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भर्ती घोटाले में जांच पर उठे सवाल

हरियाणा की राजनीति में तूफान लाने वाले हरियाणा राज्य कर्मचारी चयन आयोग (एचएसएससी) भर्ती घोटाले में जो नयी बात सामने आ रही है, वह अनेक सवाल उठाती है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल के उडऩदस्ते ने जिस घोटाले का पर्दाफाश किया था, उसमें संबंधित जांच अधिकारियों ने अपनी भूमिका ठीक से अदा ही नहीं की। क्या यह संभव है कि मुख्यमंत्री की नाक के नीचे ही अधिकारी ऐसी कोताही बरतें और अदालत को नये सिरे से मामले की जांच के आदेश देने पड़े हैं। दरअसल, कर्मचारी चयन आयोग के भर्ती घोटाले में यही हुआ है और अब पंचकूला जिला अदालत ने राज्य सरकार के आदेश पर बनी एसआईटी की जांच पर असंतोष जताते हुए तीन आईपीएस अधिकारियों को जांच सौंपने के आदेश दिए हैं। अधिकारियों की इस टीम को दो महीने में मामले की जांच कर रिपोर्ट फाइल करनी होगी।

अप्रैल 2018 में यह मामला उजागर हुआ था, सामने आया था कि एचएसएससी के माध्यम से हरियाणा में विभिन्न पदों के लिए जो नौकरियां निकलती थी, उसके लिए हरियाणा समेत निकटवर्ती राज्यों हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान के युवाओं की ओर से जो आवेदन किए जाते थे, उन्हें फांस कर दलाल आयोग के अंदर बैठे कर्मचारियों से साठगांठ करते थे, इनसे मोटी रकम वसूली जाती थी और फिर उन्हें इंटरव्यू में क्लीयर कराया जाता था। इसकी शिकायत लगातार सरकार तक पहुंच रही थी। इसके बाद सीएम उडऩदस्ते ने छापमारी की कार्रवाई को अंजाम दिया था। यह मामला हरियाणा विधानसभा में भी उठ चुका है, विपक्ष ने इसके लिए भाजपा सरकार पर तमाम तोहमत लगाते हुए आरोप लगाया था कि मौजूदा सरकार के वक्त में नौकरियां बेची जा रही हैं। इसके बाद मुख्यमंत्री की ओर से इसकी निष्पक्ष जांच के आदेश दिए गए थे। हालांकि अब अदालत ने जैसे सवाल उठाए हैं, उससे इस मामले की जांच पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

गौरतलब है कि अदालत ने हैरानी जताई है कि जांच कर रही पुलिस की एसआईटी ने अभी तक आरोपियों की बातचीत पर आधारित कॉल ट्रांसक्रिप्शन की पूरी डीवीडी तक नहीं सुनी। वहीं आरोपियों के मोबाइल से दो हजार से ज्यादा हुईं कॉल की जांच भी पूरी तरह से नहीं हो सकी है। इन्हीं कॉल्स डिटेल्स पर मामले की जांच आगे बढऩे या यहीं ठहरे रहने पर सुई टिकी है। कोर्ट ने कहा है कि यह अजीब बात है कि एसआईटी की ओर से उन लोगों और अधिकारियों के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया, जिनके नाम पहले ही काबू किए गए आरोपियों की बातचीत में सामने आए थे। वहीं पुलिस के एक जांचकर्ता की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया है कि उन फोन कॉल्स की पूरी बातचीत नहीं सुनी गई, जिन्हें मामले से संबंधित माना जा रहा था। कोर्ट की टिप्पणी है कि एसआईटी ने चयनित आरोपियों की चुनी हुई बातचीत के आधार पर अपनी जांच को सीमित कर दिया और यह चयन शिकायत दर्ज करने के समय ही किया गया था।

हरियाणा की सियासत विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है। सरकार जहां अपनी उपलब्धियों का बखान कर फिर से सत्ता में वापसी का दावा कर रही है, वहीं विपक्ष उन खामियों और मामलों को उजागर कर रहा है जोकि पिछले 4 साल के दौरान प्रदेश में घटे हैं। भर्ती घोटाला ऐसा ही मामला है, जिसने प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज कर दिया था, जाहिर है अदालत की ओर से जांच पर सवाल उठाने के बाद विपक्ष मामले को और पुरजोर तरीके से उठाएगा। ऐसे में सरकार की यह कोशिश होनी चाहिए कि अपना पक्ष साफ रखे और अधिकारियों को मामले की निष्पक्ष जांच के आदेश दे।

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