भक्तजन सच्चाई की बात करते हैं : निरंकारी बाबा
Thursday, June 21, 2018
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भक्तजन सच्चाई की बात करते हैं : निरंकारी बाबा

भक्तजन सच्चाई की बात करते हैं : निरंकारी बाबा

अपना मूल्यांकन करना जरुरी है और फिर अपना संवरना जरुरी है। मूल्यांकन करने क बाद भी अगर संवरने वाला काम न हुआ तो फिर तो बहुत मन्दभागा है कि हमने अपना मूल्यांकन भी कर लिया, जान भी लिया फिर भी संवरना नहीं हुए। जिस तरह से दास वो पंक्तियां कई वर्षों से दोहरा रहा है कि

देखते सभी हैं लेकिन समझते हैं कोई कोई।
समझते हैं तो उसे स्वीकारते हैं कोई कोई।
स्वीकारते हैं तो उसे व्यवहारते हैं कोई कोई।

कि देखने वाले कई होते हैं लेकिन देखकर भी हर किसी को बात समझ में नहीं आती कि मैने समझ लिया है। देख तो लिया है लकिन समझ नहीं आयी। फिर अगला वह पड़ाव कि देख भी लियाए समझ भी लिया लेकिन समझने के बावजूद इसे स्वीकारा नहीं। इसकी स्वीकृती नहीं है, इसे स्वीकार नहीं किया गया है। फिर अगला कदम कि स्वीकार तो करते हैं लेकिन व्यवहार में कोई-कोई लाता है, और अगर तीनों ही पड़ाव पार कर गये कि देखा भी, समझा भी, स्वीकारा भी लेकिन उसे व्यवहार में कोई-कोई लाता हैं। तोयहां व्यवहार के रुप में मजबूती देने की ही बात हो रही है जिसकी बात दास कर रहा थ कि बात को समझ भी लिया लेकिन फिर भी उस ओर कदम नहीं बढ़ाया, तो यह हमारी बदकिस्मती है, यह हमारी नादानी है।

इसलिये कहते हैं कि नादान नहीं बनना है, हमने ऐसी सूझ-बूझ का इस्तेमाल करना है कि जो भी लाभ वाले काम हैं हमने वही करना है। हमने उसी राह पर चलना है जिन राहों से भक्तजन गुजरे हैं। चाहे वो किसी भी युग में पैदा हुए हों हमने वही चाल अपनानी है। प्यार वाली, सत्कार वाली अपनेपन के भाव वाली, एक दूसरे की कद्र करने वाली चाल अपनानी है। इस तरह के भाव से युक्त होकर हम इस यात्रा को तय करें जिसके कारण जो संसार का रुप है वो संवर जाये और सारे ही राहत की सांस लें। दातार सबको ऐसी सोझी, ऐसी जागृति दे, सबको यह बोध हाए सबकी अज्ञानता का अन्त होए यह अन्धेरा दूर हो। एक सच्चाई में सभी स्थित हो जायें और अज्ञानता पर आधारित दूसरों के प्रति विपरीत भाव न रखें। क्योंकि संसार में हम देखते हैं कि इन्सान कई-कई ऐसे कदम उइाते हैं कि जिस पर आधारित वो बातें होती हैं और हम उन्हें मान लेते हैं। उन उदाहरणों के साथ लोग इस तरह से व्यवहार करने लगते हैं जबकि उसका सच्चाई के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता और जिस इन्सान की बात का हम प्रभाव ग्रहण कर रहे हैं उसका सच्चाई के साथ कोई वास्ता ही नहीं है। हमारा सच्चाई के साथ सामना नहीं हुआ है फिर भी हम प्रभाव ग्रहण करने लगते हैं और उसी पर हम कुछ कदम भी बढ़ा लेते हैं।

जिस तरह से बहुत वर्षों बाद वह बात ध्यान आई कि एक जमीन का टुकड़ा था वहां चार दोस्तों ने मिलकर सोचा कि यहां कुछ खेती-बाड़ी की जाये। इस जमीन पर कुछ उगाया जाये। लेकिन यह यनिर्णय नहीं हो पा रहा था कि क्या चीज उगाई जाये। आखिर फैसला हो गया कि हम यहां गन्ना उगाते हैं क्योंकि गन्ने की बहुत अच्छी कीमत मिलती है। यहां पर गन्ने के क्रेशर हैं वहां सरकार अच्छी कीमत दे देती है तो हम गन्ना उगाते हैं। तो एक कहता है कि चलो हम गन्ना उगाते हैं लेकिन फिर आगे गन्ने की संभाल भी तो करनी है।

कुछ लोगों का गन्ने को नुसान पहुंचाने में भी हाथ होता है। हमारे गांव में भी दो-चार लड़के ऐसे हैं जिनके बारे में मुझे ठीक से पता है कि वो इस तरह से नुकसान करते हंै कई पेड़ों से आम तोड़ते हैं, कई कुछ और करते हैं और वो बड़ा नुकसान करते हैं, पत्थर मारकर भी तोड़ते हैं, तो इस तरह से हमारे गन्नों का नुसान हो जायेगा। तो वो कहने लगे कि चलो वहां चलते हैं। वो उन लड़कों के पास चले गये। हाथों में लाठियां पकड़ी हुई और उन लड़कों को वहां जाकर पीटने लगे कि और गन्ना तोड़ो और गन्ना तोड़ो। अभी तो बाये भी नहीं है और अभी से तोडऩा शुरु कर दिया है। कहने का भाव इस तरह से कैसे-कैसे राय बना लेते हैं।महापुरुष, संतजन, भक्तजन उस सच्चाई की बात करते हैं जिसके वे जानकार हो जाते हैं, वो केवल सपनों में नहीं रह जाते, केवल ख्याली पुलाव नहीं पकाते, वो सच्चाई में विचरण करते हैं। इस तरह से हकीकत की राह परए सच्चाई की राह पर सभी चलते चले जायें, यही शुभकामना है।

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