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पंजाब के लिए शुभ नहीं है केंद्र-किसान में संवाद टूटना

  • कूटनीतिक खेल के पहले दौर में केंद्र की शह को दी किसानों ने मात
  • आशा करें कि दोनों पक्षों में विवेक का कोई बीज सद्भावना
    की फसल बनकर फूट

चंडीगढ़(नरेश कौशल/सलाहकार सम्पादक)। केंद्र और किसान संगठनों के बीच प्रस्ताविक बैठक लगभग खटाई में निपटी या कहें कि कृषि कानूनों को लेकर केंद्र के नियंत्रण पर बुलाई गयी उस बैठक का कोई परिणाम नहीं निकला।

कृषिण से संबंधित इस संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार और किसान संगठनों के स्टैण्ड को सियासी दृष्टि से देखें परखें तो हम कह सकते हैं कि शतरंज के आज के खेल में सरकार की शह को किसानों ने मात दे डाली। खैर, जीत-हार के इस मसले को हल्के में नहीं टाला जा सकता क्योंकि देश के एक अत्यंत संवेदनशील परिणाम दे सकता है।

पंजाब के किसान संगठनों के सात सदस्यीय प्रतिनिधि का माथा तो सुबह उसी वक्त ठनक गया जब उन्होंने आशा के विपरीत किसी भी जन प्रतिनिधि को बैठक से नदारद पाया। ले देकर केंद्रीय कृषि सचिव संजय अग्रवाल सरकारी पक्ष के रूप में मौजूद थे। किसान नेताओं को बैठक में किसी न किसी मंत्री के उपस्थित होने की उमीद इसलिए थी क्योंकि केंद्र द्वारा जो न्यौता पत्र उन्हें भेजा गया था उसमें स्पष्ट लिखा था कि सरकार उनसे इस मसले पर बैठक करना चाहती है।

यहां प्राप्त खबरों के अनुसार लगभग डेढ़ घंटे तक चली इस बैठक के शुरुआती दौर में ही किसानों को कृषि कानूनों पर केंद्र के ‘मैं न मानूंÓ जैसे रवैये की भनक मिल गयी थी। कृषि सचिव संजय अग्रवाल का रवैया कक्षा के छात्रों के समक्ष बैठे शिक्षक जैसा था और वह अविरल धारा प्रवाह में कृषि कानूनों का स्तुतिगान करने लगे। किसान नेताओं ने उन्हें कई बार टोका और तर्क दिया कि इस बैठक का अभिप्राय: किसी कानून का गुणगान करना नहीं बल्कि किसानों की समस्याओं को दृष्टि में रखकर कानून में आवश्यक संशोधन किए जाने की संभावनाएं खोजना है।

जब किसान प्रतिनिधिमंडल को जाहिर हो गया कि सरकारी मोर्चे पर डटे प्रतिनिधि के पास कोई अधिकार रूपी अस्त्र शस्त्र ही नहीं तो वे बैठक छोड़कर निकल लिए।
जैसा कि हमने शुरू में कहा कि सरकार आज के शतरंजी खेल में किसानों से मात खा गयी, इस टिप्पणी का यहां खुलासा करना आवश्यक है। किसान आंदोलन के घटनाक्रम को देख परखने वाले सुधि पाठक भतिभांति जानते हैं कि केंद्र सरकार के पहले मिले निमंत्रण पत्र को लेकर किसान संगठनों में वार्तालाप करने पर मतभेद था। लेकिन किसान संगठनों को आंदोलन से जन साधरण को दरपेश समस्याओं का भी अहसास था। इस आंदोलन से जहां रेल यातायात बाधित हुआ है वहीं ताप बिजली घरों की कोयला आपूर्ति में व्यवधान आने से बिजली संकट के बादल भी मंडराने लगे हैं।

भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रमुख बलबीर सिंह राजेवाल ने सभी संगठनों की कल हुई बैठक के बाद घोषणा की थी कि उक्त समस्याओं के दृष्टिगत ही संगठनों ने सात सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल का गठन किया था। उन्होंने यह भी कहा कि वे सभी संवाद बने रहने के भी पक्ष में थे। सात सदस्यीय कमेटी में राजेवाल के अलावा डा. दर्शन पाल, जगजीत सिंह डल्लेवाल, कुलवंत सिंह, सुरजीत सिंह फुल्ल व सतनाम सिंह साहनी को शामिल किया गया था।

किसान नेताओं में इस बात पर सर्वसमति थी कि अगर उन्होंने केंद्र को निमंत्रण ठुकरा दिया तो स्वाभाविक है कि केंद्र को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि वह तो वार्तालाप के लिए सकारात्मक पहल कर रहे थे और इस तरह केंद्र किसान संगठनों के पाले में आ गिरती। इसी रणनीति के मद्देनजर किसान नेताओं ने बैठक में शामिल होने का फैसला लिया। परन्तु जब केंद्रीय कृषि सचिव के दो टूक रवैये से यह स्पष्ट हो गया कि केंद्र सरकार का तो यह महज रस्मी पैंतरा है तो उन्होंने बैठक का बहिष्कार कर दिया। इसी घटनाक्रम को लेकर यह टिप्पणी वाजिब बनती है कि किसान नेताओं ने शाह-मात के इस खेल में तो बाजी मार ही ली।

किसान नेताओं के अलावा सियासत की रणनीतिक समझ रखने वाले लोग केंद्र के दोहरे रवैये को दाल में कुछ काला के रूप में देख परखने लगे थे। योकि एक ओर तो सरकार किसान नेताओं को पुचकार कर वार्ता करने की दुहाई दे रही थी जबकि दूसरी ओर पंजाब में कृषि कानून के पक्ष में हवा बनाने की रणनीति भी तैयार कर ली। केंद्र ने अपने आठ मंत्रियों की ड्यूटी तय की है कि वे 13 अक्तूबर से २० अक्तूबर के बीच पंजाब में हवाई दौरे करके नये कृषि कानूनों के पक्ष में हवा बनाएं।

बिहार विधानसभा का चुनाव और मध्य प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर उपचुनाव सिन्नकट होने के कारण भी केंद्र फिलहाल किसान आंदोलन पर चूम चाटने और पुचकारने का पानी फेंके रखना चाहता है। लेकिन केंद्र सरकार इन कानूनों को लेकर किस कदर तक अपने स्टैंड पर कायम है, इसका ताजा तरीन उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पूर्व केंद्रीय मंत्री बाला साहब विखे पाटिल की आत्मकथा के विमोचन अवसर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये दिये गये वतव्य से भी स्पष्ट मिल सकता है। मंगलवार के समारोह में बोलते हुए मोदी ने कहा कि उनकी सरकार के एतिहासिक कृषि सुधारों से किसानों के कारोबारी बनने के अवसर पैदा होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इन सुधारों से जो अवसर पैदा हो रहे हैं।

उससे खेती उद्यम और किसान अन्नदाता की जगह उद्यमी बन जायेगा। जैसा कि हमने शुरू में कहा कि ऐसे संवाद टूटने के दूरगामी परिणाम कई बार बुरे भी हो जाते हैं।योंकि जब आंदोलन दीर्घ अवधि तक चलते हैं तो कई बार स्वार्थी तत्व या साा की ताकतें उनमें असंतोष की चिंगारी डालने से भी गुरेज नहीं करतीं। इस आंदोलन में बेरोजगारी से तंग युवा वर्ग भी सक्रियता से संलिप्त हैं। आजकल युवाओं में सहनशीलता का अभाव जगजाहिर है। दूसरे एक सीमांत राज्य होने के नाते सीमा पार से हुई करतूतों से भी पंजाब कई बार घायल हो चुका है। बहरहाल आशा की जा सकती है कि दोनों पक्षों में विवेक का कोई बीज सद्भावना की फसल के रूप में फूटे।

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