बाबरी मस्जिद विध्वंस के 26 साल - Arth Parkash
Sunday, December 16, 2018
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बाबरी मस्जिद विध्वंस के 26 साल

बाबरी मस्जिद विध्वंस के 26 साल

26 साल। एक मस्जिद और एक मंदिर। तर्क है कि मस्जिद की जगह मंदिर था और दावा है कि उस जगह पर अब पहले जैसा भव्य मंदिर बनेगा। 6 दिसंबर 1992 का वह दिन भारत के इतिहास में ऐसे दिन के रूप में दर्ज है जब धार्मिक उन्माद के चरम स्थिति में पहुंच जाने पर एक खंडहर मस्जिद धराशायी कर दी गई। बाबरी मस्जिद और श्री राम मंदिर का यह झगड़ा अब देश में राजनीतिक संघर्ष का केंद्र है वहीं अदालतों के लिए बेहद संवेदनशील मसला। दो संप्रदायों के लोगों के बीच कटूता और नफरत की आग भड़काने वाले इस मसले के समाधान की सभी प्रतीक्षा कर रहे हैं, लेकिन आखिरकार वह समाधान हो कैसे?

मस्जिद और मंदिर की राजनीति अब फिर चरम पर है, क्योंकि अगले वर्ष आम चुनाव होने हैं। बीत दिनों में शिवसेना और आरएसएस, विहिप की ओर से यहां शक्तिप्रदर्शन हो चुका है। दोनों ही संगठनों की ओर से केंद्र सरकार पर तमाम तोहमत, आरोप लगाए गए हैं, मकसद दबाव बनाना है वहीं यह बताना भी है कि उन्होंने राममंदिर निर्माण के मसले को गौण नहीं होने दिया। खैर, राजनीतिकों का काम पहले समस्या पैदा करना और फिर उसका समाधान खोजने की कवायद करते रहना है। लेकिन इतना जरूर है कि इस मसले ने देश को अशांति और कटुता के और कुछ नहीं दिया है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अयोध्या शहर में रामकोट पहाड़ी पर एक मस्जिद थी। रैली के आयोजकों द्वारा मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाने देने की सर्वोच्च न्यायालय से वचनबद्धता के बावजूद 1992 में 150000 लोगों की एक हिंसक रैली के दंगे में बदल जाने से इसे विध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद देश भर में दंगे हुए, दो समुदायों के बीच हिंसा ने विकराल रूप ले लिया। धर्म पर आघात के रूप में इसे देखते हुए मुंबई और दिल्ली सहित कई प्रमुख भारतीय शहरों में भड़के दंगों में 2000 से अधिक लोग मारे गये।

दरअसल, भारत के प्रथम मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर 1527 में इस मस्जिद का निर्माण किया गया था। बताया गया है कि पुजारियों से हिन्दू ढांचे या निर्माण को छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा। इस स्थान को हिन्दू ईश्वरए राम की जन्मभूमि के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। बाबरी मस्जिद के इतिहास और इसके स्थान पर तथा किसी पहले के मंदिर को तोड़कर या उसमें बदलाव लाकर इसे बनाया गया है या नहीं इस पर चल रही राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक बहस को अयोध्या विवाद के नाम से जाना जाता है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए बनी परिस्थितियों की जांच करने के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया। विभिन्न सरकारों द्वारा 48 बार अतिरिक्त समय की मंजूरी पाने वाला भारतीय इतिहास में सबसे लंबे समय तक काम करनेवाला यह आयोग है।

वास्तव में फैजाबाद की निचली अदालतों में मामले के काफी दिनों तक लटके रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा तो उसकी तीन सदस्यीय पीठ ने 2010 में 30 सितंबर को दो-एक के बहुमत से विवादित भूमि को उसके तीन दावेदारों रामलला, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया। लेकिन कोई दावेदार इससे संतुष्ट नहीं हुआ। अब मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और जनवरी में उसकी सुनवाई प्रस्तावित है। सुप्रीम कोर्ट यह साफ कर चुका है कि मामले को भूमि के विवाद के रूप में ही देखेगा, आस्थाओं के टकराव के रूप में नहीं। अयोध्या विवाद का समाधान इस बात में है कि दोनों संप्रदाय इसे आध्यात्मिक नजरिये से देखा जाए। यह ऐसा मसला है जिस पर बहस खत्म नहीं हो सकती। देश के सामने दूसरे भी मसले हैं, इसका निपटारा हुआ तो उन पर भी ध्यान दिया जा सकेगा।

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