नम्र रहो और दूसरों से नम्रता वाला व्यवहार करो: : मुनिश्री आलोक - Arth Parkash
Sunday, December 16, 2018
Breaking News
Home » धर्म / संस्कृति » नम्र रहो और दूसरों से नम्रता वाला व्यवहार करो: : मुनिश्री आलोक
नम्र रहो और दूसरों से नम्रता वाला व्यवहार करो: : मुनिश्री आलोक

नम्र रहो और दूसरों से नम्रता वाला व्यवहार करो: : मुनिश्री आलोक

हमेशा दूसरों के सामने नम्र रहो और नम्रता वाला व्यवहार करो। क्योंकि नम्र व्यक्ति की कोई आलोचना नहीं करता, बल्कि सम्मान करता है। साथ ही मिलनसार रहो। क्योंकि आदमी का व्यवहार ही उसकी पहचान होता है। जब आप दूसरों से नम्रता से पेश आओगे तो सामनेवाला भी उसी तरह आपके साथ व्यवहार करेगा व सम्मान करेगा। नम्रता व कोमलता धार्मिक व्यक्ति का चौथा लक्षण है। नम्र व्यक्ति में अभिमान की बुराई नहीं होती। अहंकारी दूसरे के सत्य को स्वीकार नहीं करता। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने अणुव्रत भवन सैक्टर-24 के तुलसी सभागार में कहे।

मनीषी श्रीसंत ने आगे कहा उन्होंने कहा कि नम्र व्यक्ति दूसरों के हृदय में अपना स्थान बनाता है। नम्र तथा विनीत बनना साधनामय जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। नम्र व्यक्ति बड़ों और गुरुजनों का सम्मान करता है और उनसे सब कुछ प्राप्त कर लेता है। नम्रता से पत्थर को भी पिंघला कर मोम बनाया जा सकता है। नम्रता देवत्व के समान है। लोक-जीवन की सारी उपलब्धियां नम्रता से ही मिलती हैं। कठोर वचन बोलने वाला व्यक्ति किसी को भी प्यारा नहीं लगता। अहंकार ही कठोर व्यवहार करने के लिए विवश करता है। बड़ों की आज्ञा के अनुसार चलने वाला व्यक्ति सभी का प्रियपात्र बन जाता है।

कठोर सोचना, बोलना और करना दूसरों के लिए दुखद और पीड़ादायक है। नम्रता में लचीलापन, झुकने की शक्ति और जीतने की कला है। नम्रता मन, वाणी और शरीर तीनों योगों में होनी चाहिए। मनीषी श्रीसंत ने आगे कहा शब्द विनम्रता के कई मतलब हैं। जैसे अहंकार या घमंड न करना और अपनी कामयाबी, काबिलीयत और धन-दौलत के बारे में शेखी न मारना, वगैरह वगैरह। एक किताब के मुताबिक, विनम्रता का मतलब अपनी सीमाओं के अंदर रहना भी है। विनम्र व्यक्ति चालचलन के मामले में अपनी सीमाओं के अंदर ही रहता है। वह अपनी सीमाओं को जानते हुए वही काम करता है जो उसे करना चाहिए और जो उसके बस में है। वह यह भी जानता है कि कुछेक बातों में दखल देना उसके लिए गलत होगा। इसमें कोई शक नहीं कि विनम्र व्यक्ति को हर कोई पसंद करता है। एक अँग्रेज़ कवि, जोसफ ऐडिसन ने लिखा, विनम्र होना सबसे बड़ी खूबसूरती है।

मनीषी श्रीसंत ने कहा हम असिद्ध इंसानों में विनम्रता का गुण पैदाइशी नहीं होता। इसलिए हमें अपने अंदर इसे बढ़ाने के लिए कोशिश करने की ज़रूरत है। परमेश्वर के वचन में ऐसी कई घटनाओं का ब्यौरा दिया गया है, जिनसे हम विनम्रता दिखाने के अलग-अलग तरीके जान सकते हैं और अपने अंदर यह गुण बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं। अगर हम विनम्र होंगे तो दूसरों के साथ भी हमारा रिश्ता अच्छा होगा। मिसाल के तौर पर, जो माता-पिता धन-दौलत के पीछे न भागते हुए गुजऱ-बसर की चीज़ों में ही खुश रहकर आध्यात्मिक बातों को पहला स्थान देते हैं, उनके बच्चे भी ज़रूर उन्हीं की मिसाल पर चलेंगे। ऐसे बच्चों को उनकी हर मनपसंद चीज़ चाहे न मिले तो भी वे शिकायत नहीं करेंगे बल्कि जो उनके पास है उसी से वे खुश रहेंगे। इस तरह वे भी विनम्रता से जीना सीखेंगे और परिवार में एक-दूसरे के बीच अच्छा संबंध होगा। विनम्र लोगों को मन की शांति मिलती है।

मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया विनम्रता से पेश आनेवाला इंसान कभी महत्वाकांक्षी नहीं होता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसकी जिंदगी में कोई लक्ष्य नहीं होते। मिसाल के तौर पर, अगर वह परमेश्वर की सेवा में ज़्यादा जिम्मेदारी पाना चाहता है तो इसके लिए वह परमेश्वर द्वारा ठहराए गए वक्त का इंतज़ार करेगा और जब उसे कोई मसीही जिम्मेदारी मिले तो वह यहोवा का बहुत शुक्रगुज़ार होगा। वह यह नहीं समझेगा कि उसने सब कुछ अपने-आप हासिल कर लिया है। इसलिए ‘शान्ति के सोतेÓ यानी यहोवा के साथ उसका रिश्ता और भी मज़बूत होगा।शायद कभी-कभी हमें लगे कि लोग हमें नजऱअंदाज़ कर देते हैं। ऐसे में सीमाओं को पार करके दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने के बजाय क्या अक्लमंदी इसमें नहीं होगी कि हम विनम्रता से पेश आएँ? जो लोग विनम्रता से पेश आते हैं उन पर दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने का जुनून सवार नहीं होता।इसलिए उनको मन में शांति मिलती है और ऐसी शांति इंसान के तन और मन की तंदुरुस्ती के लिए ज़रूरी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Share