14 दिनों से गुफा में बंद खिलाड़ी बच्चे हैं हौसले का दूसरा नाम
Thursday, November 15, 2018
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14 दिनों से गुफा में बंद खिलाड़ी बच्चे हैं हौसले का दूसरा नाम

14 दिनों से गुफा में बंद खिलाड़ी बच्चे हैं हौसले का दूसरा नाम

जिंदगी हार मान जाने का नाम नहीं है। यह बात हम किताबों में पढ़ते और बडे-बुजुर्गों से सुनते आए हैं। हालांकि जब हकीकत में ऐसी घटना घटती है, तब आपका हौसला आपसे पूछता है- हिम्मत तो नहीं हार गए? तब आपके मन से एक आवाज निकलती है, नहीं। वास्तव में इसी हां या ना का नाम हौसला रखना या हौसला हार जाना है। दरअसल, इन बातों को कहने की जरूरत इसलिए पड़ रही है क्योंकि पूरी दुनिया पिछले दो सप्ताह से एक अंधेरी, पानी से भरी सैकड़ों मीटर लंबी गुफा में बंद 13 खिलाड़ी बच्चों और उनके प्रशिक्षक को निरंतर जीवन के लिए संघर्ष करते देख रही है। थाईलैंड के माई साई में थाम लुआंग गुफा में बंद इन 13 लोगों में से रविवार को 4 बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। दरअसल, इन बच्चों के साहस और जिंदगी जीने के उत्साह को सलाम करना चाहिए क्योंकि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है और वे हालात से लड़ कर निरंतर बाहर आने में बचावकर्मियों की मदद कर रहे हैं।

मालूम हो 23 जून को एक फुटबॉल टीम के 12 सदस्य और कोच अभ्यास मैच के बाद गुफा में भ्रमण के मकसद से चले गए थे, लेकिन हादसे को जैसे उनका ही इंतजार था, बाहर भारी बारिश शुरू हो गई और यह गुफा पानी से भर गई। ऐसे में सभी 13 लोग अंदर ही फंस गए। 11 से 16 उम्र के ये बच्चे अभी किशोरावस्था में हैं और उन्हें जीवन का ऐसा सबक सीखने का मौका मिल गया है, जोकि उन्हें जिंदगी भर याद रहेगा। बताया गया है कि जिस गुफा में ये बच्चे बंद हैं, वहां सैकड़ों करोड़ लीटर पानी भरा हुआ है, जिसे कई इंजन लगाकर लगातार बाहर फेंका जा रहा है। यह दुनिया का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन बन गया है। गुफा के बाहर 13 मेडिकल टीम तैनात हैं, यानी हर बच्चे के लिए एक टीम, इसके अलावा अस्पताल में 5 इमरजेंसी रेस्पांस डॉक्टरों की टीम भी तैयार रखी गई है। इसके अलावा 30 डॉक्टर स्टैंडबाय रखे गए हैं। गुफा की लंबाई कितनी है, इसका अंदाजा इसी से लग सकता है कि विशेषज्ञ गोताखोरों को एक चक्कर लगाने में ही 11 घंटे का वक्त लग रहा है। वहीं 6 देशों के 90 तैराक और एक हजार जवान भी ऑपरेशन में मदद कर रहे हैं।

रोमांच के दीवाने इन बच्चों का इतनी गहराई में जाना बेशक बेवकूफी लगे लेकिन उन्हें भी इसकी आशंका नहीं थी कि हालात इस तरह उनके नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे कि जिस रास्ते से अंदर आए वही पानी में डूब जाएगा। गौरतलब है कि इन बच्चों को रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान जहां अंदर ही खाना पहुंचाया गया है वहीं पेयजल का भी प्रबंध किया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि वे घबराए नहीं हैं और संभव है उन्हें इसकी जानकारी नहीं है कि बाहर उनके लिए क्या चल रहा है, वे बस इसके इंतजार में हैं कि कोई आकर उन्हें बाहर ले जाएगा। और ऐसा हुआ भी जब ब्रिटिश गोताखोर जॉन वोलेंनथन और रिक स्टैंटन जोकि सबसे पहले उन तक पहुंचे थे ने पाया कि वे सब एक छोटी सी चटटान पर कीचड़ में सने बैठे थे। गौरतलब है कि दोनों गोताखोर इससे पहले भी कई ऐसे रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल होकर पानी से भरी गुफाओं में बंद लोगों को बाहर निकाल चुके हैं। उनके इस प्रयास की जितनी तारीफ की जाए वह कम होगी। क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जोकि अंधेरी, सुनसान जगह में पल-पल मौत के आने का इंतजार कर रहे लोगों के लिए उम्मीद का सूरज लेकर जाते हैं।

बहरहाल, पूरी दुनिया को इसका इंतजार है, जब टीम के बाकी 9 लोग भी नीला आसमान देख पाएंगे। जाहिर है, अंदर अगर वे खिलाड़ी बच्चे उम्मीद नहीं हार रहे तो बाहर बचावकर्मी हार मानने को तैयार नहीं हैं। दुनिया भर में आतंकवाद और तमाम ऐसी बुराइयों के बीच जब संकट में फंसे मानवों को बचाने के लिए सभी अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार रहते हैं तो यह सचमुच दैवीय लगता है। इंसान के कितने चेहरे हैं, जो इसी वक्त सामने आते हैं। वास्तव में एक दूसरे की मदद करना मानवता है, और थाइलैंड में चल रहा यह बचावकारी अभियान मानवता की इसी भावना का प्रकट रूप है। ईश्वर गुफा में फंसे बच्चों और प्रशिक्षक को सकुशल बाहर निकलने में मदद करे।

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