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कोरोना पीड़ितों में बढ़ रहा है डिप्रेशन और पैनिक अटैक का खतरा

नई दिल्ली। कोरोना से उभरने के बाद भी इस बीमारी का प्रभाव कई तरह से मरीज़ों पर देखने को मिलता है। यह बीमारी ना सिर्फ शरीर को प्रभावित करती है, बल्कि इसका असर मस्तिष्क पर भी देखने को मिलता है। यूनाइटेड किंगडम के एक नए अध्ययन के मुताबिक जो लोग COVID-19 से उभर चुके है उनमें मानसिक बीमारियों के पनपने का खतरा अधिक रहता है।

डिप्रेशन, एंग्जाइटी और डिमेंशिया का खतरा अधिक:

द लांसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 के 18 प्रतिशत रोगियों में इस वायरस से उभरने के बाद मानसिक विकार जैसे डिप्रेशन, एंग्जाइटी और डिमेंशिया के लक्षण देखने को मिले है। अध्ययन के मुताबिक जिन लोगों को कोरोना संक्रमण नहीं हुआ उनके मुकाबले कोरोना पीड़ितों में मानसिक रोग होने की दोगुनी संभावना थी। डॉक्टरों का मानना है कि कोविड-19 का संबंध मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है।

कोरोना से रिकवर हुए मरीज़ों में चिंता, अनिद्रा, और अवसाद अधिक:

इक्वाडोर के एक हालिया सर्वेक्षण से पता चला है कि जो लोग COVID -19 से रिकवर होते है उनमें आमतौर पर चिंता, अनिद्रा, और अवसाद जैसे लक्षण बढ़ने की संभावना अधिक होती है।

शोधकर्ता लगातार यह जानने में लगे हुए हैं कि नया कोरोनावायरस ना सिर्फ मस्तिष्क पर असर डालता है बल्कि मस्तिष्क की गतिविधियों पर भी असर डालता है। यह अध्ययन कोरोना के मस्तिष्क पर होने वाले असर को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेंगे।

न्यू यॉर्क शहर के लेनॉक्स हिल अस्पताल के वरिष्ठ न्यूरो पैथोलॉजिस्ट, पीएचडी, ब्रिटनी लेमोंडा कहते हैं कि कोविड-19 महामारी का असर ना सिर्फ बॉडी पर देखने को मिलता है बल्कि इसके मनोवैज्ञानिक मुद्दे भी हो सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड और NIHR ऑक्सफोर्ड हेल्थ बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर के शोधकर्ताओं ने संयुक्त राज्य में 69 मिलियन लोगों की हेल्थ रिकॉर्ड का मूल्यांकन किया, जिसमें 62,000 से अधिक लोग शामिल थे, जो COVID-19 से रिकवर हुए थे। अध्ययन के मुताबिक COVID-19 से रिकवर होने वाले लगभग 6 प्रतिशत वयस्कों में 90 दिनों के अंदर पहली बार मानसिक विकार देखने को मिला।

एंग्जाइटी डिसऑर्डर: 

अगर दूसरे शब्दों में कहें तो पहली बार कोविड-19 से रिकवर होने वाले मरीज़ों में मूड और एंग्जाइटी डिसऑर्डर पनपने की संभावना दोगुनी ज्यादा होती है। जबकि कोविड-19 के बुजुर्ग मरीज़ों में दो से तीन गुना ज्यादा डिमेंशिया होने का खतरा अधिक होता है।

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