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धरती के ‘भगवानों’ की नाराजगी

धरती के भगवान यानी डॉक्टर आजकल रुठे हुए हैं। उनकी यह नाराजगी जायज भी है, लेकिन उनके रुठने से देश में कोहराम मच गया है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की लाइनें लग गई हैं, बदतर से बदतर हालात से गुजर रहे मरीजों को इलाज नसीब नहीं हो रहा है। पश्चिम बंगाल जहां से इस विवाद की शुरुआत हुई वहीं 5 मरीजों की जान जा चुकी है। दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, चंडीगढ़ समेत हरियाणा के डॉक्टर भी हड़ताल में शामिल हैं। पश्चिम बंगाल में एक मरीज की मौत के बाद जूनियर डॉक्टरों पर हमला कर उनके साथ मारपीट की गई। इसके बाद जहां राज्य के अस्पतालों में डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी वहीं उनके समर्थन में देश भर के डॉक्टर एक हो गए। वाकई में पश्चिम बंगाल में जूनियर डॉक्टरों के साथ जो सलूक किया गया वह बेहद निंदनीय है हालांकि इसके बाद राज्य सरकार की ओर से इस मसले के समाधान की दिशा में जैसा बर्ताव किया गया है वह और भयानक और आलोचना का विषय है। डॉक्टरों में इस कदर गुस्सा है कि प्रदेश में 700 डॉक्टर नौकरी छोड़ चुके हैं।

गौरतलब है कि सरकारी और निजी अस्पतालों में डॉक्टरों के साथ अक्सर ऐसी घटनाएं घटती हैं, जिनमें मरीज की मौत के बाद उन पर आरोप लगता है कि उन्होंने यथोचित इलाज नहीं किया या गलत इंजेक्शन या दवा दे दी। हालांकि ये आरोप एकतरफा भी हो सकते हैं, क्योंकि जो क्वालीफाइड डॉक्टर होते हैं, वे कभी नहीं चाहते कि उनके मरीज के साथ अनहोनी हो, लेकिन इलाज के दौरान अगर ऐसा घट जाता है तो इसके यथोचित कारण बताने के लिए डॉक्टरों को तैयार रहना चाहिए। परंतु इससे पहले ही परिजन लाव-लश्कर लेकर डॉक्टरों पर हमला बोल देते हैं, पश्चिम बंगाल में यही हुआ है। इसके बाद राज्य सरकार ने हड़ताल पर गए डॉक्टरों की बात सुनने, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने की बजाय, उन्हें अल्टीमेटम दे दिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि अगर वे काम पर नहीं लौटे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद से हड़ताली और उग्र हो गए और अब वे 6 मांगों पर अड़ गए हैं। इनमें मुख्यमंत्री से अपना बयान वापस लेने, डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रमुख है।

पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ डॉक्टरों की सुरक्षा का यह इंकलाब कहां जाकर ठहरेगा, यह कोई नहीं जान पा रहा। हालांकि इतना जरूर है कि डॉक्टरों ने एक प्रासंगिक विषय को उठाया है, लेकिन सवाल यह है कि इस रोष, विक्षोभ, प्रदर्शन और हड़ताल के बावजूद अगर मरीजों को परेशानी होती है, उनकी तकलीफ और बढ़ती है और उनकी जान पर संकट गहराता है तो क्या डॉक्टर इसका समर्थन करेंगे? जाहिर है, संवेदनशील लोग डॉक्टरों पर हमले की वारदातों का कतई समर्थन नहीं करेंगे, डॉक्टरों का काम शांत और व्यवस्थित तरीके से होना चाहिए। लेकिन सरकार को इस संबंध में भी विचार करना चाहिए कि आखिर डॉक्टरों पर हमले की घटनाएं घटती ही क्यों हैं। देखने में आया है कि सरकारी अस्पतालों में जूनियर डॉक्टर 12 घंटे से ज्यादा की डयूटी देते हैं, वहीं मरीजों की लगातार बढ़ती संख्या और उन पर त्वरित इलाज देने का दबाव भी हमेशा बना रहता है। कुछ पलों की देर मरीज को मौत के मुंह में धकेल देती है, इसके बाद परिजनों का गुस्सा धरती के भगवान पर ही फूटता है, हालांकि जब जान बच जाती है तो वे उस भगवान के आगे हाथ जोड़ लेते हैं।

बेशक केंद्र सरकार की नजर इस विवाद पर है और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्द्धन ने हड़ताली डॉक्टरों से मुलाकात की है, वहीं राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बातचीत के लिए बुलाया है। इस बीच इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने 17 जून को फिर देशभर में हड़ताल का ऐलान किया है। मामला कोलकाता हाईकोर्ट भी पहुंचा है, जिसने हड़ताल पर रोक लगाने से इनकार किया है। इन सब घटनाओं के बावजूद यह सवाल पूछना जरूरी है कि आखिर पश्चिम बंगाल इस कदर अशांत क्यों हो गया है? लोकसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच जो द्वंद्व चला, उसकी तपिश अभी तक कमजोर नहीं हुई है, और अब राज्य एक नये विवाद में फंस गया है, जिसकी वजह से पूरे देश में चिकित्सा सेवाएं चरमरा गई हैं। आखिर ममता बनर्जी ने क्या डॉक्टरों को भी भाजपा के कार्यकर्ता समझ लिया है, जिनके साथ वे इस कदर रुखे और अपमानजनक तरीके से पेश आ रही हैं। बेशक डॉक्टरों की हड़ताल का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन इस समय वे जिस मसले को लेकर हड़ताल पर हैं, उस पर गौर जरूर किए जाने की जरूरत है। अस्पतालों में डॉक्टरों पर जहां दबाव कम किए जाने की आवश्यकता है, वहीं उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित करना सरकार का काम है। लेकिन डॉक्टरों को हड़ताल से लौट आने की अपील भी की जानी जरूरी है, डॉक्टरों को समझना चाहिए कि अपना रोष व्यक्त करने के लिए वे दूसरे तरीकों का उपयोग कर सकते हैं।

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