुई गाड़ी में हमेशा के लिए ब्रेक लग जाते है।

जिंदगी मे विश्वास आस जगाता है, विश्वासघात आघात देता है, एक तरफ विश्वास घर परिवार, समाज,देता है और दुनिया से जोड़ता है तो दूसरी तरफ विश्वासघात अंदर तक तोडता है। भूल होना स्वाभिक है लेकिन एक भूल को बार बार दोहराना अस्वाभिक ही नहीं, वरन गलती और अपराध की श्रेणी मे आता है। मनीषी श्रीसंत ने आगे कहा- खूबसूरत बनने के लिए खूबसूरत करना पडता है और खूबसूरत करने के लिए खूबसूरत सोच सृजित करनी पड़ती है और खूबसूरत सोच का दूसरा नाम खूबसूरत विचार है और खूबसूरत विचार खूबसूरत संस्कार से आते हैं और खूबसूरत संस्कार ही जीवन के सार है।

गलती हो जाने को दिल से स्वीकार करना वास्तव मे स्वंय को क्षमा कर देना होता है और जो ऐसा करता है वह कभी एक गलती को दुबारा से नहीं करता है। दूसरों की गलती केा जिससे आपको चोट पहुंची है, उसे माफ करना भी अपने आप मे बड़ी बात है क्योंकि यही पर मानवता की असली परीक्षा होती है। चुनौतियां ही चरित्र को चमकाती है क्योकि चुनौतियां ने ही आज तक सारे अविष्कार और बड़े बड़े कारनामे किए है। मनीषी श्री संत ने अंत मे फरमाया- जीवन के टुकडों मे सफलता खोजते है जबकि समग्र सफल जीवन का नाम ही सफलता है। भौतिक सम्पति, पद पतिष्ठा और किसी तरह सम्मान पाना जीवन के लक्ष्य का कोई हिस्सा हो सकता है, जीवन का सम्पूर्ण लक्ष्य या जीवन का सबसे बडा मकसद नहीं हो सकता है। एक बात और है यदि कोई व्यक्ति केवल धन के लिए प्रयास करेगा और उसे पाना अपनी सफलता मानेगा तो इस प्राप्ति के बाद उसे अगले क्षण बैचेनी शुरू हो जाएगी और वह फिर से जुट जाएगा किसी दूसरी सफलता को साधने में। सफलता को किस अर्थ मे लिया जा रहा है, सफलता को किस मकसद से हासिल किया जा रहा है।

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