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बिजली क्षेत्र के निजीकरण के फैसले को रद्द करने की मांग

चंडीगढ़। बिजली कर्मचारियों व अभियंताओं की राष्ट्रीय समन्वय समिति के आह्वान पर बिजली संशोधित बिल 2020 के खिलाफ व केन्द्र शासित प्रदेशों में बिजली के निजीकरण के खिलाफ सोमवार को 15 लाख बिजली कर्मचारियों व अभियन्ताओं ने काली पट्टियां बांधकर विरोध दिवस मनाया।

चंडीगढ़ के बिजली कर्मचारियों न यूटी पावरमैन यूनियन के बैनर तले इस विरोध दिवस में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया व दिनभर काले बिल्ले लगाकर अपना काम काज निपटाया। अपने अपने कार्यालयों में विरोध दौरान कर्मचारियों ने सरकार की गाइडलाइन व शारीरिक दूरी के नियमों का पालन किया।

यूटी पावरमैन यूनियन चंडीगढ़ के महासचिव गोपाल दत्त जोशी, कार्यकारी प्रधान ध्यान सिंह, अमरीक सिंह, राजपाल, दर्शन सिंह आदि ने निजीकरण के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि केंद्र सरकार व चंडीगढ़ प्रशासन उस समय फैसला ले रहा है जब सारा देश कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है व बिजली कर्मचारी व इंजीनियर अगली कतारों में खेड़े होकर अपनी जान जोखिम में डालकर विद्युत आपूर्ति व रख रखाव का काम कर रहे हंै। बिजली क्षेत्र के निजीकरण के फैसले को रद्द करने की मांग करते हुए यूनियन प्रतिनिधियों ने इसे किसान व गरीब विरोधी करार देते हुए कहा कि यह बिल समूचे बिजली क्षेत्र का निजीकरण का रास्ता तैयार करने वाला है।

इस बिल के पास होने के बाद बिजली के दामों में भारी बढ़ोतरी होगी। नये टैरिफ में सबसीडी व क्रॉस सबसिडी खत्म कर दी जायेगी व किसी को भी लागत से कम में बिजली नहीं मिलेगी व बिजली की औसत दर 8 व 10 रूपये युनिट से कम नहीं होगी जिसका सबसे बुरा असर किसान व गरीब उपभोक्ता को होगा।

चंडीगढ़ के संबंध में यूनियन प्रतिनिधियों ने कहा कि चंडीगढ़ के बिजली विभाग में 100 प्रतिशत कर्मचारियों की कमी तथा सामान न होने के बावजूद विभाग जनता को बेहत सेवायें दे रहा है। चंडीगढ़ में स्टैन्डर्ड परफारमेंस 99.99 प्रतिशत लागू की जा रही है। बेहत रेवा के लिए पिछले 5 साल से विभाग को अवार्ड मिल रहा है। शत प्रतिशत मीटरिंग सप्लाई है। लाइन लास 9 व 10 प्रतिशत के बीच है। पंजाब, हरिायाणा व अन्य प्रदेशों से सस्ती दरों में बिजली देने के बावजूद विभाग 100 करोड़ से अधिक मुनाफे में है। इसलिए इसका निजीकरण किसी भी तरह ठीक नहीं है।

फैडऱेशन ऑफ यूटी इम्पलाईज एंड वर्करज ने बिजली कर्मचारियों को अपना समर्थन देते हुए निजीकरण के फैसले को रद्द करने की मांग की।

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