धरती रूपी घर के आंगन को न बिगाड़ें : निरंकारी बाबा - Arth Parkash
Saturday, September 22, 2018
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धरती रूपी घर के आंगन को न बिगाड़ें : निरंकारी बाबा

धरती रूपी घर के आंगन को न बिगाड़ें : निरंकारी बाबा

हमेशा यही ख्वाहिश रहती है कि संसार के हर इन्सान तक यह ज्ञान का उजाला पहुंचे। कोई भी आत्मा इस अपने सबसे महत्वपूर्ण मकसद को पूरा करने से वंचित न रह जाये। विश्व भर में रहने वाले इन्सानों को भाईचारे की भावना से रहना आ जाये क्योंकि मुल्क, मुल्कों के साथ लड़ते हैं, कौमें, कौमों के साथ लड़ती है, रंग के आधार पर, जाति के आधार पर भाषा के आधार पर, खण्डों के आधार पर बड़े-बड़े झगड़े हैं। सामाजिकता के आधार पर व इल्म (योग्यता) के आधार पर तो हर चप्पे पर, इन्सान ने इतने कारण खड़े कर लिए हैं, जिसके कारण विश्व युद्ध भी हुए है, जंगे भी लगातार चल रही हैं, आतंकवाद यानि कि हिंसा के दौर भी चलते आ रहे हैं लेकिन भाईचारे की तरफ बहुत कम कदम आगे बढ़ाये जाते हैं,

इसलिए विश्व भर में महापुरुष-सन्तजन यही यत्न करते हैं कि संसार के हर इन्सान को यह सुमति मिले कि यह जीवन, जितने भी स्वांस उसको मिले हैं, क्या लडऩे- झगडऩे के लिए मिले हैं? क्या ये दूसरों को दुख देने के लिए मिले हैं? ये क्या चारों तरफ वैर का कोलाहल मचाने के लिए मिले हैं? इस धरती को नर्क बनाने के लिए मिले हैं या फिर उनको यह जीवन मिला है अपनी आत्मा का कल्याण करके इस धरती को गुलजार बनाने के लिए? इस धरती पर रहना है इसको सुन्दर बनाने के लिए ही यह जीवन मिला है। जैसे जिस घर में, जिस कमरे में हम रहें, क्या हम उसमें कूड़ा करकट फेंकते रहते हैं? नहीं! हम कहते हैं कि कमरे में हमने रहना है। कमरे में सोना है। कमरे में खाना खाना है तो मैं इसमें कूड़ा-करकट क्यों फेकूंगा? कूड़े से तो मुझे बहुत बेचैनी होगी। स्वयं को करुंगा, तो वहां पर हमारी अक्ल काम करती है,|

फिर यह समझो कि यह संसार, यह धरती भी हमारा घर है तो हम इस घर को क्यों बिगाड़ते हैं? जहां पर हमने रहना है, जहां हमने स्वांसें लेनी हैं, जहां हमने इस जीवन की यात्रा को तय करना है, हम क्यों इस धरती रूपी घर के आंगन को बिगाड़ते चले जा रहे हैं?
हालांकि महापुरुषों-गुरु-पीर-पैगम्बरों ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। अगर हम धरती के अनेकों हिस्सों की बात करते हैं। कहीं हजरत ईसा मसीह जी का स्वरूप हालांकि उस स्वरूप में हो सकता है कि दुनिया के हर हिस्से में वे न पहुंच पाये हों लेकिन जहां पर पहुंच पाये, उनका सन्देश यही था कि इन्सानों! प्यार से रहो, मिलवर्तन से रहो।

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