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गंगा की शरण में (कांग्रेस) प्रियंका

कांग्रेस की तारणहार प्रियंका गांधी की पूर्वोत्तर यात्रा ने भाजपा और दूसरे विपक्षी दलों को बेचैन कर दिया है। जिस प्रदेश में कांग्रेस का वजूद ही नदी किनारे पड़ी सूखी रेत के समान हो गया हो, वहां पार्टी की नवनियुक्त महासचिव का पहुंचना पार्टी को जीवनदान दे रहा है। प्रयागराज से गंगा के किनारे अपनी तीन दिन की यात्रा पर निकली प्रियंका गांधी को देखने, सुनने लोगों का जमावड़ा लग रहा है, वे बेहद संयत और आम लोगों के बीच घुलमिलकर उनसे बात कर रही हैं, बीते काफी वर्षों में किसी नवनेता का यह रूप पहली बार देखने को मिला है। उनका विरोधी दलों के नेताओं की ओर से कैसा स्वागत किया गया है, यह उन बयानों को सुन कर मालूम किया जा सकता है जोकि राज्य की सत्ता में बैठे हैं। किसी महिला के प्रति ऐसे शब्दों और बयानों की कड़ी आलोचना की जानी चाहिए, हालांकि कांग्रेस महासचिव भी अपने तीखे बयानों से इन नेताओं को जवाब दे रही हैं। उनका यह कहना कि देश का संविधान संकट में है, इसलिए मुझे घर से बाहर निकलना पड़ा, अहम है। बेशक राजनीति में आए उन्हें मुश्किल से चंद रोज हुए हैं, लेकिन अपनी पार्टी के वजूद को बचाने के लिए अगर वे संविधान के संकट में होने की बात कहती हैं तब भी उनका यह राजनीतिक बयान चलेगा।

गंगा की धारा जीवनदायिनी है, यह जहां से होकर गुजरती है, वहां की जमीन सोना बनती जाती है। इसके किनारों पर बसे प्रयागराज, बनारस सभ्यता के अमर ठिकाने हैं, वहीं उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति के भी केंद्रस्थल बन चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तय कर चुके हैं कि वे अगला चुनाव भी बनारस से ही लड़ेंगे। बतौर सांसद उनका इस प्राचीन शहर पर पूरा फोकस रहा है, बीते वर्षों की तुलना में गंगा का जल भी ज्यादा साफ और स्वच्छ हुआ है, वहीं बनारस की प्राचीनता अब आधुनिकता में बदल रही है। ऐसे में यहां की जनता का दिल और दिमाग झंझोडऩे और कांग्रेस का ध्वज लहराने के लिए प्रियंका गांधी का यहां उतरना दिलचस्प है। वे गंगा में नाव से 100 किलोमीटर की यात्रा कर रही हैं, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गांव-देहात और छोटे कस्बों में उनका काफी जोश से स्वागत हो रहा है। लोग उनमें पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिरा गांधी का चेहरा तलाश रहे हैं। खैर, इसमें कोई राय भी नहीं है कि प्रियंका अपनी सादगी और स्नेहपूर्ण रवैये से बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं का ध्यान खींचने में कामयाब हो रही हैं। एक जननेता इसी तरह तैयार होता है, हालांकि फिर सवाल यह पूछा जा सकता है कि आखिर चुनाव के दिनों में ही कांग्रेस के वारिसों को गरीब लोगों के दर्शनों की इच्छा होती है।

बहरहाल, राज्य में बसपा प्रमुख मायावती कांग्रेस से बेहद नाराज हैं, वे रह-रहकर कांग्रेस को यह याद दिला रही हैं कि बसपा को उसका साथ किसी भी हालत में नहीं मिलने वाला। अब उन्होंने बेहद साफ शब्दों में दोहराया है कि यूपी समेत पूरे देश में कांग्रेस से तालमेल नहीं होगा। उन्होंने कांग्रेस को चुनौती भी दी है कि यूपी की सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर ले। गौरतलब है कि पिछले दिनों कांग्रेस की ओर से ऐसे बयान आए थे कि बसपा के लिए राज्य में 7 सीटें छोड़ी जा रही हैं, हालांकि मायावती ने इसके लिए कांग्रेस नेताओं को फटकारते हुए ऐसी भ्रांति फैलाना बंद करने को कहा है। दरअसल, सवाल यह है कि आखिर बसपा प्रमुख कांग्रेस से इतनी नाराज क्यों हो गई हैं? इसे समझने के लिए पिछले कुछ दिनों में आए बयान भी काफी हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की घोषणा के समय मायावती ने कहा था कांग्रेस अपने काडरवोट को ट्रांसफर नहीं कर पाती, इसलिए उसके साथ गठबंधन का कोई मतलब नहीं है, इसके बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भीम आर्मी के संस्थापक और दलित हितों के लिए संघर्ष कर रहे युवा नेता चंद्रशेखर से अस्पताल में मुलाकात की थी। इसके बाद चंद्रशेखर की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पंख मिल गए। इस बीच इसके भी कयास लगाए गए कि वे बनारस से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं। कांग्रेस का दलित नेता चंद्रशेखर पर डोरे डालना बसपा प्रमुख को खल रहा है। दरअसल चंद्रशेखर जाटव समाज से आते हैं और बसपा इस वोट बैंक पर पहला हक समझती है। लेकिन कांग्रेस का चंद्रशेखर को आगे करने से इस वोट बैंक का उसकी ओर रूख करने का आकलन किया जाने लगा है। इतिहास के आईने में देखें तो जाटव पारंपरिक रुप से कांग्रेस का वोट बैंक रहा है, जिन्हें 90 के दशक में कांशीराम और मायावती वहां से खींच कर बसपा के साथ लाए थे।

इसके अलावा प्रियंका गांधी का उत्तर प्रदेश की राजनीति में उतरना भी बसपा प्रमुख मायावती को अपने वर्चस्व को चुनौती लग रहा है। अगर कांग्रेस मजबूत होती है तो इसका नुकसान बसपा को होगा। वहीं बसपा और समाजवादी पार्टी के गठबंधन में अगर कांग्रेस शामिल होती है तो इससे बसपा का वोट बैंक बंटेगा। बहरहाल, मायावती के इस कड़े रवैये से कांग्रेस में मायूसी है, उसकी स्थिति चौराहे पर खड़े होने जैसी है, उसने प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया सरीखे युवा नेताओं को बेशक मैदान में उतार दिया है, लेकिन बगैर गठबंधन के सहारे के उसकी नैया मंथर ही चलती नजर आती है। हालांकि चुनाव पूर्व की यह स्थिति है, चुनाव के बाद क्या हो सकता है, इसका आकलन अभी से लगाना मुश्किल है, लेकिन तब भी गैर भाजपा दलों में मायावती प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में सामने आ सकती हैं। हालांकि तब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मुकाबले में होंगे, इस वजह से भी बसपा प्रमुख कांग्रेस से देरी बनाए हुए हैं।

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