बीते कल में हमने क्या खोया : मुनिश्री विनय कुमार - Arth Parkash
Saturday, March 23, 2019
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बीते कल में हमने क्या खोया : मुनिश्री विनय कुमार

बीते कल में हमने क्या खोया : मुनिश्री विनय कुमार

हम सब अच्छे जीवन, सफलता और शुभ-श्रेयस्कर होने की कामना करते हैं लेकिन जीवन तो उतार-चढ़ाव का खेल है। हम सभी कभी न कभी अवसाद और तनाव से आहत होते हैं तो कभी दुखों से हमारा साक्षात्कार होता है। दुखों एवं पीड़ाओं का एहसास निरन्तर बना रहता है। जिंदगी में हमेशा सब कुछ अच्छा और सही ही हो, कहां होता है। जिंदगी पूरी तरह परफेक्ट न होती है, न होगी। व्यापार, नौकरी, सेहत या रिश्ते, कोई न कोई परेशानी चलती ही रहती है। लेखक तोबा बीटा कहते हैं-कोशिशें हमें बिल्कुल सही नहीं कर देतीं। वे केवल हमारी गलतियों को कम कर देती हैं। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जीआलोक ने अणुव्रत भवन सैक्टर-24 के तुलसी सभागार में कहे। मनीषी श्रीसंत ने आगे कहा हर सुबह को हम इस सोच और संकल्प के साथ शुरू करते हैं कि हमें अपने व्यक्तित्व निर्माण में कुछ नया करना है, नया बनना है। पर क्या हमने निर्माण की प्रक्रिया में नए पदचिन्ह स्थापित करने का प्रयत्न किया? क्या ऐसा कुछ कर सके कि ‘आज की आंख में हमारे कर्तृत्व का कद ऊंचा उठ सके? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भी आम आदमी की तरह यही कहें कि क्या करें, समय ने साथ नहीं दिया। यदि ऐसा हुआ तो हम फिर एक बार आईने में स्वयं का चेहरा देखकर उसे न पहचानने की भूल कर बैठेंगे।

मनीषी श्रीसंत ने कहा ‘बीते कल में हमने क्या खोया, क्या पाया इस गणित को हम एक बार रहने दें अन्यथा असफल महत्वाकांक्षायें, लापरवाह प्रयत्न, कमजोर निर्णय और अधूरे सपने हमारे रास्ते की रोशनी छीन लेंगे। निराशा से हमें भर देंगे। इसलिए आज तो सिर्फ जीवन के इस आदर्श को सार्थकता देनी है कि ‘हमें वही बनना है जो सच में हम हैं।Ó क्योंकि सारी समस्या का मूल यही है कि हम जो दिखते हैं, वे सच में होते नहीं और जीवन के इस दोहरेपन में सारी श्रेष्ठताएं अपना अर्थ खो बैठती हैं। आज इन पंक्तियों की सच्चाई को कौन नकारेगा कि ‘गरीब की गरिमा, सादगी का सौंदर्य, संघर्ष का हर्ष, समता का स्वाद और आस्था का आनंद, ये सब आचरण से पतझड़ के पत्तों की तरह झड़ गये हैं।

मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया जरूरी नहीं कि किसी अन्य के अपने बनाए नियम आप पर भी सही साबित हों। परेशानी तब आती है, जब हम बिना सोचे-समझे दूसरे का अनुसरण करने लगते हैं। इसके बजाय हमें हमेशा अपनी जड़ों, अपने विचारों पर विश्वास रखना चाहिए। हम अपनी गलतियां नहीं देखते, पर दूसरों की गलतियों पर ज्यादा ही कठोर हो जाते हैं। होना यह चाहिए कि हम अपनी गलतियों के लिए भले कठोर हो जाएं, पर दूसरों को आसानी से माफ कर दें। यूं कभी-कभी दूसरों को परखना पड़ जाता है, पर उसके लिए जरूरी है मन का पूर्वाग्रह से मुक्त होना। लेखक क्रिस जैमी कहते हैं, ‘किसी को जानना-समझना मुश्किल नहीं है। मुश्किल अपने पूर्वाग्रहों को परे रखना है।

समय के साथ आदमी बदलता है मगर जीवन मूल्य नहीं। दायरे और दिशायें बदलती हैं मगर आदर्श तथा उद्देश्य नहीं। बदलने की यह बात जीवन का सापेक्ष दर्शन है। आज वक्त को ऐसे आदमी की प्रतीक्षा है जो बदलने में विश्वास रखता हो, बदलने के लिए प्रतिज्ञा और प्रयत्न करता हो। जो यह जानता हो कि बुराइयों की जड़ें दूब-सी कमजोर और शीघ्र फैलने वाली होते हुए भी हमारे सक्षम हाथ उन्हें क्यों नहीं उखाड़ पाते? जो मौलिकता और निर्भयता के साथ समय पर सही दिशा में सोचता हो। जिसकी संवेदनशीलता में करुणा, संतुलन, धैर्य और विवेक जुड़ा हो ताकि सुख सिमट न सके और स्वार्थ फैल न सके। जो जानता हो शक्ति का सही नियोजन करना। समय के साथ निर्माण के लिए हस्ताक्षर करना। संभावनाओं को सफल परिणाम में बदलना।शुभ के स्वप्न को अगर आकार देना है तो भगवान महावीर के इस संदेश को जीवन से जोडऩा होगा-‘खणं जाणाहि पंडिएÓ-हम क्षणजीवी बनें। न अतीत की चिंता, न भविष्य की कल्पना। सिर्फ ‘आजÓ को जीने का अप्रमत्त प्रयत्न करें। जिंदगी है तो चुनौतियां होंगी ही। कुछ चुनौतियों से आप आसानी से पार पा लेते हैं, पर कुछ आपसे खुद को बदलने की मांग करती हैं।कोई घटना हो, व्यक्ति या फिर वस्तु, हम दो तरह से चीजों को देखते हैं। कभी हम पर प्यार का चश्मा चढ़ा होता है तो कभी डर का। लैंस बदलते ही हमारी पूरी सोच बदल जाती है। डर चीजों को एक रूप दे रहा होता है तो प्रेम एक अलग ही धरातल। हम टूट न जाएं, कोई बेवकूफ न बना दे, इस डर से ताउम्र खुद को कठोर बनाने में लगे रहते हैं। दुखों को दबाए खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करते रहते हैं।


लेखक सी जॉयबेल कहते हैं, ‘कठोर चीजें ही पहले टूटती हैं, मुलायम नहीं। कड चीजें तो जरा-सी चोट में टुकड़े-टुकड़े हो जाती हैं। कुछ नया करने की चाहत रखने वाले सवालों से नहीं डरते। थोड़ी जमीन मिलते ही वे जिज्ञासाओं के पंख फैलाने लगते हैं। ऐसा नहीं कि वे सिर्फ दूसरों से सवाल पूछते हैं, जरूरत होने पर खुद से भी सवाल करते हैं। यह रास्ता उन्हें अपने लक्ष्यों और सपनों के करीब ले जाता है। यही इनसान के लिये उजली सुबह होती है।

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