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Sunday, December 16, 2018
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कब, क्यों और कैसे मनाया जाता है छठ

कब, क्यों और कैसे मनाया जाता है छठ

छठ पूजा का पर्व सूर्य देव की आराधना के लिए मनाया जाता है। यह पर्व साल में दो बार, चैत्र शुक्ल षष्ठी और कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथियों को मनाया जाता है। इनमे से कार्तिक की छठ पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व को छठ पूजा, डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा आदि कई नामों से बुलाया जाता है।

क्यों होती है छठ पूजा…..

शास्त्रों के अनुसार छठ पूजा और उपवास मुख्य रूप से सूर्य देव की आराधना से उनकी कृपा पाने के लिये होता है। ऐसी मान्यता है कि सूर्य देव की कृपा हो जाये तो सेहत अच्छी रहती है, और धन-धान्य के भंडार भरे रहते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि छठ माई की कृपा से संतान प्राप्त होती। ये व्रत रखने से सूर्य के समान तेजस्वी और ओजस्वी संतान के लिये भी रखा जाता है। इस पूजा और उपवास से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

षष्ठी की कथा….

छठ माता को सूर्य देव की बहन माना जाता है। वहीं छठ व्रत की एक कथा के अनुसार छठ देवी को ईश्वर की पुत्री देवसेना माना गया है। देवसेना के बारे में बताते हुए कई स्थान पर उन्हीं के हवाले से कहा गया कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि वे षष्ठी कहलार्इं। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उनकी आराधना करने वालों को विधि विधान से पूजा करने पर संतान प्राप्ति होती है।

श्री राम से भी है संबंध….

पौराणिक कथाओं की माने तो ऐसा कहा जाता है कि रामायण काल में भगवान श्री राम ने अयोध्या वापस आने के बाद सीता जी के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना की थी। इसी तरह महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना करके पुत्र प्राप्ति करने से भी इस दिन को जोड़ा जाता है। कहते हैं कि कर्ण का जन्म इसी प्रकार हुआ था।

पहला दिन नहाय खाय: छठ पूजा का मुख्य त्यौहार कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है, लेकिन चतुर्थी को नहाय खाय के साथ इसका प्रारंभ हो जाता है। इस दिन प्रात काल स्नान करके नये वस्त्र पहनते है। और शाकाहारी भोजन करते हैं। घर में जो व्यक्ति व्रत करता है परिवार के बाकी सदस्य उसके खाना खाने के बाद ही भोजन करते हैं।

दूसरा दिन खरना: ये कार्तिक शुक्ल पंचमी को होता है और इसमें पूरे दिन व्रत रख कर शाम को भोजन ग्रहण करते हैं। इसे खरना कहा जाता है। इस दिन निर्जल उपवास किया जाता है। शाम को गुड़ से बनी चावल की खीर बनाई जाती है, और नमक व चीनी दोनों का प्रयोग वर्जित होता है। इसी दिन चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी का भी प्रसाद बनता है।

तीसरे दिन छठ पूजा: इस दिन मुख्य छठ पूजा होती है। जिसमें विशेष प्रसाद बनाया जाता है। जिसमें ठेकुआ का खास महत्व होता है, जिसे टिकरी भी कहा जाता है। चावल के लड्डू भी बनते हैं। इसके बाद प्रसाद व फल को बांस की टोकरी में सजाया जाता है। इस टोकरी की पूजा कर व्रत करने वाले सूर्य को अर्घ्य देने के लिये तालाब और नदी के तट पर जाते हैं, जहां स्नान करके अस्त होते सूर्य की आराधना की जाती है।

चौथा दिन पारण: छठ पूजा के चौथे और अंतिम दिन यानि सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की विधि दोहराई जाती है। इसके बाद विधिवत पूजा कर प्रसाद बांट जाता है। इसके बाद सूर्य को अर्ध्य देकर छठ पूजा का पारण किया जाता है।

डाला छठ प्रमुख रूप से भगवान सूर्य का व्रत है…

छठ पूजा के कई नाम हैं जैसे , छठ पूजा, छठ, छठी माई के पूजा, छठ पर्व, छठ पूजा, डाला छठ, डाला पूजा, और सूर्य षष्ठी आदि। इस व्रत में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है और अस्त गामी एवं उदित होते सूर्य को अध्र्य दिया जाता है और पूजा की जाती है। इस व्रत प्रसाद मांग कर खाने का विधान है। स्कंद पुराण के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को एक बार भोजन करना चाहिए तत्पश्चात प्रात: काल व्रत का संकल्प लेते हुए संपूर्ण दिन निराहार रहना चाहिए। इस दिन वाणी पर संयम रखना चाहिए। किसी नदी या सरोवर के किनारे जाकर फल, पुष्प, घरके बनाए पकवान, नैवेद्यए धूप और दीप आदि से भगवान का पूजन करना चाहिए।

लाल चंदन और लाल पुष्प भगवान सूर्य की पूजा में विशेष रूप से रखने चाहिए और अंत में ताम्र पात्र में शुद्ध जल लेकर के उस पर रोली, पुष्प, और अक्षत डालकर उन्हें अध्र्य देना चाहिए छठ के व्रत में आटे और गुड़ से युक्त ठेकुआ विशेष रूप से बनाए जाते हैं। चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। सूर्य भगवान के साथ साथ इस दिन छठ माता की पूजा भी जाती है। उदयागामी अर्ध्य के पश्चात् उनका विसर्जन किया जाता है और ऐसी मान्यता है कि पंचमी के सायं काल से ही घर में छठ माता का आगमन हो जाता है। डाला छठ का व्रत मनोकामना की पूर्ति के साथ-साथ संतान की कामना के लिए भी किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि सूर्य की पूजन से चर्म रोग और आंखों की बीमारी से भी छुटकारा मिलता है।

कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण से प्रारंभ हुई थी। वे प्रतिदिन उनको गंगा में खड़े हो कर अध्र्य देते थे और सूर्य की कृपा से महान योद्धा बने। इस बारे में एक और कथा के अनुसार भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गयी, जिसके लिए शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया था। छठ पूजा में सूर्य देव का सर्वाधिक महातम्य है। उनके लिए कहा जाता है कि वे एकमात्र ऐसे देवता है जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है। सूर्य की पत्नियां उषा और प्रत्यूषा है, जो उनकी शक्ति भी मानी जाती हैं। छठ पूजा में सूर्य के साथ इन दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना की जाती है। छठ पर्व अस्ताचल गामी सूर्य की अंतिम किरण से प्रत्यूषा और व्रत पारण पर सूर्य की पहली किरण से उषा की पूजा की जाती है। इस पूजा को संतान और परिवार की खुशहाली के लिए किया जाता है। छठ पूजा में मन्नत मांगने और मन्नत पूरी होने पर कोसी भरने का रिवाज है। विवाह, नई बहू के आगमन और बच्चे के जन्म पर कुल परंपरा के अनुसार कोसी भरी जाती है।

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