सीबीआई निदेशक वर्मा की अधूरी जीत - Arth Parkash
Sunday, January 20, 2019
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सीबीआई निदेशक वर्मा की अधूरी जीत

सीबीआई निदेशक वर्मा की अधूरी जीत

क्या इसे सरकार की हार कहा जाए? सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा को जबर

अवकाश पर भेजने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया। 75 दिन बाद वर्मा को उनकी कुर्सी मिल गई- ससम्मान। अब उनके कार्यकाल के 23 दिन बचे हैं और इन दिनों में वे कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकेंगे। वर्मा के संबंध में फैसला देते हुए माननीय कोर्ट ने कहा कि सरकार ने गलत तरीके से उन्हें हटाया था। मंगलवार को आए इस फैसले के बाद बुधवार को आलोक वर्मा ने फिर से सीबीआई डायरेक्टर का पदभार ग्रहण कर लिया। अब इस मसले पर सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। वर्मा को अवकाश पर भेजे जाने के बाद विपक्ष हमलावर हो गया था और उसका आरोप था कि अपने चहेते की जगह बनाने के लिए वर्मा को जबरन अवकाश पर भेजा गया। गौरतलब है कि वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने हाईपावर्ड कमेटी को इन आरोपों के संबंध में फैसला लेने के आदेश दिए हैं।


देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई के अंदर यह अपने तरह का पहला मामला था, जिसमें दो निदेशकों के बीच शक्तियों को लेकर घमासान हुआ। 23 अक्तूबर को वर्मा और सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को जबरन छुट्टी पर भेजा गया था। इसके बाद आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। कॉमन कॉज़ नामक एक गैरसरकारी संस्था ने भी सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस फैसले के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने कहा कि सरकार अपने लोगों की जगह बनाने की कोशिश कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्वागत योग्य है, यह सरकार के लिए एक सबक की तरह है कि अगर वो गलत करेंगे तो कोर्ट उन्हें बख्शेगा नहीं। दरअसल, सीबीआई निदेशक के संबंध में देश की हाईपावर्ड कमेटी जिसमें प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष शामिल हैं, की सिफारिश अहम है और माननीय अदालत ने यही कहा है कि कमेटी की सिफारिश के बिना वर्मा को अवकाश पर भेजा गया।


हालांकि केंद्र सरकार ने अपने बचाव में कहा है कि सीवीसी की सिफारिश पर दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने का फ़ैसला लिया गया था। उसकी दलील है कि सीबीआई की विश्वसनीयता, स्वायत्ता और प्रतिष्ठा को देखते हुए सरकार को ये फैसला लेना पड़ा था। बहरहाल, सरकार कितनी भी दलील पेश करे लेकिन विपक्ष को एक मजबूत आरोप हाथ लग ही चुका है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी का आरोप है कि वर्मा को रात के एक बजे हटाया गया, क्योंकि वे रफाल युद्धक विमानों की खरीद की जांच करने वाले थे। उनका आरोप है कि वर्मा जांच करते तो उसमें प्रधानमंत्री की भूमिका भी सामने आती, इसलिए वर्मा को रास्ते से हटा दिया गया था। वहीं अन्य विपक्षी दलों ने भी आग में घी डालते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत में किसी भी दूसरी सरकार ने ऐसा नहीं किया जिस तरह से मोदी सरकार संस्थाओं को समाप्त करने की कोशिश कर रही है, यह सरकार भारी भ्रष्टाचार से डरी हुई है और इसका शीर्ष नेतृत्व गलत काम करते हुए पकड़ा गया है।


सीबीआई को केंद्र सरकार का तोता कहा जाता है। सरकार जो कहेगी तोते को वही बोलना पड़ेगा। इस मसले ने देश की जांच एजेंसियों के संबंध में यह पुख्ता करने को जागरूक किया है कि उनकी आजादी और स्वायत्ता कायम रहे। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और घमासान की जगह ये जांच एजेंसी न बनें। इस केस में जो खामियां उजागर हुई हैं, वे बताती हैं कि केंद्र सरकार ने नियमों का पालन करते हुए सीबीआई निदेशक और स्पेशल निदेशक को अवकाश पर नहीं भेजा। इससे गलत संदेश गया और दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के सम्मान को भी ठेस पहुंची। वर्मा ने अपने इसी सम्मान को कायम रखने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ी। अब हाईपावर्ड कमेटी के समक्ष उनका मसला आएगा, जिस पर उसे 15 जनवरी से पहले फैसला लेना होगा। पूरा देश यह जानने को बेताब रहेगा कि वर्मा के संबंध में क्या फैसला लिया जाएगा।

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