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Congress should also discuss defeat

कांग्रेस भी करे हार पर मंथन

बिहार समेत देशभर में हुए उपचुनावों में कांग्रेस का जैसा प्रदर्शन रहा है, वह एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के लिए स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों की तुलना में भी बेहद कमजोर प्रदर्शन और परिणाम हासिल किए हैं। बेशक, हरियाणा में बरोदा उपचुनाव अपवाद हो, लेकिन यहां भी संभवत: कांग्रेस नहीं अपितु एक राजनेता पिता-पुत्र की व्यक्तिगत छवि ही विजेता रही है। बिहार में कांग्रेस ने राजद और वामदलों के साथ मिलकर महागठबंधन में चुनाव लड़ा था, लेकिन पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस नेताओं में मनोयोग और जीतने की इच्छाशक्ति का अभाव दिखता रहा। बेशक, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य में रैलियां करते रहे लेकिन वे रैलियां राजद के तेजस्वी यादव की तुलना में फीकी ही रहीं। क्या कांग्रेस ने यह मान लिया था कि वह तेजस्वी यादव के नेतृत्व में बिहार चुनाव लड़ रही है, और महागठबंधन को जीताने की पूरी जिम्मेदारी तेजस्वी यादव की है? अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस को अपने राष्ट्रीय राजनीतिक दल कहलाने पर विचार करना चाहिए।

दरअसल, महागठबंधन के जीत के नजदीक पहुंचने के बावजूद हार का मुंह देखने के बाद अंतकर्लह साफ-साफ जाहिर होने लगी है तो यह अस्वाभाविक भी नहीं है। राजद नेता की ओर से राहुल गांधी पर पिकनिक मनाने संबंधी टिप्पणी के बाद महागठबंधन के नेताओं में टूट उजागर हो चुकी है, वहीं कांग्रेस नेताओं की ओर से भी बिहार में हार के लिए शीर्ष नेतृत्व पर हमला यह बताता है कि कांग्रेस के उन असंतुष्ट नेताओं को अवसर मिल चुका है जोकि पार्टी में बदलाव लाने की मांग करते हुए नेतृत्व को चिट्ठी लिख चुके हैं। बेशक, इस चिट्ठी को इन नेताओं की शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ बगावत समझा गया था, लेकिन यह साबित हो गया है कि कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व बोझिल और दिशाहीन हो चुका है और बाकी नेता,पदाधिकारी, कार्यकर्ता पार्टी के डांवाडोल भविष्य से चिंतित हैं।

कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल उन नेताओं में शुमार हैं, जिन्होंने शीर्ष नेतृत्व को चि_ी लिखी थी, अब बिहार और अन्य जगहों पर उपचुनाव में हार पर बोलने वालों में भी वे प्रमुख हो गए हैं। उनकी सवालनुमा यह टिप्पणी जायज है कि पार्टी ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपनी नियती मान लिया है। बेशक, सिब्बल ने यह बात पार्टी मंच पर नहीं कही है, इसलिए नेतृत्व उनकी इस टिप्पणी से इत्तेफाक न रखे और संभव है, उन्हें इसके लिए समझाया भी जाए लेकिन अपनी निजी राय जाहिर करके भी सिब्बल ने पार्टी में उन सभी लोगों की मनोभावनाओं को जाहिर कर दिया है जोकि कांग्रेस से जुड़े हैं और इसके प्रदर्शन से दुखी हैं। पार्टी किसी एक नेता, पदाधिकारी की नहीं होती, वह सामूहिक होती है और उसके उत्थान के साथ-साथ प्रत्येक अपने उत्थान का सपना भी देखता है। ऐसे में शीर्ष स्तर का नेता अगर यह कहे कि पार्टी की हार से उसे बेहद दुख हो रहा है और वह इस्तीफा दे रहा है तो क्या यह कोई समाधान हो सकता है? ऐसे में कार्यकर्ता किसे कहेगा कि वह भी संतुष्ट नहीं है और इस्तीफा देगा।

वास्तव में बिहार चुनाव में हार के लिए कांग्रेस ने कोई जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है। पार्टी ने यह चुनाव ऐसे लड़ा, जैसे चुनाव लडऩा कोई रवायत हो। ऐसे में अगर राजद जिसके कंधों पर पूरी जिम्मेदारी डाल दी गई थी, अगर यह शिकायत करता है कि कांग्रेस नेताओं ने अपना पूरा जोर चुनाव में नहीं लगाया तो इसमें अनुचित भी नहीं दिखता। राहुल गांधी के अलावा अन्य कोई कांग्रेस नेता इस चुनाव में प्रचार करते नजर नहीं आए। अब पार्टी क्या हार के कारणों की पड़ताल करेगी, जिसकी मांग वे सभी कर रहे हैं, जोकि पार्टी के भविष्य के प्रति चिंतित हैं। सिब्बल से पहले बिहार कांग्रेस के बड़े नेता तारीक अनवर भी मंथन की मांग कर चुके हैं।

दरअसल, कांग्रेस को इस पर गौर फरमाना चाहिए कि आखिर गठबंधन का हिस्सा बनकर चुनाव लडऩे की नौबत उसके समक्ष कैसे आई है। कांग्रेस देश की जनता को अपने प्रति लुभाने में विफल क्यों हो रही है। आखिर ऐसा क्यों है कि कांग्रेस जहां भी गठबंधन में लड़ रही है, वहीं परिणाम गठबंधन के खिलाफ जा रहे हैं। तब यह सवाल पूछना कष्टकारी नजर आता है कि क्यों पार्टी अपने गठबंधन सहयोगियों पर बोझ बनती जा रही है और उसकी वजह से हर जगह गठबंधन का खेल खराब हो रहा है। कांग्रेस की स्थिति ऐसी है कि वह एक नियमित अध्यक्ष की नियुक्ति तक नहीं कर पाई है। पार्टी के प्रवक्ता बेशक, अपनी निजी प्रतिष्ठा को पार्टी से जोडकऱ बनावटी आंकड़े और सबकुछ सही होने का राग टीवी चैनलों पर अलापते नजर आएं लेकिन जनता में यह संदेश साफ-साफ पहुंच रहा है कि कांग्रेस के अंदर ऊर्जा और दिशा ज्ञान कुंठित हो चुका है। कहा गया है कि निंदक नेड़े राखिए, आंगन कुटी बंधाई…, पार्टी को उन लोगों को महत्व देना चाहिए जोकि कटु बोलने का साहस करते हैं, ऐसा करके वे पार्टी को ही परिमार्जित करेंगे। बदलाव का समय कभी नहीं बीतता, पार्टी को आत्ममंथन करते हुए यह समझने की जरूरत है कि आखिर गलत क्या हुआ है, क्यों हुआ है और उसे कैसे दुरुस्त करे। पार्टी को आतंरिक लोकतंत्र की जरूरत है।

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