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आज हिंसक प्रवृत्तियां प्रबल हैं: निरंकारी बाबा

संसार में ऐसा कौन है जो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाले को समझदारी का प्रमाण-पत्र देगा? वो सूझवान नहीं होता, वो समझदार नहीं होता, उसे सयतो मूर्ख कहा गया है। उसे नादान कहा गया है। तो हम ऐसी मूर्खता न करें, हम सूझ-बूझ का प्रयोग करें, हम समझदारी का प्रयोग करें। कौन से पहलू हैं जो हमारे लिए लाभप्रद है, किन रास्तों पर चलकर हम संसार को सजा सकते हैं, हम संसार को संवार सकते हैं, हम धरती की शोभा बढ़ा सकते हैं? जो हिंसा वाला, खिंचाव वाला, लोभ-लालच वाला वातावरण बन चुका है उसे हम चारों ओर देख रहे हैं।

हिंसक प्रवृत्तियां कितनी प्रबल हैं, एक सेकेण्ड नहीं लगता हिंसक होने में। तैयार होता है हाथ पकडऩे को, तैयार हैं जान लेन को, तयार हं जुबान से भी छलनी करने को। तैयार रहता है हमेशा एक जरा सा कारण मिल जाये और अगर कारण नहीं भी मिलता है तो कारण खड़ा कर देता है। इस तरह की प्रवृत्तियों से वातावरण को जो रुप दिया जा रहा है वो घुटन वाला है। जिस आब-ओ-हवा में कोई इस तरह से जिसे हम प्रदूषण कह रहे हैं कि वातावरण में प्रदूषण है, कितनी-कितनी बीमारियां, और कितने-कितने रोग बढ़ते चले जा रहे हैं। तो यही आब-ओ-हवा शुद्ध हो जाये तो कितने रोगों से हमारा बचाव हो जायेगा। सभी जानते हैं कि अस्सी के दशक में जब भोपाल (मध्य प्रदेश) में गैस का रिसाव हुआ था तो उस समय शहर में आराम के साथ लोग सो रहे थे। स्वांस ले रहे थे, जीवन चल रहा था। लेकिन उस गैस का रिसाव होने के साथ ही हजारों-हजारों लोग मौत की नींद सो गये। आब-ओ-हवा में बदलाव आ गया। वातावरण में वो जहरीली गैस फैल गयी और उसके कारण कितने लोग इस संसार से रुख़सत हो गये, परिवारों में मातम फैल गया।

इस तरह से जो वातावरण हमारे लिए नुकसान का कारण बन रहा है, जो हमें घुटन दे रहा है, ऐसे वातावरण को बदलने की जरुरत है। इसलिए भी यह देन दी जा रही है। यह भक्त प्रवृत्ति ही हमारा कार्य सिद्ध कर सकती है । यह वातावरण ही बदलना है लेकिन वातावरण के साथ-साथ यह चेतना दी जाती है कि पहले हमने अपने आपको बदलना है। पहले अपने से शुरु करना है। पहले अपनी सोच को पावन-पवित्र करना होगा। तभी हम वातावरण को वो देन दे सकेंगें। यह सुखद वातावरण चारों तरफ बनें, यही शुभकामना है।

हर इन्सान के लिए यही संदेश दिया जा रहा है कि जरा सोचो कि किस तरह से इस जीवन के सफर को तय कर रहे हो। हमारा कदम किस तरह से इस धरती पर रखा जा रहा है। यह कदम जहां रख रहे हो यह दूसरे को लताड़ रहा है, दूसरे को कुचल रहा है, या फिर हमारा यह कदम इस तरह से इस धरती पर पड़ रहा है कि जिधर भी हमारा कदम पड़ता है उधर ही गुलजार ख्शिल जाता है, उधर ही फूल खिल जाते हैं, इस तरह से विचरण करने की जरुरत है 7 अपने आपका मूल्यांकन करने की जरुरत है 7 अपने आप की समीक्षा करने की जरुरत है। अपने गिरेबान में झांककर देखना है।

पहले भी महापुरुषो-सन्तों के यह कथन कहे हैं कि अपने गिरेबान में झांक करदेख कि तेरे मन में किस तरह की तरंगे उठ रही है, तेरे मन में किस तरह के भाव बने हुए हैं। किस तरह की सोच बनी हुई है, यह अपनेगिरेबान में झांककर देख। अपने मन के अन्दर झांकना जरुरी है। अपना मूल्यांकन करना जरुरी हैऔर फिर अपना संवरना जरुरी है7

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