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अमेरिका में लोकतंत्र हुआ कलंकित

Editorial : भारत में उन लोगों को अब बेहतर तरीके से जवाब मिल गया होगा जोकि यहां तथाकथित रूप से लोकतंत्र न होने की बात कहते हैं। आजादी के बाद से संभव है कि एक बार ऐसा हुआ है, जब भारत में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई गईं, हालांकि जनता ने उसका माकूल जवाब दे दिया था। दरअसल, अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान जो हो रहा है, वह यह बताने को काफी है कि भारतीय लोकतंत्र ज्यादा शक्तिशाली है या फिर अमेरिका और दूसरे लोकतंत्रवादी देशों की प्रणाली।

अमेरिकी चुनाव में निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिस प्रकार शिकस्त का सामना करना पड़ा है, उससे बौखला कर वे अब न हार मानने को तैयार हैं और न ही सत्ता हस्तांतरण को। हालात ऐसे हैं कि ट्रंप समर्थक लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में ही घुस गए और हिंसा की। इस दौरान एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई।

इसकी आशंका पहले से ही थी कि ट्रंप सहजता से सत्ता हस्तांतरण को तैयार नहीं होंगे। हालांकि यह भी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अपने यहां लोकतंत्र का हनन करते हुए ऐसे हालात से दो-चार हो रही है। क्या यह नहीं होना चाहिए था कि ट्रंप अपनी हार स्वीकार करते हुए सम्मानपूर्वक विदा लेते। दरअसल, सही होने का दावा कर रहे ट्रंप को अमेरिका ने स्वीकार नहीं किया। पूरी दुनिया में अमेरिका की एक नकारात्मक राष्ट्र की छवि बनाने वाले ट्रंप ने यह तक विचार नहीं किया कि अमेरिका के इतिहास में सिवाय एक बार के ऐसा कभी नहीं हुआ है। अमेरिका वह देश भी है जोकि दुनिया को समाज, विज्ञान, चिकित्सा, संस्कृति और विचार की सौगात देता आया है।
दरअसल, बुधवार को अमेरिकी सीनेट के अंदर एरिजोना के इलेक्टोरल वोट को लेकर ट्रंप समर्थकों की आपत्ति पर बहस हो रही थी। इसी बीच यह सुनाई दिया कि प्रदर्शनकारी घुस आए हैं और वे सीनेट के चेंबर के बाहर हैं। इसके बाद बहस को रोक दिया गया। प्रदर्शनकारी सीनेट के तीसरे फ्लोर तक पहुंच गए और इस दौरान वे जमकर नारेबाजी कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों को भगाने के लिए सुरक्षाकर्मियों को बंदूक ताननी पड़ी। इस बीच ट्विटर ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अकाउंट 12 घंटे के लिए बैन कर दिया। वास्तव में ट्रंप अपने समर्थकों के संसद के अंदर घुसने पर लगातार चुनाव को लेकर झूठे बयान दे रहे थे। इससे पहले ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब ने भी डोनाल्ड ट्रंप के भाषण के सभी छोटे-छोटे वीडियो हटा दिए। इन घटनाओं का घटना यह बताता है कि ट्रंप किस प्रकार की सोच के साथ काम कर रहे हैं। पूरी दुनिया में उनके झूठ के चर्चे पहले से ही हैं, किसी भी तरीके से सत्ता में बने रहने और ताकत का इस्तेमाल करते रहने की उनकी तमन्ना सोशल मीडिया पर झूठे संदेश देकर सामने आ गई। उनकी तरफ से यह भी कहा गया है कि राष्ट्रपति चुनाव में धांधली हुई है।
अमेरिका में इस घटना पर पूरी दुनिया ने हैरानी जताई है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्रंप को अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता हस्तांतरण में सहयोग करने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक प्रणाली में इस प्रकार के गैरकानूनी तरीके स्वीकार नहीं किए जा सकते। जाहिर है, प्रधानमंत्री मोदी का यह आह्वान सच्चाई पर आधारित है। भारत के किसी भी चुनाव में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है, ईवीएम पर आरोप लगाए जाते हैं, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में लाया जाता है, लेकिन फिर भी जांच प्रणाली और न्यायिक प्रणाली की सर्वोच्चता के बूते भारत ऐसे निर्णायक परिणाम पर पहुंचता है जोकि बगैर किसी खून-खराबे और हिंसा के लोकतंत्र की सर्वोच्चता को स्थापित करता है। अब अमेरिकी चुनाव को देखें तो निवर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप ने चुनाव प्रणाली में धांधली का आरोप लगाया है। उनका यह आरोप क्या आधार रखता है, यह जांच का विषय है। बुधवार को इसी आरोप के संबंध में पड़ताल जारी थी, जब उनके समर्थकों ने संसद में घुसकर प्रदर्शन शुरू किया। क्या ट्रंप इतनी भी शालीनता नहीं दिखा सकते कि आरोपों पर सुनवाई भी शांतिपूर्वक तरीके से हो सके।

इस दौरान राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए जो बाइडन का भी बयान आया है, जिसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप को अपनी शपथ पूरी करनी चाहिए और संविधान की रक्षा करनी चाहिए। निश्चित रूप से संसद में हुआ हंगामा राजद्रोह है। राष्ट्रपति चुनाव के बाद से ही ऐसी रिपोर्ट आ रही हैं, जिनमें बताया गया है कि निवर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप खुद को सुरक्षित बनाने के लिए काम कर रहे हैं। यहां तक भी कहा गया है कि वे शायद अमेरिका में न रहें। दरअसल, अपने कार्यकाल के दौरान ट्रंप और उनके समर्थकों ने अमेरिका में जैसे हालात कायम किए हैं, उनकी जांच नए राष्ट्रपति के द्वारा कराया जाना लाजिमी है। ट्रंप एक अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी भी हैं, अपने कार्यकाल में उन्होंने बतौर राष्ट्रपति अपने कारोबार को भी आगे बढ़ाने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है। अब सत्ता हस्तांतरण में गतिरोध कायम करके वे यही साबित कर रहे हैं, कि कुछ न कुछ गड़बड़ है।

मालूम हो, ट्रंप को 70 लाख वोटों से हार मिली है, बावजूद इसके वे धांधली का आरोप लगाकर खुद को बनाए रखना चाहते हैं। निश्चित रूप से ट्रंप ऐसे राष्ट्रपति साबित हुए हैं, जिन्होंने अमेरिका के लोकतंत्र और वहां की श्रेष्ठता को लांछित किया है। अमेरिका की जनता को यह विचार करना ही होगा कि आखिर वह किस रास्ते पर चल निकली है। क्या लोकतंत्र में हिंसा के लिए स्थान होना चाहिए? इसका जवाब हमेशा न ही होना चाहिए।

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